दल-बदल जनादेश का अपमान, सदस्यता रद्द हो: आईएसएफ चेयरमैन नौशाद सिद्दीकी
सारांश
मुख्य बातें
इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के चेयरमैन नौशाद सिद्दीकी ने 8 अक्टूबर 2026 को कोलकाता में पश्चिम बंगाल के कई राजनीतिक घटनाक्रमों पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य के घर पर कथित हमले की निंदा की और एनसीपीआई से जुड़े 20 सांसदों तथा बंगाल के 10 विधायकों के दल-बदल के मामले पर अपनी स्पष्ट राय रखी। सिद्दीकी का कहना है कि राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का अंग हैं, लेकिन विपक्षी आवाज़ों या वकीलों पर हमला किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है।
अधिवक्ता पर हमले की निंदा
सिद्दीकी ने विकास रंजन भट्टाचार्य के आवास पर हुए कथित हमले को लेकर कहा कि किसी व्यक्ति का विपक्षी दल से संबंध होना अलग विषय है, परंतु विपक्ष की ओर से बात कहने पर हमले की प्रतिक्रिया देना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। उन्होंने दावा किया कि इससे पूर्व कोलकाता के सेशन कोर्ट में अधिवक्ताओं और उच्च न्यायालय के एक वकील पर भी कथित तौर पर हमले हो चुके हैं।
सिद्दीकी ने सरकार से ऐसे हमलों में कथित रूप से संलिप्त समूहों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की माँग की। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार यह सोचकर ऐसे तत्वों को अनदेखा करती है कि वे उसके पक्ष में काम कर रहे हैं, तो भविष्य में यही लोग सरकार के विरुद्ध भी खड़े हो सकते हैं।
दल-बदल और जनादेश का प्रश्न
एनसीपीआई से जुड़े 20 सांसदों और 10 विधायकों के मामले पर सिद्दीकी ने कहा कि इस मुद्दे पर सुनवाई जारी है और यदि कानून अपने रास्ते पर चलता है, तो संबंधित नेताओं की सदस्यता को लेकर स्पष्ट निर्णय होना चाहिए। उनका तर्क है कि एक उम्मीदवार किसी निश्चित चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ता है और मतदाता उसी चिह्न के आधार पर अपना मत देते हैं — ऐसे में जीत के बाद दूसरी पार्टी में जाना मतदाताओं के साथ सरासर गलत व्यवहार है।
सिद्दीकी ने यह भी कहा कि यदि संबंधित नेताओं को अपनी लोकप्रियता पर भरोसा है, तो उन्हें पद से इस्तीफा देकर नए दल के बैनर तले दोबारा चुनाव लड़ना चाहिए। यह वक्तव्य दल-बदल विरोधी कानून की सीमाओं पर एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श को भी छूता है।
मुर्शिदाबाद का उदाहरण
मुर्शिदाबाद का उल्लेख करते हुए सिद्दीकी ने बताया कि वहाँ के मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विरुद्ध मतदान किया था। बावजूद इसके, चुनाव के बाद वहाँ के तीन सांसद एनसीपीआई में चले गए और वह पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का हिस्सा बन गई। सिद्दीकी के अनुसार, यह स्थिति मतदाताओं की मूल मंशा के साथ सीधा विश्वासघात है।
विपक्ष के साथ व्यवहार पर ऐतिहासिक संदर्भ
सिद्दीकी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कार्यकाल के दौरान विधानसभा में BJP सदस्यों के आचरण का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब ममता बनर्जी बोलती थीं, तब भाजपा के सभी सदस्य सदन छोड़कर चले जाते थे। मौजूदा संदर्भ से तुलना करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि राजनीतिक असहमति चाहे जितनी भी गहरी हो, विपक्षी नेताओं या उनके समर्थकों पर शारीरिक हमला कतई स्वीकार्य नहीं है।
आगे क्या होगा
सिद्दीकी का मानना है कि मतदाता इस स्थिति का जवाब लोकतांत्रिक प्रक्रिया के ज़रिए देंगे और कानूनी रूप से दल-बदल करने वाले नेताओं की सदस्यता समाप्त होनी चाहिए। एनसीपीआई के 20 सांसदों और 10 विधायकों से जुड़े मामले में सुनवाई जारी है, और इसका नतीजा पश्चिम बंगाल की राजनीतिक तस्वीर पर गहरा असर डाल सकता है।