संस्कृत है भारतीय भाषाओं का 'सुनहरा धागा': उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन का LBSNSU दीक्षांत संबोधन
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 6 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (LBSNSU) के द्वितीय दीक्षांत समारोह में संस्कृत को भारत की अनेक भाषाओं को एकता के सूत्र में पिरोने वाला 'सुनहरा धागा' बताया। उन्होंने स्नातक छात्रों, उनके अभिभावकों, संकाय सदस्यों एवं विश्वविद्यालय समुदाय को बधाई दी और मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान किए। इस अवसर पर उन्होंने उपस्थित लोगों को 'नशीली दवाओं के बहिष्कार' की शपथ भी दिलाई।
विश्वविद्यालय की उपलब्धियाँ और शास्त्री जी को श्रद्धांजलि
राधाकृष्णन ने विश्वविद्यालय को एनएएसी की सर्वोच्च ग्रेड (ए++) प्राप्त करने और भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध क्षेत्रों में शोध करने के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि यह संस्थान संस्कृत अध्ययन के लिए एक अग्रणी अंतरराष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में अपनी पहचान स्थापित करे — ठीक वैसे जैसा विश्वविद्यालय के संस्थापक, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कल्पना की थी।
उन्होंने शास्त्री जी के अमर नारे 'जय जवान, जय किसान' को याद करते हुए कहा कि यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि भारत के सीमा रक्षण और खाद्य सुरक्षा के प्रति अटल संकल्प की अभिव्यक्ति थी।
संस्कृत संरक्षण और पांडुलिपि विरासत
उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के उन प्रयासों की सराहना की जिनके तहत सुभाषितों के माध्यम से परिसर में संस्कृत को जीवित रखा जा रहा है, विद्यापीठ पंचांग के प्रकाशन की 44 वर्ष पुरानी परंपरा निभाई जा रही है और प्राकृत एवं वास्तु शास्त्र जैसे शास्त्रीय विषयों की शिक्षा दी जा रही है।
उन्होंने ज्ञान भारतम मिशन का विशेष उल्लेख करते हुए बताया कि ₹500 करोड़ के प्रारंभिक कोष के साथ शुरू की गई यह पहल भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत को देश और दुनिया के लोगों तक पहुँचाने का कार्य कर रही है। उन्होंने शिक्षकों और छात्रों से अप्रकाशित संस्कृत पांडुलिपियों की खोज, संरक्षण, आलोचनात्मक संपादन और प्रकाशन का बीड़ा उठाने का आग्रह किया, ताकि दुर्लभ ग्रंथ लुप्त न हों।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति और सभ्यतागत विकास
राधाकृष्णन ने इस बात पर बल दिया कि भारत का विकास उसकी सभ्यतागत विरासत से जुड़ा रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और अष्टदशी योजना जैसी पहलों ने संस्कृत के पुनरुत्थान और भारतीय ज्ञान प्रणाली के संवर्धन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर प्राचीन भाषाओं के संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ रही है।
युवाओं को संदेश और नई प्रकाशनों का विमोचन
स्नातकों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने उनसे आजीवन सीखने और अपने आचार्यों व माता-पिता द्वारा दिए गए मूल्यों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में उन्होंने छात्रों को संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रौद्योगिकी का सकारात्मक उपयोग करने की सलाह दी।
उन्होंने युवाओं को मादक पदार्थों से दूर रहने, सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण उपयोग करने और पढ़ने, कौशल विकास तथा वास्तविक संबंध बनाने में समय लगाने की नसीहत दी। समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति ने तीन प्रकाशनों — 'अम्नाय कल्पतरु', 'विद्यामित्रम' और 'शोध प्रभा' (जुलाई-सितंबर 2026) — का विमोचन भी किया।
समारोह में केंद्रीय राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मुरली मनोहर पाठक, विशिष्ट विद्वान, आचार्य, संकाय सदस्य और बड़ी संख्या में संस्कृत प्रेमी उपस्थित रहे। गौरतलब है कि यह विश्वविद्यालय का केवल दूसरा दीक्षांत समारोह था — जो संस्था की बढ़ती शैक्षणिक परिपक्वता का संकेत देता है।