दलित छात्र नितिन राज आत्महत्या मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कन्नूर डेंटल कॉलेज प्रोफेसर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 13 जुलाई 2026 को कन्नूर डेंटल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. एम. कोदंडा राम को अग्रिम जमानत देने से स्पष्ट इनकार कर दिया। डॉ. राम पर दलित छात्र नितिन राज के साथ कथित मौखिक उत्पीड़न का आरोप है, जिसकी 10 अप्रैल को कॉलेज के निकट एक इमारत से कूदकर कथित तौर पर आत्महत्या से मृत्यु हो गई थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि 'यह संदेश जाना चाहिए कि शिक्षक छात्रों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकते।'
न्यायालय का फैसला और टिप्पणी
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने डॉ. राम द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी। यह याचिका केरल उच्च न्यायालय के 19 जून के उस आदेश को चुनौती देते हुए दाखिल की गई थी, जिसमें गिरफ्तारी-पूर्व संरक्षण देने से इनकार किया गया था।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने प्रोफेसर के कथित व्यवहार पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, 'अमानवीय ही एकमात्र शब्द है जो मेरे मन में आता है। वह छात्रों से किस तरह बात करते हैं?' पीठ ने यह भी कहा कि किसी छात्र को सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और कक्षा में हुई वह घटना 'निर्णायक क्षण (टिपिंग पॉइंट)' थी।
बचाव पक्ष के तर्क
डॉ. राम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने दलील दी कि कक्षा में कथित अपमान की घटना छात्र की मृत्यु से लगभग एक माह पहले हुई थी, इसलिए इसे आत्महत्या का निकटतम कारण नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि मृत्यु से करीब एक घंटे पहले हुई एक अन्य घटना अधिक प्रासंगिक है — नितिन राज ने कथित तौर पर बिना अनुमति एक प्रोफेसर का नाम गारंटर के रूप में इस्तेमाल कर मोबाइल ऐप के जरिए ऋण लिया था, जिसके बाद रिकवरी एजेंटों की शिकायत पर प्राचार्य के कक्ष में उसे फटकार लगाई गई।
नायडू ने यह भी तर्क दिया कि डॉ. राम के विरुद्ध जातिसूचक टिप्पणी करने का कोई आरोप नहीं है और छात्रों के प्रति सख्ती बरतने वाले शिक्षकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई से शिक्षकों पर 'चिलिंग इफेक्ट' पड़ेगा। जब नायडू ने कहा कि आरोपी प्रोफेसर 'सबक सीख चुके हैं', तो पीठ ने जवाब दिया, 'सबक सीखने का सवाल ही नहीं उठता।'
मामले की पृष्ठभूमि
नितिन राज के पिता की शिकायत के आधार पर पुलिस ने डॉ. राम और दो अन्य फैकल्टी सदस्यों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया। शिकायत में आरोप लगाया गया कि छात्र को उसकी मृत्यु से पहले जातिगत उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा था।
केरल उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि छात्रों के बयानों से प्रोफेसर के अनुचित व्यवहार की पुष्टि होती है और डॉ. राम ने अन्य फैकल्टी सदस्यों को भी नितिन राज को प्रताड़ित करने के लिए उकसाया था। बचाव पक्ष ने सीसीटीवी फुटेज और ऋण वसूली से जुड़े दस्तावेजों का हवाला देते हुए वैकल्पिक कारण प्रस्तुत किए थे।
उच्च न्यायालय की चिंता और व्यापक संदर्भ
केरल उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने अग्रिम जमानत खारिज करते समय मेडिकल कॉलेजों में उत्पीड़न के बार-बार सामने आ रहे आरोपों पर गहरी चिंता जताई थी। न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने सुझाव दिया था कि सरकार ऐसी शिकायतों की जाँच और सुधारात्मक उपाय सुझाने के लिए एक समिति गठित करने पर विचार करे। गौरतलब है कि यह मामला उस व्यापक बहस के बीच आया है जिसमें उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित और हाशिए के समुदायों के छात्रों के साथ व्यवहार को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एसएलपी खारिज होने के बाद डॉ. राम की गिरफ्तारी का रास्ता साफ हो गया है। अब मामले की जाँच और अभियोजन की प्रक्रिया केरल पुलिस के हाथ में है। इस फैसले को शिक्षण संस्थानों में उत्पीड़न के मामलों में न्यायपालिका के कड़े रुख के रूप में देखा जा रहा है।