17 जुलाई 2026
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केरल हाई कोर्ट का मेडिकल कॉलेजों में उत्पीड़न पर सख्त रुख, उच्च स्तरीय जांच समिति का सुझाव

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केरल हाई कोर्ट का मेडिकल कॉलेजों में उत्पीड़न पर सख्त रुख, उच्च स्तरीय जांच समिति का सुझाव

सारांश

केरल हाई कोर्ट ने मेडिकल कॉलेजों की उत्पीड़न संस्कृति को 'बहुत गंभीर' करार दिया और स्वतंत्र जांच समिति का सुझाव दिया — यह टिप्पणी कन्नूर के डेंटल कॉलेज छात्र की आत्महत्या मामले में आरोपी प्रोफेसर की जमानत सुनवाई के दौरान आई, जो एक बड़े संस्थागत संकट की ओर इशारा करती है।

मुख्य बातें

केरल हाई कोर्ट ने 1 जून को मेडिकल कॉलेजों में उत्पीड़न की संस्कृति पर कड़ी आपत्ति जताई।
बदरुद्दीन ने कहा — 'केरल के मेडिकल कॉलेज छात्रों को बर्बाद कर रहे हैं।' कोर्ट ने गोपनीय फीडबैक और सुधारात्मक उपायों के लिए स्वतंत्र उच्च स्तरीय समिति गठन का सुझाव दिया।
यह सुनवाई कन्नूर के डेंटल कॉलेज छात्र की आत्महत्या मामले में आरोपी प्रोफेसर की अग्रिम जमानत याचिका पर थी।
कोर्ट ने उत्पीड़न के संस्थागत चक्र को 'सास सिंड्रोम' की संज्ञा दी।

केरल हाई कोर्ट ने सोमवार, 1 जून को राज्य के मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों द्वारा छात्रों के उत्पीड़न की संस्कृति पर कड़ी आपत्ति जताई और राज्य सरकार से एक उच्च स्तरीय स्वतंत्र समिति गठित करने का सुझाव दिया, जो शिकायतों की जांच कर सुधारात्मक उपाय सुझाए। यह टिप्पणी कन्नूर के एक डेंटल कॉलेज के छात्र की आत्महत्या से जुड़े मामले में आरोपी प्रोफेसर की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आई।

मुख्य घटनाक्रम

जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि केरल के मेडिकल कॉलेज छात्रों को बर्बाद कर रहे हैं। उन्होंने कहा, 'इसमें कोई संदेह नहीं है। वे छात्रों, यहाँ तक कि स्नातकोत्तर छात्रों के साथ भी बहुत क्रूरता से व्यवहार कर रहे हैं। कई शिकायतें हैं। यह एक बहुत ही गंभीर मामला है।' न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि यह मुद्दा इतना गंभीर हो चुका है कि राज्य सरकार द्वारा व्यवस्थित जांच अनिवार्य है।

छात्रों की चुप्पी पर चिंता

न्यायालय ने इस बात पर विशेष चिंता जताई कि शैक्षणिक परिणामों के भय से अधिकांश पीड़ित छात्र शिक्षकों या कॉलेज प्रशासन के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने से कतराते हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि प्रस्तावित स्वतंत्र समिति छात्रों से गोपनीय फीडबैक एकत्र करे, समस्या की व्यापकता का अध्ययन करे और ठोस उपचारात्मक उपायों की सिफारिश करे।

'सास सिंड्रोम' — उत्पीड़न का संस्थागत चक्र

न्यायालय ने संस्थागत व्यवहार के एक खतरनाक चक्र की ओर भी ध्यान दिलाया। इसे कोर्ट ने 'सास सिंड्रोम' की संज्ञा दी — एक ऐसी स्थिति जिसमें उत्पीड़न का शिकार हुए व्यक्ति जब अधिकार-संपन्न होते हैं, तब वे स्वयं उन्हीं प्रथाओं को दोहराते हैं। यह टिप्पणी व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही उत्पीड़न की संस्कृति पर गहरी चोट करती है।

पृष्ठभूमि और व्यापक संदर्भ

यह मामला इस वर्ष की शुरुआत में कन्नूर के एक डेंटल कॉलेज में एक छात्र की मृत्यु के बाद सुर्खियों में आया था। उस घटना ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव, शैक्षणिक उत्पीड़न और जवाबदेही पर व्यापक बहस छेड़ दी थी। गौरतलब है कि यह कोई अकेली घटना नहीं है — देश भर के व्यावसायिक कॉलेजों से छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक दबाव और कथित धमकी की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।

आगे क्या होगा

छात्र संगठनों और शिक्षा कार्यकर्ताओं ने लंबे समय से मज़बूत शिकायत निवारण तंत्र, स्वतंत्र शिकायत प्रणाली और व्यावसायिक कॉलेजों की बेहतर निगरानी की माँग की है। केरल हाई कोर्ट के इस सुझाव के बाद अब नज़रें राज्य सरकार पर हैं कि वह कितनी शीघ्रता से इस समिति का गठन करती है और उसे कितने स्वायत्त अधिकार देती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन साथ ही यह भी दर्शाती है कि विधायी और प्रशासनिक तंत्र इस समस्या से निपटने में कितने विफल रहे हैं। 'सास सिंड्रोम' की अवधारणा उत्पीड़न को व्यक्तिगत दुर्व्यवहार नहीं, बल्कि एक संस्थागत संरचना के रूप में चिह्नित करती है — जो नीति-निर्माताओं के लिए एक कठिन चुनौती है। असली परीक्षा यह है कि क्या प्रस्तावित समिति को वास्तविक स्वायत्तता और दंडात्मक शक्ति मिलेगी, या यह भी पिछली समितियों की तरह सिफारिशों की धूल में दब जाएगी।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केरल हाई कोर्ट ने मेडिकल कॉलेजों पर क्या टिप्पणी की?
केरल हाई कोर्ट के जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने कहा कि राज्य के मेडिकल कॉलेज छात्रों को 'बर्बाद' कर रहे हैं और शिक्षकों द्वारा उत्पीड़न की समस्या बेहद गंभीर है। कोर्ट ने राज्य सरकार से एक स्वतंत्र उच्च स्तरीय समिति गठित करने का सुझाव दिया जो शिकायतों की जांच कर सुधारात्मक उपाय सुझाए।
यह मामला किस घटना से जुड़ा है?
यह सुनवाई कन्नूर के एक डेंटल कॉलेज के छात्र की आत्महत्या से जुड़े मामले में आरोपी प्रोफेसर की अग्रिम जमानत याचिका पर हुई। इस घटना ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव और शैक्षणिक उत्पीड़न पर व्यापक बहस छेड़ी थी।
कोर्ट ने 'सास सिंड्रोम' क्या बताया?
'सास सिंड्रोम' से कोर्ट का तात्पर्य उस संस्थागत चक्र से है जिसमें उत्पीड़न का शिकार हुए व्यक्ति जब अधिकार-संपन्न हो जाते हैं, तब वे स्वयं उन्हीं प्रथाओं को दोहराते हैं। यह अवधारणा व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही उत्पीड़न की संस्कृति को रेखांकित करती है।
प्रस्तावित जांच समिति क्या काम करेगी?
न्यायालय के सुझाव के अनुसार यह स्वतंत्र समिति छात्रों से गोपनीय फीडबैक एकत्र करेगी, उत्पीड़न की समस्या की व्यापकता का अध्ययन करेगी और ठोस उपचारात्मक उपायों की सिफारिश करेगी। अब राज्य सरकार पर निर्भर है कि वह इस समिति का गठन कब और किस रूप में करती है।
छात्र संगठन इस मुद्दे पर क्या माँग कर रहे हैं?
छात्र संगठनों और शिक्षा कार्यकर्ताओं ने लंबे समय से मज़बूत शिकायत निवारण तंत्र, स्वतंत्र शिकायत प्रणाली और व्यावसायिक कॉलेजों की बेहतर निगरानी की माँग की है। केरल हाई कोर्ट की इस टिप्पणी को उन माँगों की न्यायिक स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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