20 अगस्त 2026
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सेबी ने एफपीआई ऑनबोर्डिंग आसान की: डिजिटल हस्ताक्षर वाले पावर ऑफ अटॉर्नी को मंजूरी, 20 अगस्त 2026 से लागू

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सेबी ने एफपीआई ऑनबोर्डिंग आसान की: डिजिटल हस्ताक्षर वाले पावर ऑफ अटॉर्नी को मंजूरी, 20 अगस्त 2026 से लागू

सारांश

सेबी ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए ऑनबोर्डिंग की सबसे बड़ी बाधा हटा दी — अब डिजिटल हस्ताक्षर वाला पीओए मान्य होगा और नोटरीकरण-एपोस्टिलेशन की जरूरत नहीं। यह कदम भारतीय पूंजी बाजार को वैश्विक निवेशकों के लिए और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में अहम है।

मुख्य बातें

सेबी ने 20 अगस्त 2026 से एफपीआई को डिजिटल हस्ताक्षर युक्त पावर ऑफ अटॉर्नी (पीओए) जमा करने की अनुमति दी।
पीओए के नोटरीकरण, एपोस्टिलेशन या कांसुलरीकरण की अनिवार्यता समाप्त की गई।
डिजिटल पीओए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत मान्य होगा।
सेबी पहले ही कॉमन एप्लीकेशन फॉर्म (सीएएफ) , स्कैन प्रतियों पर पंजीकरण और पोर्टल-आधारित डिजिटल हस्ताक्षर जैसे सुधार लागू कर चुका है।
इस बदलाव से एफपीआई ऑनबोर्डिंग में लगने वाला समय और लागत दोनों में उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 20 अगस्त 2026 को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया को और अधिक सुलभ बनाते हुए उन्हें अपने कस्टोडियन को डिजिटल हस्ताक्षर युक्त पावर ऑफ अटॉर्नी (पीओए) जमा करने की अनुमति दे दी। यह नई व्यवस्था उसी दिन से प्रभावी हो गई है और इससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय पूंजी बाजार में प्रवेश की राह काफी सरल होने की उम्मीद है।

नई व्यवस्था में क्या बदला

संशोधित प्रावधानों के अनुसार, कोई भी एफपीआई अब अपने कस्टोडियन को उसका पता निर्दिष्ट करते हुए पीओए जारी कर सकता है और इस दस्तावेज को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत मान्य डिजिटल हस्ताक्षर के जरिए निष्पादित कर सकता है। सेबी ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में पीओए के नोटरीकरण, एपोस्टिलेशन या कांसुलरीकरण की अब कोई आवश्यकता नहीं रहेगी — जो पहले ऑनबोर्डिंग में सबसे अधिक समय लेने वाले चरण थे।

बाजार नियामक ने अपने परिपत्र में कहा, 'सेबी के लगातार जारी डिजिटलीकरण प्रयासों के तहत अब एफपीआई को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अनुसार डिजिटल हस्ताक्षर के जरिए पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित करने की अनुमति दी गई है।'

कस्टोडियन की भूमिका और पीओए का महत्व

पीओए एफपीआई के कस्टोडियन को उसकी ओर से कार्य करने का कानूनी अधिकार देता है। कस्टोडियन वे वित्तीय संस्थान होते हैं जो निवेशकों की प्रतिभूतियों और परिसंपत्तियों को अपने पास रखते और उनका प्रबंधन करते हैं। इनके प्रमुख कार्यों में एफपीआई पंजीकरण प्रक्रिया, ट्रेड का क्लियरेंस, सेटलमेंट प्रबंधन और नियामकों को अनुपालन रिपोर्टिंग शामिल हैं।

गौरतलब है कि भौतिक पीओए दस्तावेजों के नोटरीकरण और एपोस्टिलेशन में कई बार सप्ताहों का समय लग जाता था, जो विदेशी निवेशकों के लिए एक प्रमुख बाधा बनी हुई थी। डिजिटल हस्ताक्षर की अनुमति से यह प्रक्रिया कुछ ही दिनों में पूरी हो सकेगी।

डिजिटलीकरण की दिशा में सेबी के पिछले कदम

यह कदम पूंजी बाजार नियामक के उस व्यापक सुधार अभियान का हिस्सा है, जो पिछले कुछ वर्षों से जारी है। इससे पहले सेबी ने एफपीआई पंजीकरण, पैन, बैंक और डीमैट खातों के लिए कॉमन एप्लीकेशन फॉर्म (सीएएफ) की शुरुआत की थी। इसके अतिरिक्त, सीएएफ और अन्य पंजीकरण दस्तावेजों को निष्पादित करने के लिए भारतीय डिजिटल हस्ताक्षर के उपयोग की अनुमति, सीएएफ पोर्टल के भीतर डिजिटल हस्ताक्षर सुविधा और स्कैन की गई प्रतियों के आधार पर पंजीकरण की अनुमति जैसे सुधार भी लागू किए जा चुके हैं।

विदेशी निवेशकों पर असर

यह ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक निवेशकों को आकर्षित करने की होड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है और प्रतिस्पर्धी बाजारों की तुलना में ऑनबोर्डिंग की जटिलता एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी। डिजिटल पीओए की अनुमति से न केवल समय और लागत की बचत होगी, बल्कि भारतीय बाजारों में एफपीआई की भागीदारी बढ़ने की भी उम्मीद है।

नए प्रावधान 20 अगस्त 2026 से प्रभावी हैं और सेबी ने संकेत दिया है कि ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया को और सरल बनाने के प्रयास जारी रहेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा क्रियान्वयन की होगी — डिजिटल हस्ताक्षर की तकनीकी स्वीकार्यता विभिन्न न्यायक्षेत्रों में एकसमान नहीं है, और कुछ देशों में भारतीय डिजिटल हस्ताक्षर की कानूनी मान्यता अभी भी अस्पष्ट है। पिछले कुछ वर्षों में सेबी ने सीएएफ, स्कैन-आधारित पंजीकरण जैसे कई सुधार किए, फिर भी एफपीआई प्रवाह में उतार-चढ़ाव जारी रहा — जो बताता है कि ऑनबोर्डिंग जटिलता केवल एक कारक है। कर अनिश्चितता और बाजार अस्थिरता जैसी गहरी चुनौतियाँ अभी भी बनी हैं, जिन्हें प्रक्रियागत सुधार अकेले हल नहीं कर सकते।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सेबी ने एफपीआई ऑनबोर्डिंग में क्या बदलाव किया है?
सेबी ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को अब डिजिटल हस्ताक्षर युक्त पावर ऑफ अटॉर्नी (पीओए) के जरिए अपने कस्टोडियन को अधिकृत करने की अनुमति दी है। यह बदलाव 20 अगस्त 2026 से प्रभावी है और इसके तहत पीओए के नोटरीकरण, एपोस्टिलेशन या कांसुलरीकरण की जरूरत नहीं रहेगी।
डिजिटल पीओए से एफपीआई ऑनबोर्डिंग में क्या फर्क पड़ेगा?
भौतिक पीओए के नोटरीकरण और एपोस्टिलेशन में पहले कई सप्ताह लग सकते थे। डिजिटल हस्ताक्षर की अनुमति से यह प्रक्रिया कुछ ही दिनों में पूरी हो सकेगी, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय पूंजी बाजार में प्रवेश तेज और कम खर्चीला होगा।
कस्टोडियन कौन होते हैं और उनकी क्या भूमिका है?
कस्टोडियन वे वित्तीय संस्थान होते हैं जो निवेशकों की प्रतिभूतियों और परिसंपत्तियों को अपने पास रखते और उनका प्रबंधन करते हैं। वे एफपीआई पंजीकरण, ट्रेड क्लियरेंस, सेटलमेंट प्रबंधन और नियामकों को अनुपालन रिपोर्टिंग जैसे कार्य भी संपन्न करते हैं।
क्या डिजिटल हस्ताक्षर वाला पीओए कानूनी रूप से मान्य है?
हाँ, सेबी ने स्पष्ट किया है कि डिजिटल हस्ताक्षर युक्त पीओए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के प्रावधानों के अनुरूप मान्य होगा। यह वही कानूनी ढाँचा है जिसके तहत भारत में इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों को मान्यता दी जाती है।
सेबी ने एफपीआई प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए पहले क्या-क्या कदम उठाए हैं?
सेबी ने पहले एफपीआई पंजीकरण, पैन, बैंक और डीमैट खातों के लिए कॉमन एप्लीकेशन फॉर्म (सीएएफ) शुरू किया था। इसके अलावा, सीएएफ पोर्टल में डिजिटल हस्ताक्षर सुविधा, स्कैन प्रतियों पर पंजीकरण और भारतीय डिजिटल हस्ताक्षर के उपयोग की अनुमति जैसे सुधार भी किए जा चुके हैं।
राष्ट्र प्रेस
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