सेबी का बड़ा फैसला: एफपीआई पंजीकरण फीस अब डॉलर की जगह रुपए में, ₹90,000 से शुरू
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 8 जुलाई 2025 को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों (एफवीसीआई) के पंजीकरण शुल्क ढाँचे में आमूल बदलाव करते हुए डॉलर-आधारित प्रणाली को रुपए-आधारित प्रणाली से बदल दिया है। यह संशोधन अधिसूचना जारी होने के करीब छह महीने बाद लागू होगा, ताकि विदेशी निवेशकों को नई व्यवस्था के अनुरूप ढलने का पर्याप्त समय मिल सके।
नई फीस संरचना: क्या बदला
सेबी की आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, पहले जो पंजीकरण शुल्क 1,000 डॉलर था, उसे अब ₹90,000 कर दिया गया है। कैटेगरी-I एफपीआई और एफवीसीआई के लिए यह शुल्क 2,500 डॉलर से बढ़ाकर ₹2.3 लाख निर्धारित किया गया है। इसके साथ ही लेट फीस और कंटिन्यूएशन फीस में भी समानुपातिक संशोधन किए गए हैं।
कस्टोडियन के लिए भुगतान की पद्धति में भी बदलाव किया गया है — अब उन्हें सालाना एकमुश्त ₹10 लाख के बजाय प्रतिमाह ₹85,000 जमा करने होंगे, जिससे नकदी प्रवाह अधिक नियमित और पारदर्शी होगा।
डिपॉजिटरी की जिम्मेदारी और समयसीमा
संशोधित नियमों के तहत, डिपॉजिटरी को एफपीआई और एफवीसीआई से संग्रहीत फीस, पंजीकरण प्रदान होने के पाँच कार्य दिवसों के भीतर सेबी के पास जमा करनी अनिवार्य होगी। यह प्रावधान राशि संग्रह और हस्तांतरण के बीच की देरी को समाप्त करने के लिए लाया गया है।
पंजीकरण प्रक्रिया में सरलीकरण
नियामक ने एफपीआई पंजीकरण के लिए कॉमन एप्लीकेशन फॉर्म में भी संशोधन किया है। अब इसमें व्यक्तिगत निवेशकों के लिए जन्म तिथि और संस्थागत निवेशकों के लिए कंपनी के गठन की तिथि को शामिल करना अनिवार्य होगा। यह कदम मार्च 2025 में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा जारी उस अधिसूचना के अनुरूप है, जिसमें परमानेंट अकाउंट नंबर (PAN) आवेदन प्रक्रिया को सुगम बनाने के निर्देश दिए गए थे।
परिचालन दिक्कतें दूर करने की कोशिश
सेबी ने स्पष्ट किया है कि डॉलर-आधारित शुल्क प्रणाली में मैनुअल अकाउंटिंग, इनवॉइसिंग में जटिलता, रियल-टाइम लेखांकन सूचना का अभाव और वित्तीय रिपोर्टिंग में देरी जैसी परिचालन बाधाएँ लंबे समय से बनी हुई थीं। रुपए में फीस तय करने से ये समस्याएँ स्वतः समाप्त होंगी और प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी।
गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान सेबी ने एफपीआई और एफवीसीआई से पंजीकरण, कंटिन्यूएशन और अन्य शुल्कों के रूप में जीएसटी सहित 1.298 करोड़ डॉलर (लगभग ₹108 करोड़) संग्रहीत किए। यह आँकड़ा इस सुधार की प्रशासनिक महत्ता को रेखांकित करता है।
आगे की राह
यह बदलाव भारत के पूँजी बाज़ार नियामक ढाँचे को अधिक रुपया-केंद्रित और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक सुविचारित कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे विदेशी निवेशकों को मुद्रा विनिमय दर के उतार-चढ़ाव से जुड़ी अनिश्चितता भी कम होगी। छह महीने की संक्रमण अवधि के बाद इस नई प्रणाली का क्रियान्वयन बाज़ार नियमन की पारदर्शिता और कुशलता दोनों को मज़बूत करेगा।