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जेफरीज रिपोर्ट: एसआईपी निवेश और एफआईआई बिकवाली से कमजोर हो रहा है भारतीय रुपया

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जेफरीज रिपोर्ट: एसआईपी निवेश और एफआईआई बिकवाली से कमजोर हो रहा है भारतीय रुपया

सारांश

जेफरीज की रिपोर्ट एक असहज सच्चाई उजागर करती है — भारत की एसआईपी क्रांति ने घरेलू बाज़ार को स्थिर रखा, लेकिन इसी ने विदेशी निवेशकों को बिना किसी बाधा के ₹78 अरब डॉलर निकालने का रास्ता दे दिया, जिससे रुपया कमजोर हुआ और पूंजी खाता अधिशेष दशक के निचले स्तर पर पहुँच गया।

मुख्य बातें

जेफरीज ने कहा कि भारतीय रुपए की कमजोरी की मुख्य वजह एसआईपी निवेश और एफआईआई बिकवाली है, न कि कच्चे तेल या चालू खाते का घाटा।
पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाज़ार से करीब 78 अरब डॉलर निकाले।
अप्रैल 2024 से अकेले एफपीआई ने 44 अरब डॉलर के भारतीय शेयर बेचे; वित्त वर्ष 2026 में रिकॉर्ड 21 अरब डॉलर की बिकवाली।
भारत का पूंजी खाता अधिशेष जीडीपी के 0.5% तक गिरा — पिछले दशक के 2.6% औसत से बहुत नीचे।
शुद्ध एफडीआई दो वर्षों में लगभग 5 अरब डॉलर पर स्थिर; भुगतान संतुलन लगातार नकारात्मक।
जेफरीज को आने वाले वर्ष में भी रुपए पर दबाव बने रहने की आशंका, हालांकि विदेशी विश्वास लौटने पर सुधार संभव।

ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि भारतीय रुपए पर दबाव की असली वजह कच्चे तेल की कीमतें या चालू खाते का घाटा नहीं, बल्कि इक्विटी बाज़ार में मजबूत घरेलू निवेश और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की लगातार बिकवाली है। 'आईएनआर प्रेशर — द डाउनसाइड ऑफ एसआईपी' शीर्षक इस रिपोर्ट में फर्म ने रेखांकित किया कि सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी), म्यूचुअल फंड और रिटायरमेंट-लिंक्ड निवेश के ज़रिए आने वाले घरेलू पैसे ने विदेशी निवेशकों को भारी बिकवाली करते हुए भी आसानी से बाहर निकलने का रास्ता दे दिया।

विदेशी निवेशकों की निकासी का पैमाना

जेफरीज के अनुमान के अनुसार, पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से करीब 78 अरब डॉलर निकाले हैं। इसमें फॉरेन पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई), प्राइवेट इक्विटी फर्मों और विदेशी प्रमोटरों की हिस्सेदारी शामिल है, जिन्होंने उच्च मूल्यांकन का लाभ उठाते हुए अपनी पोजीशन घटाई। रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2024 से अकेले एफपीआई ने 44 अरब डॉलर मूल्य के भारतीय शेयर बेचे हैं।

एफपीआई की बिकवाली का रिकॉर्ड

वित्त वर्ष 2026 में एफपीआई ने रिकॉर्ड 21 अरब डॉलर के भारतीय शेयर बेचे और वित्त वर्ष 2027 में भी अब तक शुद्ध विक्रेता बने हुए हैं। इसके बावजूद बेंचमार्क इक्विटी सूचकांक अपेक्षाकृत स्थिर रहे, क्योंकि घरेलू संस्थागत निवेशकों और खुदरा निवेशकों ने एसआईपी, ईपीएफओ और एनपीएस से जुड़े बढ़ते आवंटन के ज़रिए बिकवाली के दबाव को अवशोषित किया। यह ऐसे समय में आया है जब घरेलू निवेश इनफ्लो लगातार नई ऊँचाइयाँ छू रहा है।

पूंजी खाते पर असर

जेफरीज ने चेतावनी दी है कि इस प्रवृत्ति ने भारत की पूंजी खाता स्थिति को गंभीर रूप से कमजोर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 और 2026 के दौरान भारत का पूंजी खाता अधिशेष जीडीपी के लगभग 0.5 प्रतिशत तक गिर गया — जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। गौरतलब है कि पिछले दशक में यह औसत 2.6 प्रतिशत रहा था।

भुगतान संतुलन और रुपए की स्थिति

प्रमोटरों और निजी इक्विटी निवेशकों द्वारा हिस्सेदारी बिक्री के कारण दो वर्षों की अवधि में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) लगभग 5 अरब डॉलर पर ही स्थिर रहा। परिणामस्वरूप, भारत का भुगतान संतुलन पिछले दो वर्षों से नकारात्मक बना हुआ है। जेफरीज को आने वाले वर्ष में भी इस कमजोरी के जारी रहने की आशंका है।

सुधार की संभावना

हालांकि, ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि यदि विदेशी निवेशकों का विश्वास लौटता है तो स्थिति में बदलाव संभव है। भारतीय बाज़ार में दीर्घकालिक संरचनात्मक आकर्षण बरकरार है, लेकिन निकट भविष्य में रुपए पर दबाव बने रहने का अनुमान है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वहीं वह विदेशी निकासी को सहज बनाकर मुद्रा और पूंजी खाते को कमज़ोर भी करती है। पूंजी खाता अधिशेष का दशक के निचले स्तर 0.5% पर आना और भुगतान संतुलन का लगातार नकारात्मक रहना — ये संकेत हैं कि 'मज़बूत घरेलू बाज़ार' की कहानी के पीछे एक संरचनात्मक कमज़ोरी पनप रही है। सवाल यह है कि क्या नीति-निर्माता इस ट्रेडऑफ को स्वीकार करने और उसे संतुलित करने के लिए तैयार हैं, या फिर एसआईपी की सफलता को ही पर्याप्त मानते रहेंगे।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जेफरीज के अनुसार भारतीय रुपए में कमजोरी की असली वजह क्या है?
जेफरीज का कहना है कि रुपए पर दबाव की मुख्य वजह कच्चे तेल या चालू खाते का घाटा नहीं, बल्कि एसआईपी और म्यूचुअल फंड के ज़रिए मजबूत घरेलू निवेश और विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली है। घरेलू निवेश ने विदेशी निवेशकों को बिना बाज़ार को हिलाए बाहर निकलने का रास्ता दे दिया।
पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाज़ार से कितना पैसा निकाला?
जेफरीज के अनुमान के अनुसार, पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से करीब 78 अरब डॉलर निकाले। इसमें एफपीआई, प्राइवेट इक्विटी फर्मों और विदेशी प्रमोटरों की हिस्सेदारी बिक्री शामिल है।
भारत का पूंजी खाता अधिशेष इतना क्यों गिरा?
वित्त वर्ष 2025 और 2026 में भारत का पूंजी खाता अधिशेष जीडीपी के लगभग 0.5 प्रतिशत तक गिर गया, जो पिछले दशक के 2.6 प्रतिशत औसत से काफी नीचे है। एफपीआई की भारी बिकवाली और शुद्ध एफडीआई के 5 अरब डॉलर पर स्थिर रहने से यह गिरावट आई।
क्या भारतीय रुपए में सुधार की संभावना है?
जेफरीज का मानना है कि यदि विदेशी निवेशकों का विश्वास सुधरता है तो रुपए और पूंजी खाते की स्थिति में बेहतरी आ सकती है। हालांकि, फर्म को आने वाले वर्ष में भी कमजोरी बने रहने की आशंका है।
एसआईपी का रुपए पर नकारात्मक असर कैसे पड़ता है?
एसआईपी और घरेलू निवेश इनफ्लो ने बाज़ार में स्थिरता तो दी, लेकिन इससे विदेशी निवेशकों को बिना किसी बड़े बाज़ार व्यवधान के भारी मात्रा में शेयर बेचने का अवसर मिला। इस निरंतर विदेशी निकासी ने भारत के भुगतान संतुलन को नकारात्मक बनाए रखा और रुपए पर दबाव बढ़ाया।
राष्ट्र प्रेस
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