सेबी ने पीएमएस नियम 2026 को मंजूरी दी, आईपीओ-डेट निवेश और एफपीआई कमोडिटी भागीदारी का विस्तार
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 24 सितंबर 2026 को पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (पीएमएस) क्षेत्र के लिए व्यापक नई नियामकीय रूपरेखा को मंजूरी दे दी, जिसके तहत पोर्टफोलियो मैनेजर्स को आईपीओ, प्राथमिक ऋण निर्गम और कुछ विदेशी प्रतिभूतियों में निवेश करने का अधिकार मिलेगा। साथ ही, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए कमोडिटी डेरिवेटिव्स बाज़ार में भागीदारी का दायरा भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया गया है।
नया नियामकीय ढाँचा: क्या बदलेगा
सेबी बोर्ड ने सेबी (पोर्टफोलियो मैनेजर्स) रेगुलेशंस, 2026 को स्वीकृति दी, जो अब तक प्रभावी 2020 के नियमों की जगह लेगा। नियामक के अनुसार, नई व्यवस्था का उद्देश्य पीएमएस उद्योग के विकास को गति देना, अनुपालन प्रक्रियाओं को सरल बनाना, विभिन्न प्रावधानों को एकीकृत करना और अनावश्यक नियमों को समाप्त करना है।
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में पीएमएस उद्योग तेज़ी से बढ़ा है और इसका प्रबंधन-अधीन परिसंपत्ति (एयूएम) आधार लाखों करोड़ रुपये को पार कर चुका है। ऐसे में नए नियमों की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
निवेश विकल्पों में विस्तार
नई व्यवस्था के तहत पोर्टफोलियो मैनेजर्स अपने ग्राहकों की पूँजी को आईपीओ और डेट सेगमेंट के प्राथमिक बाज़ार निर्गमों में निवेश कर सकेंगे। इससे पीएमएस प्रदाताओं को प्राथमिक बाज़ार तक अधिक लचीली पहुँच मिलेगी और निवेशकों के लिए अवसरों का विस्तार होगा।
विवेकाधीन पोर्टफोलियो प्रबंधन सेवाओं (डीपीएमएस) को भी कुछ शर्तों के अधीन अतिरिक्त निवेश की छूट दी गई है। ग्राहक की सहमति से उसके कुल प्रबंधित निवेश यानी एयूएम का 10 प्रतिशत तक निवेश-योग्य, गैर-परिवर्तनीय और गैर-सूचीबद्ध ऋण प्रतिभूतियों में लगाया जा सकेगा।
इसके अतिरिक्त, नए नियम पोर्टफोलियो मैनेजर्स को एक्सचेंज-ट्रेडेड डेरिवेटिव्स के उपयोग में भी अधिक लचीलापन देते हैं। डेरिवेटिव्स के माध्यम से एक्सपोजर ग्राहक की कुल एयूएम का 1.25 गुना तक रखा जा सकेगा।
एफपीआई के लिए कमोडिटी डेरिवेटिव्स का विस्तार
सेबी ने एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की एक्सचेंज-ट्रेडेड कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भागीदारी बढ़ाने को भी हरी झंडी दे दी। इसका उद्देश्य कमोडिटी डेरिवेटिव्स बाज़ार में तरलता (लिक्विडिटी) को मज़बूत करना और बाज़ार की गहराई बढ़ाना बताया गया है।
इस निर्णय के तहत एफपीआई को गैर-कृषि सूचकांक आधारित डेरिवेटिव्स में भाग लेने की अनुमति होगी, चाहे अंतर्निहित अनुबंधों का निपटान नकद के माध्यम से हो या नहीं। इसके साथ ही उन्हें गैर-नकद निपटान वाले गैर-कृषि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भी भागीदारी की अनुमति दी गई है।
सुरक्षा उपाय और सीमाएँ
सेबी ने बाज़ार की स्थिरता को ध्यान में रखते हुए कड़े सुरक्षा उपाय भी तय किए हैं। गैर-नकद निपटान वाली कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भाग लेने वाले एफपीआई को किसी भी डिलीवरी दायित्व उत्पन्न होने से पहले अपनी पोजीशन से बाहर निकलना होगा।
उन्हें टेंडर पीरियड शुरू होने से पहले अपनी पोजीशन बंद करनी होगी, जो अनुबंध की समाप्ति से तीन दिन पहले शुरू होता है। इसके अलावा, एफपीआई को टी-3 दिन के बाद अपनी पोजीशन बढ़ाने की अनुमति नहीं होगी। यह व्यवस्था डिलीवरी अवधि के निकट अत्यधिक सट्टेबाज़ी और अतिरिक्त पोजीशन निर्माण को रोकने के लिए की गई है।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय पूँजी बाज़ार में विदेशी और घरेलू दोनों निवेशकों की रुचि तेज़ी से बढ़ रही है। नए नियम पीएमएस उद्योग को अधिक प्रतिस्पर्धी और संस्थागत रूप से मज़बूत बनाने की दिशा में एक ठोस कदम माने जा रहे हैं। सेबी के इस फैसले से कमोडिटी बाज़ार में विदेशी पूँजी का प्रवाह बढ़ने और समग्र बाज़ार गहराई में सुधार की उम्मीद है।