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सेबी बोर्ड बैठक: पीएमएस सुधार, एफपीआई की बाजार पहुंच विस्तार समेत एक दर्जन अहम प्रस्तावों पर विचार संभव

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सेबी बोर्ड बैठक: पीएमएस सुधार, एफपीआई की बाजार पहुंच विस्तार समेत एक दर्जन अहम प्रस्तावों पर विचार संभव

सारांश

सेबी की इस सप्ताह की बोर्ड बैठक भारतीय पूंजी बाजार के लिए निर्णायक हो सकती है — पीएमएस को वैश्विक निवेश की छूट, एफपीआई के लिए कमोडिटी बाजार के नए दरवाजे, और रीट्स-इनविट्स के जरिए विदेशी पूंजी जुटाने का प्रस्ताव। एक साथ इतने सुधारों की संभावना बाजार संरचना में बड़े बदलाव का संकेत है।

मुख्य बातें

सेबी (SEBI) की इस सप्ताह की बोर्ड बैठक में पूंजी बाजार से जुड़े करीब एक दर्जन प्रस्तावों पर विचार संभव।
पीएमएस प्रबंधकों को विदेशी शेयर, ऋण प्रतिभूतियाँ और विदेशी म्यूचुअल फंडों में निवेश की अनुमति देने का प्रस्ताव; एयूएम के 10% तक गैर-सूचीबद्ध ऋण में निवेश की छूट चर्चा में।
एफपीआई को भौतिक डिलीवरी वाले गैर-कृषि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भागीदारी की अनुमति संभव; डिलीवरी से 3 दिन पहले पोजिशन बंद करना अनिवार्य होगी।
रीट्स और इनविट्स को डिपॉजिटरी रिसीट्स के जरिए विदेशी पूंजी जुटाने की अनुमति देने का प्रस्ताव विचाराधीन।
₹10 लाख तक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट और आवेदन समयसीमा 60 से 90 दिन करने का प्रस्ताव।
स्टॉक ब्रोकर, म्यूचुअल फंड और अन्य मध्यस्थों के लिए कॉमन एडवरटाइजिंग कोड लागू करने पर भी विचार।

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी/SEBI) की इस सप्ताह होने वाली बोर्ड बैठक में पूंजी बाजार से जुड़े करीब एक दर्जन महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर विचार किए जाने की संभावना है। रिपोर्टों के अनुसार, इनमें पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (पीएमएस) के नियमों में व्यापक संशोधन, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए बाजार पहुंच का विस्तार, सेटलमेंट ढांचे की समीक्षा और मान्यता प्राप्त निवेशक व्यवस्था को सुदृढ़ करने जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। यदि इन सुधारों को मंजूरी मिलती है, तो यह भारतीय पूंजी बाजार को वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक सुलभ और परिचालन की दृष्टि से अधिक सरल बना सकता है।

पीएमएस ढांचे में प्रस्तावित बदलाव

रिपोर्टों के अनुसार, सेबी पीएमएस ढांचे में व्यापक सुधार पर विचार कर सकता है। प्रमुख प्रस्तावों में पीएमएस प्रबंधकों को विदेशी प्रतिभूतियों में निवेश की अनुमति देना शामिल है — जिसमें सूचीबद्ध विदेशी शेयर, ऋण प्रतिभूतियाँ और ऐसे विदेशी म्यूचुअल फंड आएंगे जो विदेशी इक्विटी, डेट तथा रीट्स में निवेश करते हैं।

हालांकि ऐसे निवेश विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा/FEMA), लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) की सीमाओं और संबंधित ग्राहकों की स्पष्ट सहमति के अधीन रहेंगे। इसके अलावा, विवेकाधीन पीएमएस प्रबंधकों को ग्राहकों की कुल प्रबंधित परिसंपत्तियों (एयूएम) के 10 प्रतिशत तक निवेश-योग्य गैर-सूचीबद्ध ऋण प्रतिभूतियों में निवेश की छूट देने का प्रस्ताव भी चर्चा में है।

सेबी उन प्रतिभूतियों में भी निवेश की अनुमति देने पर विचार कर रहा है जो अभी सूचीबद्ध नहीं हुई हैं, लेकिन सूचीबद्धता की प्रक्रिया में हैं। प्रस्तावित परिचालन सुधारों में डिमैट पोर्टेबिलिटी, डिजिटल प्रकटीकरण दस्तावेज, सरलीकृत रिपोर्टिंग व्यवस्था, डीलिंग रूम और योग्यता संबंधी नियमों में ढील तथा पावर ऑफ अटॉर्नी प्रावधानों को सहज बनाना भी शामिल है।

एफपीआई के लिए बाजार पहुंच का विस्तार

रिपोर्टों के अनुसार, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को भौतिक डिलीवरी वाले गैर-कृषि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भागीदारी की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, इसके साथ एक महत्वपूर्ण शर्त जुड़ी होगी — एफपीआई को डिलीवरी अवधि शुरू होने से तीन दिन पहले अपनी पोजिशन बंद या रोलओवर करनी होगी।

इसके अतिरिक्त, रीट्स (रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स) और इनविट्स (इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स) को डिपॉजिटरी रिसीट्स के माध्यम से विदेशी पूंजी जुटाने की अनुमति देने का प्रस्ताव भी विचाराधीन है। यह कदम इन निवेश प्लेटफॉर्म्स के लिए वैश्विक निवेशकों तक पहुंच को आसान बना सकता है।

सेटलमेंट ढांचे और विज्ञापन संहिता में संभावित बदलाव

सेबी सेटलमेंट ढांचे में भी व्यापक संशोधन पर विचार कर सकता है। प्रस्ताव के अनुसार, सेटलमेंट राशि को प्रतिभूति कानूनों के तहत निर्धारित न्यूनतम दंड से जोड़ा जा सकता है। इसके साथ ही ₹10 लाख तक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट व्यवस्था लागू करने और आवेदन की समयसीमा 60 दिनों से बढ़ाकर 90 दिन करने का प्रस्ताव भी चर्चा में है।

रिपोर्टों के मुताबिक, बाजार में कॉमन एडवरटाइजिंग कोड को भी एजेंडे में रखा जा सकता है। इसका उद्देश्य स्टॉक ब्रोकर, म्यूचुअल फंड, पोर्टफोलियो मैनेजर, निवेश सलाहकार, रिसर्च विश्लेषक और अन्य मध्यस्थों के लिए एकसमान विज्ञापन मानक लागू करना है।

बाजार और निवेशकों पर संभावित असर

यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय पूंजी बाजार में विदेशी निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने और घरेलू निवेशकों को वैश्विक संपत्ति वर्गों तक पहुंच देने की मांग बढ़ रही है। गौरतलब है कि पीएमएस उद्योग में बड़े और उच्च-निवल-मूल्य वाले निवेशक होते हैं, और नए नियम उन्हें अधिक विविध पोर्टफोलियो बनाने का अवसर दे सकते हैं।

रीट्स और इनविट्स के लिए डिपॉजिटरी रिसीट्स का रास्ता खुलने से इन्फ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट क्षेत्र को वैश्विक पूंजी मिलने की संभावना है, जो दीर्घावधि में भारत की अवसंरचना वित्तपोषण जरूरतों के लिए सकारात्मक हो सकती है। हालांकि ये सभी प्रस्ताव अभी विचाराधीन हैं और बोर्ड की औपचारिक मंजूरी के बाद ही लागू होंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह देखना होगा कि फेमा और एलआरएस की सीमाएं व्यावहारिक रूप से इस छूट को कितना सीमित करती हैं। एफपीआई को कमोडिटी डेरिवेटिव्स में प्रवेश देना बाजार की गहराई बढ़ाने का सकारात्मक कदम है, परंतु डिलीवरी से तीन दिन पहले पोजिशन बंद करने की शर्त के साथ इसकी व्यावसायिक उपयोगिता सीमित रह सकती है। असली परीक्षा यह है कि ये सुधार कागज से व्यवहार तक कितनी जल्दी और पारदर्शी तरीके से पहुंचते हैं।
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सेबी बोर्ड बैठक में पीएमएस के लिए क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?
रिपोर्टों के अनुसार, सेबी पीएमएस प्रबंधकों को विदेशी सूचीबद्ध शेयरों, ऋण प्रतिभूतियों और विदेशी म्यूचुअल फंडों में निवेश की अनुमति दे सकता है। इसके साथ ही एयूएम के 10% तक गैर-सूचीबद्ध ऋण प्रतिभूतियों में निवेश, डिमैट पोर्टेबिलिटी और सरलीकृत रिपोर्टिंग व्यवस्था जैसे परिचालन सुधार भी प्रस्तावित हैं।
एफपीआई को कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भागीदारी की अनुमति क्यों मायने रखती है?
यह बदलाव भारतीय कमोडिटी बाजार में विदेशी भागीदारी बढ़ाकर बाजार की गहराई और तरलता सुधार सकता है। हालांकि एफपीआई को डिलीवरी अवधि शुरू होने से तीन दिन पहले अपनी पोजिशन बंद या रोलओवर करनी होगी, जो उनकी रणनीतिक लचीलेपन को सीमित कर सकता है।
रीट्स और इनविट्स के लिए डिपॉजिटरी रिसीट्स का प्रस्ताव क्या है?
प्रस्ताव के अनुसार, रीट्स और इनविट्स को डिपॉजिटरी रिसीट्स के माध्यम से विदेशी पूंजी जुटाने की अनुमति दी जा सकती है। इससे इन प्लेटफॉर्म्स के लिए वैश्विक निवेशकों तक पहुंच आसान होगी और भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर व रियल एस्टेट क्षेत्र को दीर्घकालिक विदेशी वित्तपोषण मिल सकता है।
सेबी के प्रस्तावित सेटलमेंट ढांचे में क्या बदलाव होंगे?
रिपोर्टों के अनुसार, ₹10 लाख तक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट व्यवस्था लाई जा सकती है और आवेदन की समयसीमा 60 दिनों से बढ़ाकर 90 दिन करने का प्रस्ताव है। साथ ही सेटलमेंट राशि को प्रतिभूति कानूनों के तहत निर्धारित न्यूनतम दंड से जोड़ा जा सकता है।
कॉमन एडवरटाइजिंग कोड से बाजार पर क्या असर पड़ेगा?
प्रस्तावित कॉमन एडवरटाइजिंग कोड स्टॉक ब्रोकर, म्यूचुअल फंड, पोर्टफोलियो मैनेजर, निवेश सलाहकार और रिसर्च विश्लेषकों के लिए एकसमान विज्ञापन मानक सुनिश्चित करेगा। इसका उद्देश्य निवेशकों को भ्रामक विज्ञापनों से बचाना और बाजार में पारदर्शिता लाना है।
राष्ट्र प्रेस
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