सेबी बोर्ड बैठक: पीएमएस सुधार, एफपीआई की बाजार पहुंच विस्तार समेत एक दर्जन अहम प्रस्तावों पर विचार संभव
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी/SEBI) की इस सप्ताह होने वाली बोर्ड बैठक में पूंजी बाजार से जुड़े करीब एक दर्जन महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर विचार किए जाने की संभावना है। रिपोर्टों के अनुसार, इनमें पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (पीएमएस) के नियमों में व्यापक संशोधन, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए बाजार पहुंच का विस्तार, सेटलमेंट ढांचे की समीक्षा और मान्यता प्राप्त निवेशक व्यवस्था को सुदृढ़ करने जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। यदि इन सुधारों को मंजूरी मिलती है, तो यह भारतीय पूंजी बाजार को वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक सुलभ और परिचालन की दृष्टि से अधिक सरल बना सकता है।
पीएमएस ढांचे में प्रस्तावित बदलाव
रिपोर्टों के अनुसार, सेबी पीएमएस ढांचे में व्यापक सुधार पर विचार कर सकता है। प्रमुख प्रस्तावों में पीएमएस प्रबंधकों को विदेशी प्रतिभूतियों में निवेश की अनुमति देना शामिल है — जिसमें सूचीबद्ध विदेशी शेयर, ऋण प्रतिभूतियाँ और ऐसे विदेशी म्यूचुअल फंड आएंगे जो विदेशी इक्विटी, डेट तथा रीट्स में निवेश करते हैं।
हालांकि ऐसे निवेश विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा/FEMA), लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) की सीमाओं और संबंधित ग्राहकों की स्पष्ट सहमति के अधीन रहेंगे। इसके अलावा, विवेकाधीन पीएमएस प्रबंधकों को ग्राहकों की कुल प्रबंधित परिसंपत्तियों (एयूएम) के 10 प्रतिशत तक निवेश-योग्य गैर-सूचीबद्ध ऋण प्रतिभूतियों में निवेश की छूट देने का प्रस्ताव भी चर्चा में है।
सेबी उन प्रतिभूतियों में भी निवेश की अनुमति देने पर विचार कर रहा है जो अभी सूचीबद्ध नहीं हुई हैं, लेकिन सूचीबद्धता की प्रक्रिया में हैं। प्रस्तावित परिचालन सुधारों में डिमैट पोर्टेबिलिटी, डिजिटल प्रकटीकरण दस्तावेज, सरलीकृत रिपोर्टिंग व्यवस्था, डीलिंग रूम और योग्यता संबंधी नियमों में ढील तथा पावर ऑफ अटॉर्नी प्रावधानों को सहज बनाना भी शामिल है।
एफपीआई के लिए बाजार पहुंच का विस्तार
रिपोर्टों के अनुसार, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को भौतिक डिलीवरी वाले गैर-कृषि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भागीदारी की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, इसके साथ एक महत्वपूर्ण शर्त जुड़ी होगी — एफपीआई को डिलीवरी अवधि शुरू होने से तीन दिन पहले अपनी पोजिशन बंद या रोलओवर करनी होगी।
इसके अतिरिक्त, रीट्स (रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स) और इनविट्स (इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स) को डिपॉजिटरी रिसीट्स के माध्यम से विदेशी पूंजी जुटाने की अनुमति देने का प्रस्ताव भी विचाराधीन है। यह कदम इन निवेश प्लेटफॉर्म्स के लिए वैश्विक निवेशकों तक पहुंच को आसान बना सकता है।
सेटलमेंट ढांचे और विज्ञापन संहिता में संभावित बदलाव
सेबी सेटलमेंट ढांचे में भी व्यापक संशोधन पर विचार कर सकता है। प्रस्ताव के अनुसार, सेटलमेंट राशि को प्रतिभूति कानूनों के तहत निर्धारित न्यूनतम दंड से जोड़ा जा सकता है। इसके साथ ही ₹10 लाख तक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट व्यवस्था लागू करने और आवेदन की समयसीमा 60 दिनों से बढ़ाकर 90 दिन करने का प्रस्ताव भी चर्चा में है।
रिपोर्टों के मुताबिक, बाजार में कॉमन एडवरटाइजिंग कोड को भी एजेंडे में रखा जा सकता है। इसका उद्देश्य स्टॉक ब्रोकर, म्यूचुअल फंड, पोर्टफोलियो मैनेजर, निवेश सलाहकार, रिसर्च विश्लेषक और अन्य मध्यस्थों के लिए एकसमान विज्ञापन मानक लागू करना है।
बाजार और निवेशकों पर संभावित असर
यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय पूंजी बाजार में विदेशी निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने और घरेलू निवेशकों को वैश्विक संपत्ति वर्गों तक पहुंच देने की मांग बढ़ रही है। गौरतलब है कि पीएमएस उद्योग में बड़े और उच्च-निवल-मूल्य वाले निवेशक होते हैं, और नए नियम उन्हें अधिक विविध पोर्टफोलियो बनाने का अवसर दे सकते हैं।
रीट्स और इनविट्स के लिए डिपॉजिटरी रिसीट्स का रास्ता खुलने से इन्फ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट क्षेत्र को वैश्विक पूंजी मिलने की संभावना है, जो दीर्घावधि में भारत की अवसंरचना वित्तपोषण जरूरतों के लिए सकारात्मक हो सकती है। हालांकि ये सभी प्रस्ताव अभी विचाराधीन हैं और बोर्ड की औपचारिक मंजूरी के बाद ही लागू होंगे।