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एनसीएईआर रिपोर्ट से बिहार शराबबंदी पर नई बहस, राजस्व में 14-15% वृद्धि का अनुमान

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एनसीएईआर रिपोर्ट से बिहार शराबबंदी पर नई बहस, राजस्व में 14-15% वृद्धि का अनुमान

सारांश

एनसीएईआर की रिपोर्ट ने बिहार की नौ साल पुरानी शराबबंदी पर नई बहस छेड़ दी है — नियंत्रित बिक्री से 14-15% अतिरिक्त राजस्व का दावा, तस्करी की चुनौतियाँ और गठबंधन के भीतर असहमति। लेकिन नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत दाँव पर है।

मुख्य बातें

एनसीएईआर की रिपोर्ट में बिहार में पूर्ण शराबबंदी हटाकर नियंत्रित बिक्री और आबकारी कर व्यवस्था बहाल करने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा करने पर राज्य के अपने राजस्व में 14 से 15 फीसदी तक की वृद्धि संभव है।
जनता दल (यूनाइटेड) ने शराबबंदी समीक्षा के किसी भी सुझाव को खारिज किया; BJP ने कहा — कोई भी फैसला कैबिनेट का सामूहिक निर्णय होगा।
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने गुजरात मॉडल पर शराबबंदी लागू करने की वकालत की।
राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने नेपाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ सीमाओं से तस्करी रोकने के लिए ठोस कार्रवाई की माँग की।
बिहार में शराबबंदी अप्रैल 2016 में लागू हुई थी; फिलहाल पूर्ण प्रतिबंध जारी है।

नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की एक ताज़ा स्टडी ने बिहार में अप्रैल 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी नीति को लेकर नई राजनीतिक और आर्थिक बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में नियंत्रित शराब बिक्री और आबकारी कर व्यवस्था बहाल करने की सिफारिश की गई है, यह दावा करते हुए कि ऐसा करने पर राज्य के अपने राजस्व में 14 से 15 फीसदी तक की वृद्धि संभव है। करीब एक दशक बाद आई यह रिपोर्ट सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर असहमति की लकीरों को भी उजागर कर रही है।

रिपोर्ट में क्या कहा गया है

एनसीएईआर की स्टडी के अनुसार, शराबबंदी लागू होने के बाद से बिहार में अवैध शराब की तस्करी, दूसरे नशीले पदार्थों के उपयोग और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन में गंभीर चुनौतियाँ सामने आई हैं। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि पूर्ण प्रतिबंध के बजाय नियंत्रित बिक्री व्यवस्था इन समस्याओं को कम कर सकती है और राज्य को राजस्व का एक बड़ा स्रोत भी दे सकती है। आलोचकों का कहना है कि यह सिफारिश नीतिगत दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह किसी राजनीतिक दल की ओर से नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र शोध संस्था की ओर से आई है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और गठबंधन की स्थिति

सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल जनता दल (यूनाइटेड) ने शराबबंदी की समीक्षा या उसे समाप्त करने के किसी भी सुझाव को सिरे से खारिज किया है। शराबबंदी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक पहचान और सामाजिक सुधार एजेंडे का अभिन्न हिस्सा रही है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने कहा कि विभिन्न शोध संस्थानों की रिपोर्टें समय-समय पर आती रहती हैं और बिहार सरकार सभी विषयों पर विचार करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शराबबंदी एक सामूहिक निर्णय था, जिसे 2016 में लगभग सभी राजनीतिक दलों ने समर्थन दिया था, और भविष्य में कोई भी फैसला कैबिनेट स्तर पर सामूहिक रूप से लिया जाएगा।

गठबंधन के भीतर असहमति की आवाज़ें

हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी लंबे समय से शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन पर सवाल उठाते रहे हैं। एनसीएईआर रिपोर्ट सामने आने के बाद उन्होंने गुजरात की तर्ज पर बिहार में शराबबंदी कानून लागू करने की वकालत की है — यह बयान गठबंधन के भीतर मतभेद का संकेत देता है। गौरतलब है कि मांझी का यह रुख नया नहीं है, लेकिन एनसीएईआर की रिपोर्ट ने उनकी आवाज़ को नई वैधता दे दी है।

विपक्ष का रुख

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के विधायक भाई वीरेंद्र ने भी सरकार पर निशाना साधा। उनका कहना है कि बिहार में शराबबंदी बिना किसी सर्वे के लागू की गई थी और वे खुद इसके गवाह हैं। उन्होंने नेपाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमाओं से हो रही शराब तस्करी रोकने के लिए सरकार से ठोस कार्रवाई की माँग की। भाई वीरेंद्र ने अधिकारियों पर आरोप लगाया कि बड़ी खेप में कार्रवाई के नाम पर कुछ ही ट्रकों को पकड़कर उपलब्धि दिखाई जाती है।

आगे क्या होगा

भाजपा प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने यह भी रेखांकित किया कि बिहार की जनता ने दो आम चुनावों में पूर्ण शराबबंदी के मुद्दे पर सरकार को समर्थन दिया है। फिलहाल बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू है और सत्तारूढ़ गठबंधन में इसे वापस लेने की कोई औपचारिक पहल नहीं है। लेकिन एनसीएईआर की यह रिपोर्ट आर्थिक फायदे-नुकसान, सामाजिक प्रभाव और राजनीतिक प्रतिबद्धता के बीच एक नई बहस की शुरुआत ज़रूर कर चुकी है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि बिहार सरकार इन निष्कर्षों को किस रूप में लेती है और भविष्य में नीतिगत दिशा क्या होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन बिहार में शराबबंदी कभी केवल एक आर्थिक नीति नहीं थी — यह नीतीश कुमार की सामाजिक राजनीति की आधारशिला है, जिस पर उन्होंने दो चुनाव जीते। असली सवाल यह है कि क्या राजस्व का तर्क उस राजनीतिक पूँजी को पलट सकता है जो महिला मतदाताओं के समर्थन पर टिकी है। गठबंधन के भीतर मांझी की आवाज़ और BJP की 'समीक्षा होगी' वाली भाषा यह संकेत देती है कि परदे के पीछे बातचीत चल रही है। लेकिन जब तक JDU की सहमति नहीं बनती, यह रिपोर्ट एक अकादमिक दस्तावेज़ से ज़्यादा कुछ नहीं बन पाएगी।
RashtraPress
12 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एनसीएईआर की बिहार शराबबंदी रिपोर्ट में क्या सिफारिश की गई है?
नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की रिपोर्ट में बिहार में पूर्ण शराबबंदी हटाकर नियंत्रित तरीके से शराब बिक्री और आबकारी कर व्यवस्था बहाल करने की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इससे राज्य के अपने राजस्व में 14 से 15 फीसदी तक की वृद्धि हो सकती है।
बिहार में शराबबंदी कब और क्यों लागू हुई थी?
बिहार में पूर्ण शराबबंदी अप्रैल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं की माँग और सामाजिक सुधार को आधार बनाकर लागू की थी। यह नीति तब से नीतीश कुमार की सरकार की प्रमुख पहचान बनी हुई है।
क्या बिहार सरकार शराबबंदी हटाने पर विचार कर रही है?
फिलहाल बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू है और सत्तारूढ़ गठबंधन में इसे वापस लेने की कोई औपचारिक पहल नहीं है। JDU ने समीक्षा के सुझाव को खारिज किया है, जबकि BJP ने कहा है कि कोई भी फैसला कैबिनेट का सामूहिक निर्णय होगा।
जीतन राम मांझी का शराबबंदी पर क्या कहना है?
केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख जीतन राम मांझी लंबे समय से शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन पर सवाल उठाते रहे हैं। एनसीएईआर रिपोर्ट के बाद उन्होंने गुजरात की तर्ज पर बिहार में शराबबंदी कानून लागू करने की वकालत की है।
बिहार में शराबबंदी के बाद तस्करी की क्या स्थिति है?
एनसीएईआर रिपोर्ट और विपक्षी नेताओं दोनों ने माना है कि शराबबंदी के बावजूद नेपाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमाओं से अवैध शराब की तस्करी जारी है। राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने आरोप लगाया है कि कार्रवाई के नाम पर कुछ ही ट्रकों को पकड़कर उपलब्धि दिखाई जाती है।
राष्ट्र प्रेस
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