बिहार शराबबंदी में गुजरात मॉडल अपनाए सरकार: जीतनराम मांझी की मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से अपील
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के संरक्षक जीतनराम मांझी ने 9 अगस्त 2026 को एक बार फिर बिहार की शराबबंदी नीति की समीक्षा की माँग उठाई। पटना में 'हम' युवा प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से आग्रह किया कि राज्य में शराबबंदी को गुजरात मॉडल की तर्ज पर लागू करने पर विचार किया जाए। मांझी का कहना है कि कानून का उद्देश्य सही है, लेकिन उसके क्रियान्वयन में गंभीर खामियाँ हैं।
मांझी की मुख्य आपत्तियाँ
मांझी ने आरोप लगाया कि पुलिस और प्रशासनिक स्तर पर शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन में अनियमितताएँ देखने को मिल रही हैं। उनके अनुसार, इस कानून की मार सबसे अधिक गरीब और कमजोर वर्ग पर पड़ती है, जबकि प्रभावशाली लोग कानून की पकड़ से बाहर रहते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को निगरानी व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही को और मज़बूत करना चाहिए ताकि अधिकारी इस कानून का दुरुपयोग न कर सकें।
गुजरात मॉडल का तर्क
मांझी ने महात्मा गांधी की जन्मभूमि गुजरात का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ भी शराबबंदी लागू है, लेकिन आम लोगों को वैसी परेशानियों और निराशाओं का सामना नहीं करना पड़ता जैसी बिहार में देखने को मिलती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह मीडिया के माध्यम से मुख्यमंत्री और बिहार सरकार तक अपनी बात पहुँचाना चाहते हैं। गौरतलब है कि मांझी लंबे समय से बिहार में गुजरात जैसी शराबबंदी व्यवस्था लागू करने की वकालत करते आ रहे हैं।
सरकार का रुख
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि राज्य में लागू पूर्ण शराबबंदी नीति वापस नहीं ली जाएगी। यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर ही इस नीति को लेकर मतभेद सार्वजनिक होते दिख रहे हैं — मांझी स्वयं NDA का हिस्सा हैं, फिर भी कई बार इस मुद्दे पर असहमति जता चुके हैं।
आर्थिक पहलू: NCAER की रिपोर्ट
नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की एक शोध रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि क्या बिहार की शराबबंदी अपने सभी उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल कर पाई है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि शराबबंदी हटाई जाती है तो बिहार के आंतरिक राजस्व में लगभग 14 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्तमान में सरकार शराबबंदी लागू कराने और अवैध शराब कारोबार पर रोक लगाने के लिए बड़े पैमाने पर खर्च कर रही है, जो नीति हटने की स्थिति में कम हो सकता है।
आगे की राह
मांझी की यह माँग बिहार की राजनीति में नई बहस को जन्म दे सकती है, खासकर तब जब NCAER जैसी संस्था के आर्थिक विश्लेषण नीति की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रहे हों। यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर से उठ रही इन आवाज़ों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।