बिहार शराबबंदी समीक्षा: पप्पू यादव ने मांझी का समर्थन किया, 5-स्टार होटलों के लिए अलग नियमों की वकालत
सारांश
मुख्य बातें
बिहार की शराबबंदी नीति पर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है, जब पूर्णिया से निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के संरक्षक जीतन राम मांझी की शराबबंदी समीक्षा की मांग का खुलकर समर्थन किया। 14 अगस्त को दिल्ली से पटना पहुँचने के बाद मीडिया से बात करते हुए पप्पू यादव ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था की दोबारा समीक्षा ज़रूरी है।
मांझी की मांग और पप्पू यादव का समर्थन
राज्य सरकार के सहयोगी और HAM के संरक्षक जीतन राम मांझी ने गुजरात मॉडल की तर्ज पर शराबबंदी को और सख्त बनाने की वकालत की थी। अब पप्पू यादव ने भी इस माँग को अपना समर्थन देते हुए कहा कि सरकार को मौजूदा ढाँचे की समीक्षा करनी चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब कथित तौर पर एक सर्वेक्षण में शराबबंदी पर पुनर्विचार की सिफारिश की गई थी।
पप्पू यादव का वैकल्पिक सुझाव
पप्पू यादव ने सुझाव दिया कि स्कूलों और मंदिरों के आसपास शराब-संबंधी प्रतिबंध पहले की तरह पूरी सख्ती से लागू रहने चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि पाँच सितारा और सात सितारा होटलों के लिए अलग नियमों पर विचार किया जा सकता है। उनके अनुसार, किसी भी कानून की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए ताकि उसकी प्रभावशीलता और अनचाहे परिणामों का आकलन किया जा सके।
राजस्व नुकसान और अवैध कारोबार पर सवाल
पप्पू यादव ने मौजूदा शराबबंदी व्यवस्था के आर्थिक प्रभाव पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार को संभावित राजस्व का नुकसान हो रहा है, जबकि अवैध शराब का कारोबार नेताओं, अधिकारियों और अपराधियों के लिए कमाई का ज़रिया बन चुका है। उन्होंने व्यापक समीक्षा की माँग करते हुए कहा कि सरकार को शराबबंदी के फायदे और नुकसान दोनों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना चाहिए।
जेडीयू के कानूनी नोटिस पर पप्पू यादव की प्रतिक्रिया
शराबबंदी सर्वे करने वाली एजेंसी को जनता दल यूनाइटेड (JDU) द्वारा कथित तौर पर कानूनी नोटिस भेजे जाने के सवाल पर पप्पू यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शराबबंदी को लेकर सोच और दृष्टिकोण का सम्मान किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि नीतीश सरकार ने 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी, जो अब तक देश के सबसे चर्चित और विवादित नीतिगत फैसलों में से एक है।
आगे क्या
बिहार में 2025 के अंत तक विधानसभा चुनाव होने की संभावना को देखते हुए शराबबंदी की समीक्षा की माँग राजनीतिक रूप से और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। आलोचकों का कहना है कि यह बहस सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर बढ़ती बेचैनी को दर्शाती है, जबकि सरकार अभी तक किसी भी बदलाव के संकेत देने से बचती रही है।