पराली जलाने पर एफआईआर किसानों का हल नहीं, पंजाब BJP के खन्ना ने AAP सरकार को घेरा
सारांश
मुख्य बातें
पंजाब भाजपा (BJP) के पूर्व अध्यक्ष अविनाश राय खन्ना ने 2 नवंबर 2026 को चंडीगढ़ में आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार पर तीखा हमला बोला और कहा कि पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करना, जुर्माना थोपना और भूमि अभिलेखों में 'लाल प्रविष्टियाँ' करना 'किसी भी तरह से समस्या का समाधान नहीं है।' उन्होंने सरकार से किसानों को दंडित करने के बजाय उन्हें पराली प्रबंधन के लिए ज़रूरी संसाधन उपलब्ध कराने की माँग की।
खन्ना का आरोप: सरकार किसानों की मुसीबत नहीं समझ रही
खन्ना ने कहा कि पंजाब भर में पराली जलाने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि राज्य सरकार की मौजूदा नीति विफल हो रही है। उनके अनुसार सरकार की जिम्मेदारी है कि वह किसानों को समय पर उचित मशीनरी, सब्सिडी, डीजल और वित्तीय सहायता मुहैया कराए।
उन्होंने अपने बयान में स्पष्ट कहा, 'छोटे और सीमांत किसानों को बेलर, हैप्पी सीडर, सुपर सीडर और अन्य कृषि उपकरण किराए पर उपलब्ध कराने के लिए ग्राम स्तर पर पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए।' यह टिप्पणी इस लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इन उपकरणों की ऊँची लागत ही अक्सर किसानों को पराली जलाने के लिए मजबूर करती है।
किसान पहले से आर्थिक दबाव में
खन्ना ने यह भी रेखांकित किया कि पंजाब के किसान पहले से ही खेती की बढ़ती लागत, कृषि खर्च में वृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रहे हैं। ऐसे में उन पर जुर्माना लगाकर और पुलिस कार्रवाई शुरू कर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह किसान संगठनों के साथ संवाद स्थापित करे और समस्या का व्यावहारिक समाधान तलाशे।
CAQM की टीम ने पंजाब के तीन जिलों का किया दौरा
इसी बीच, एनसीआर व आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की एक उच्चस्तरीय टीम ने पंजाब के संगरूर, पटियाला और मलेरकोटला जिलों में धान की पराली प्रबंधन उपायों की समीक्षा की। अधिकारियों ने संबंधित विभागों को पराली जलाने की घटनाओं की कड़ी निगरानी जारी रखते हुए समन्वित प्रयास करने के निर्देश दिए।
टीम ने मलेरकोटला स्थित एक डुप्लेक्स बोर्ड और पेपर निर्माण इकाई का भी दौरा किया, जो धान के अवशेषों का उपयोग अपने बॉयलर में ईंधन के रूप में करती है। उद्योग प्रतिनिधियों ने बताया कि इस इकाई में प्रतिवर्ष लगभग 17,000 मीट्रिक टन धान की भूसी का उपयोग किया जाएगा — जो पराली के वैकल्पिक उपयोग का एक ठोस उदाहरण है।
पराली संकट की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि हर वर्ष अक्टूबर-नवंबर में पंजाब और हरियाणा में धान की कटाई के बाद पराली जलाने की घटनाएँ दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। इस मुद्दे पर केंद्र, राज्य सरकारें और न्यायालय वर्षों से संघर्ष करते आए हैं, लेकिन स्थायी समाधान अभी तक नहीं निकल सका है। यह ऐसे समय में आया है जब दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक श्रेणी में दर्ज होने लगा है।
आगे क्या होगा
CAQM की समीक्षा रिपोर्ट के बाद संबंधित विभागों से जमीनी स्तर पर तय लक्ष्यों के अनुरूप कार्रवाई की उम्मीद है। खन्ना की माँग है कि सरकार किसानों को दंडित करने की बजाय सहयोगी नीति अपनाए — अन्यथा यह विवाद आगामी चुनावी मौसम में राजनीतिक रूप से और उग्र हो सकता है।