5 अक्टूबर 2026
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दिल्ली रेप मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: पुलिस से बोले जस्टिस पारदीवाला — 'अपराधियों के मन में डर पैदा करो'

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दिल्ली रेप मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: पुलिस से बोले जस्टिस पारदीवाला — 'अपराधियों के मन में डर पैदा करो'

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में बलात्कार की घटनाओं पर स्वत: संज्ञान लेते हुए पुलिस को सख्त रुख अपनाने का आदेश दिया। जस्टिस पारदीवाला ने कहा — अपराधियों के मन में डर पैदा करो, यही असली निवारण है। त्योहारी सीजन में विशेष सतर्कता की ताकीद; 16 नवंबर को अगली सुनवाई।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 5 अक्टूबर 2026 को दिल्ली-एनसीआर में बलात्कार की घटनाओं पर स्वत: संज्ञान (सुओ मोटो) लेकर सुनवाई की।
जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि अपराधियों के मन में 'डर' पैदा करना अनिवार्य है।
कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 21 की दलीलें देने वाले मानवाधिकार समूहों की परवाह किए बिना जघन्य यौन अपराधों में सख्त कार्रवाई की जाए।
दिल्ली पुलिस को एनसीआर में महिला सुरक्षा पर विस्तृत एफिडेविट दाखिल करने का आदेश दिया गया।
मामले में अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को निर्धारित है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 5 अक्टूबर 2026 को दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती बलात्कार की घटनाओं पर स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस को कड़े निर्देश जारी किए — अपराधियों के मन में इतना भय उत्पन्न करो कि वे ऐसे कृत्य की सोच भी न सकें। जस्टिस जेबी पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस 'सुओ मोटो' प्रकरण में सुनवाई करते हुए पुलिस अधिकारियों को चेताया कि केवल गिरफ्तारी और जेल पर्याप्त नहीं है।

मुख्य घटनाक्रम

जस्टिस पारदीवाला की पीठ ने दिल्ली पुलिस से सीधे शब्दों में कहा कि जब तक अपराधियों के मन में यह भय न बैठे कि 'अगर हमने ऐसा कुछ किया तो मारे जाएंगे', तब तक इन अपराधों पर अंकुश लगाना संभव नहीं होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों को बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में सख्त कार्रवाई करने से रोकने के लिए मानवाधिकार संगठनों की दलीलों की परवाह करने की आवश्यकता नहीं है।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि आर्टिकल 21 की आड़ में कुछ वर्ग अपराधियों के साथ बुरे बर्ताव का विरोध करते हैं, किंतु जघन्य यौन अपराधों के संदर्भ में पुलिस को इससे विचलित नहीं होना चाहिए।

जस्टिस पारदीवाला के अहम शब्द

जस्टिस जेबी पारदीवाला ने सुनवाई के दौरान कहा, 'दुर्गा पूजा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान बदमाश और गुंडे अधिक सक्रिय हो जाते हैं। आपको उनके मन में डर पैदा करना होगा। उन्हें पकड़कर जेल में डालना ही एकमात्र समाधान नहीं है। अफसरों, हालात के मुताबिक अपनी जिम्मेदारी निभाएं। हमें निराश न करें। छेड़छाड़ या रेप का शिकार होने वाली हर महिला और लड़की हमारी बहन और माँ के समान है। इसे एक चुनौती के तौर पर लें। ऐसी घटनाओं को न होने दें।'

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

पीठ ने दिल्ली पुलिस को एनसीआर क्षेत्र में महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था का विस्तृत ब्यौरा देते हुए एक शपथपत्र (एफिडेविट) दाखिल करने का आदेश दिया। इस मामले में अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय का यह हस्तक्षेप ऐसे समय में आया है जब दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की संख्या को लेकर गंभीर चिंताएँ उठाई जा रही हैं। स्वत: संज्ञान की यह प्रक्रिया बताती है कि न्यायपालिका केवल विधायिका या कार्यपालिका के इंतजार में नहीं बैठना चाहती।

आम जनता और महिला सुरक्षा पर असर

न्यायालय की यह टिप्पणी व्यापक सामाजिक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यौन अपराधों के प्रति पुलिस की कथित ढिलाई पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। इस बार सर्वोच्च न्यायालय ने सीधे पुलिस को जवाबदेही के दायरे में रखा है और त्योहारी सीजन में विशेष सतर्कता बरतने की ताकीद की है।

क्या होगा आगे

दिल्ली पुलिस को अब एनसीआर में महिला सुरक्षा पर एफिडेविट दाखिल करनी होगी, जिसमें तैनाती, गश्त और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र का विवरण अपेक्षित होगा। 16 नवंबर की सुनवाई में न्यायालय इस एफिडेविट की समीक्षा करेगा और आगे के निर्देश जारी कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

किंतु 'डर पैदा करने' की भाषा पुलिस विवेक और जवाबदेही के बीच एक नाज़ुक रेखा खींचती है। न्यायपालिका जब यह कहती है कि मानवाधिकार समूहों की परवाह मत करो, तो यह एक ऐसा संदेश है जिसे जमीन पर अलग-अलग ढंग से लागू किया जा सकता है। असली प्रश्न यह है कि क्या दिल्ली पुलिस का एफिडेविट महज कागजी खानापूर्ति होगा, या उसमें सत्यापन योग्य गश्त और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र का ब्यौरा होगा। 2012 के निर्भया कांड के बाद भी इसी तरह के न्यायिक निर्देश आए थे — बदलाव की रफ्तार बताती है कि घोषणाओं और ज़मीनी सुधार के बीच अभी भी एक बड़ी खाई है।
RashtraPress
5 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली रेप मामलों पर स्वत: संज्ञान क्यों लिया?
दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं के विरुद्ध बलात्कार और अन्य यौन अपराधों की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सुओ मोटो संज्ञान लिया। यह कदम न्यायालय की इस चिंता का प्रतीक है कि राजधानी में महिला सुरक्षा के मामले में व्यवस्था पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं है।
जस्टिस पारदीवाला ने दिल्ली पुलिस को क्या निर्देश दिए?
जस्टिस जेबी पारदीवाला ने पुलिस को निर्देश दिया कि अपराधियों के मन में इतना भय उत्पन्न करें कि वे ऐसे कृत्य की सोच भी न सकें। उन्होंने यह भी कहा कि त्योहारी सीजन — जैसे दुर्गा पूजा और दिवाली — में अपराधी अधिक सक्रिय होते हैं, इसलिए विशेष सतर्कता बरती जाए।
क्या दिल्ली पुलिस को कोई रिपोर्ट या दस्तावेज़ दाखिल करना है?
हाँ, सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को एनसीआर में महिला सुरक्षा व्यवस्था का विस्तृत ब्यौरा देते हुए एक शपथपत्र (एफिडेविट) दाखिल करने का आदेश दिया है। इस एफिडेविट की समीक्षा 16 नवंबर 2026 को अगली सुनवाई में की जाएगी।
कोर्ट ने आर्टिकल 21 और मानवाधिकार समूहों के बारे में क्या कहा?
न्यायालय ने टिप्पणी की कि कुछ मानवाधिकार संगठन आर्टिकल 21 का हवाला देकर अपराधियों के साथ कठोर बर्ताव का विरोध करते हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में पुलिस ऐसे समूहों की आपत्तियों की परवाह किए बिना सख्त कार्रवाई कर सकती है।
इस मामले में अगली सुनवाई कब होगी?
सर्वोच्च न्यायालय ने इस सुओ मोटो प्रकरण में अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को निर्धारित की है। उस सुनवाई में दिल्ली पुलिस द्वारा दाखिल एफिडेविट की समीक्षा की जाएगी और आगे के निर्देश जारी किए जा सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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