महिला आयोगों की कमजोर स्थिति: पीड़ितों की मदद कैसे करेंगी स्वाति मालीवाल?
सारांश
Key Takeaways
- महिला आयोगों की स्थिति कमजोर हो रही है।
- हर 15 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार का मामला।
- महिला आयोगों को अधिक अधिकार और संसाधन चाहिए।
- महिलाओं की सुरक्षा के लिए संस्थागत व्यवस्था आवश्यक है।
- पीड़ितों को न्याय दिलाने में आयोगों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली, 23 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। संसद में महिलाओं की सुरक्षा और महिला आयोगों की स्थिति पर गंभीर चर्चा हुई। राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने कहा कि देश में हर 15 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार की घटना होती है, लेकिन न्याय दिलाने के लिए स्थापित संस्थागत ढांचा आज कमजोर और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है।
उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना 1992 में हुई थी, लेकिन आज तक उसके पास पर्याप्त अधिकार, संसाधन और स्वायत्तता नहीं है। कई संसदीय समितियां वर्षों से इन कमियों को उजागर कर रही हैं, लेकिन उनकी रिपोर्टें कार्रवाई के अभाव में धूल फांक रही हैं और महिलाएं न्याय के लिए इंतजार करती रह जाती हैं। सांसद ने कहा कि झारखंड महिला आयोग जून 2020 से बंद पड़ा है, जबकि दिल्ली महिला आयोग भी पिछले दो वर्षों से लगभग निष्क्रिय स्थिति में है।
उन्होंने यह सवाल उठाया कि जब न्याय दिलाने वाली संस्थाएं ही बंद हो जाएंगी, तो महिलाएं अपनी शिकायत लेकर कहां जाएंगी। उन्होंने दिल्ली महिला आयोग के कामकाज का उदाहरण देते हुए बताया कि 2015 से 2024 के बीच आयोग ने 1 लाख 74 हजार मामलों की सुनवाई की। आयोग की हेल्पलाइन पर लगभग 40 लाख कॉल्स प्राप्त हुईं और उनका समाधान करने का प्रयास किया गया। इसके अलावा बलात्कार पीड़िताओं को लगभग 2 लाख अदालती मामलों की सुनवाई में सहायता प्रदान की गई।
इसके अतिरिक्त हजारों महिलाओं और लड़कियों को पीड़ित मुआवजा दिलाने में मदद की गई। उन्होंने कहा कि पहले दिल्ली आयोग की टीम 24 घंटे काम करती थी। रात के 2 बजे भी अगर किसी महिला या बच्ची की मदद के लिए कॉल आती थी, तो टीम तुरंत मौके पर पहुंचती थी। उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि दिल्ली की एक बड़ी कोठी से 14 साल
मालीवाल ने कहा कि ऐसी न जाने कितनी लड़कियां आज भी बंद कमरों के पीछे छुपी हुई हैं, जिन्हें मदद की जरूरत है। उन्होंने एक और घटना का उल्लेख किया, जब आधी रात को दरियागंज के एक होटल में छापा मारकर 39 नेपाली लड़कियों को बचाया गया था। सांसद ने कहा कि ऐसे बड़े ऑपरेशन केवल कागजी कार्रवाई से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं के माध्यम से ही संभव होते हैं।
उन्होंने दावा किया कि दिल्ली महिला आयोग को मजबूत बनाने के लिए दिन-रात मेहनत की गई, लेकिन बाद में राजनीतिक कारणों से उस व्यवस्था को कमजोर कर दिया गया। फंड रोक दिए गए, स्टाफ हटा दिया गया और आज आयोग में न तो अध्यक्ष है और न ही सदस्य। उन्होंने एक दर्दनाक घटना का भी उल्लेख किया, जिसमें मध्य प्रदेश की एक महिला को उसके ससुराल वालों ने तेजाब पिला दिया था।
उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं दिखाती हैं कि महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के लिए मजबूत संस्थागत व्यवस्था कितनी आवश्यक है। सांसद ने सरकार से मांग की कि महिला आयोगों को पर्याप्त अधिकार, संसाधन और स्वायत्तता दी जाए, ताकि वे प्रभावी ढंग से काम कर सकें और देश की महिलाओं को समय पर न्याय मिल सके। उन्होंने कहा कि यदि इन संस्थाओं को मजबूत नहीं किया गया, तो महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना और भी कठिन हो जाएगा।