बड़ा फैसला: गाजियाबाद रेप-मर्डर केस की जांच सुप्रीम कोर्ट ने SIT को सौंपी, महिला अधिकारी होंगी शामिल

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बड़ा फैसला: गाजियाबाद रेप-मर्डर केस की जांच सुप्रीम कोर्ट ने SIT को सौंपी, महिला अधिकारी होंगी शामिल

सारांश

गाजियाबाद में 4 साल की बच्ची से रेप-मर्डर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने SIT गठन का आदेश देते हुए UP के DGP को निर्देश दिया। महिला अधिकारी होंगी शामिल, दो हफ्ते में रिपोर्ट मांगी। पुलिस पर पीड़ित परिवार को बंद कर मारपीट के गंभीर आरोप।

Key Takeaways

  • सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल को गाजियाबाद रेप-मर्डर केस की जांच SIT को सौंपी।
  • UP के DGP को SIT गठित करने का आदेश दिया गया, जिसमें IG, SP और DSP रैंक की महिला अधिकारी अनिवार्य होंगी।
  • SIT को दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को सौंपनी होगी।
  • 16 मार्च को पड़ोसी आरोपी ने 4 साल की बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर यौन शोषण किया और बाद में उसकी मौत हो गई।
  • खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर और सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल ने इलाज से इनकार किया, SIT इनकी भूमिका भी जांचेगी।
  • पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया कि पुलिस ने थाने में बंद कर मारपीट की और मीडिया से न बोलने की धमकी दी।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

नई दिल्ली, 24 अप्रैल: गाजियाबाद में चार साल की मासूम बच्ची के साथ हुए बलात्कार और हत्या के सनसनीखेज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक हस्तक्षेप करते हुए पूरी जांच एक विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंप दी है। शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी को तत्काल एसआईटी गठित करने का निर्देश दिया है और अगले ही दिन से जांच दोबारा शुरू करने का आदेश दिया है।

एसआईटी की संरचना और अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गठित होने वाली एसआईटी में आईजी, एसपी और डीएसपी रैंक की एक-एक महिला पुलिस अधिकारी को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पीड़िता एक बालिका थी और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए महिला अधिकारियों की भागीदारी आवश्यक मानी गई।

एसआईटी को केवल मूल घटना की जांच तक सीमित नहीं रखा गया है। वह पीड़िता के माता-पिता की शिकायतों, गवाहों की सुरक्षा और दो निजी अस्पतालों की भूमिका की भी गहन जांच करेगी। अदालत ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि एसआईटी की पूरक रिपोर्ट प्राप्त होने तक सभी कार्यवाहियां स्थगित रखी जाएं।

एसआईटी को दो सप्ताह के भीतर जांच पूरी कर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार (न्यायिक) के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।

घटना का पूरा घटनाक्रम

16 मार्च को गाजियाबाद में यह दिल दहला देने वाली घटना घटी थी। आरोपी पड़ोसी ने चॉकलेट दिलाने का लालच देकर मासूम बच्ची को अपने साथ ले गया। जब बच्ची काफी देर तक घर नहीं लौटी तो परिजनों ने उसे तलाशना शुरू किया। बच्ची बेहोशी की हालत में खून से लथपथ मिली।

पीड़िता को सबसे पहले खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर ले जाया गया, जहां इलाज से इनकार कर दिया गया। इसके बाद सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल ने भी भर्ती करने से मना कर दिया। अंततः बच्ची को गाजियाबाद जिला अस्पताल पहुंचाया गया जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।

पुलिस पर गंभीर आरोप

पीड़िता के पिता ने याचिका में बताया कि जब वे थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने गए तो पुलिस ने उनके पूरे परिवार को एक कमरे में बंद कर मारपीट की। पीड़िता की मां को भी पीटा गया। परिवार को धमकी दी गई कि वे मीडिया से संपर्क न करें क्योंकि इससे आगामी चुनावों पर असर पड़ सकता है।

याचिका में यह भी दावा किया गया कि जांच महज खानापूर्ति थी और अहम साक्ष्यों को जानबूझकर दबाया गया। पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के आचरण पर भी सवाल उठाए गए। पीड़िता के माता-पिता निष्पक्ष सुनवाई को लेकर लगातार आशंकित हैं।

सुप्रीम कोर्ट की पहले की नाराज़गी

10 अप्रैल को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने इस मामले पर कड़ी नाराज़गी जताई थी। पीठ ने कहा था कि पुलिस ने यौन उत्पीड़न से संबंधित धाराएं तक नहीं लगाईं और दो निजी अस्पतालों ने जीवित बच्ची का इलाज करने से इनकार कर अमानवीय व्यवहार किया। अदालत ने तब पुलिस कमिश्नर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया था।

व्यापक संदर्भ और विश्लेषण

यह मामला अकेला नहीं है। उत्तर प्रदेश में बाल यौन शोषण के मामलों में पुलिस की लापरवाही और अस्पतालों द्वारा इलाज से इनकार की घटनाएं बार-बार सामने आती रही हैं। पॉक्सो अधिनियम के तहत सख्त प्रावधान होने के बावजूद जांच एजेंसियों की उदासीनता चिंताजनक है।

दो निजी अस्पतालों द्वारा एक घायल और यौन उत्पीड़न की शिकार बच्ची को इलाज से वंचित करना क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट और मेडिकल काउंसिल के नियमों का सीधा उल्लंघन है। यह विडंबना है कि जिस राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के दावे किए जाते हैं, वहां एक मरणासन्न बच्ची को अस्पताल से अस्पताल भटकना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट की यह सक्रियता न्यायपालिका के उस दृष्टिकोण को दर्शाती है जहां वह कार्यपालिका की विफलता की स्थिति में स्वयं हस्तक्षेप करती है। आने वाले दो सप्ताह में एसआईटी की रिपोर्ट न केवल इस मामले की दिशा तय करेगी बल्कि यह भी स्पष्ट करेगी कि उत्तर प्रदेश पुलिस और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही किस हद तक सुनिश्चित होती है।

Point of View

बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का आईना है जहां पुलिस पीड़ित को न्याय दिलाने की बजाय दबाने में लग जाती है और अस्पताल मुनाफे के लिए मरते हुए बच्चे को दरवाजे से लौटा देते हैं। यह विडंबना है कि 'कानून का राज' का दावा करने वाले राज्य में पीड़ित परिवार को थाने में बंद कर पीटा गया। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप स्वागतयोग्य है, लेकिन असली सवाल यह है कि बिना न्यायिक दबाव के क्या कभी न्याय मिलता? यह मामला पॉक्सो कानून की जमीनी विफलता और निजी अस्पतालों की जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस की मांग करता है।
NationPress
24/04/2026

Frequently Asked Questions

गाजियाबाद रेप-मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने UP के DGP को तत्काल SIT गठित करने का आदेश दिया है जिसमें IG, SP और DSP रैंक की महिला अधिकारी शामिल होंगी। SIT को दो हफ्ते में रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार के सामने पेश करनी होगी।
गाजियाबाद में 4 साल की बच्ची के साथ क्या हुआ था?
16 मार्च को पड़ोसी ने चॉकलेट का लालच देकर बच्ची को अपने साथ ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया। बच्ची खून से लथपथ और बेहोश मिली, दो अस्पतालों ने इलाज से इनकार किया और जिला अस्पताल में उसे मृत घोषित किया गया।
SIT में कौन-कौन से अधिकारी शामिल होंगे?
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि SIT में IG, SP और DSP रैंक की एक-एक महिला पुलिस अधिकारी अनिवार्य रूप से शामिल की जाएं। SIT पीड़ित परिवार की शिकायतों, गवाहों की सुरक्षा और निजी अस्पतालों की भूमिका की भी जांच करेगी।
पुलिस पर क्या आरोप लगाए गए हैं?
पीड़िता के पिता ने आरोप लगाया कि थाने में रिपोर्ट करने गए परिवार को कमरे में बंद कर मारा-पीटा गया और मीडिया से न बोलने की धमकी दी गई। पुलिस पर यौन उत्पीड़न की धाराएं न लगाने और सबूत छिपाने के भी आरोप हैं।
दो निजी अस्पतालों ने बच्ची का इलाज क्यों नहीं किया?
खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर और सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल दोनों ने बच्ची को भर्ती करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अमानवीय और असंवेदनशील करार दिया है और SIT इन अस्पतालों की भूमिका की भी जांच करेगी।
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