23 सितंबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट का पटना हाई कोर्ट के दुष्कर्म-कोशिश बरी फैसले पर स्वतः संज्ञान, CJI सूर्यकांत की पीठ ने जारी किया नोटिस

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सुप्रीम कोर्ट का पटना हाई कोर्ट के दुष्कर्म-कोशिश बरी फैसले पर स्वतः संज्ञान, CJI सूर्यकांत की पीठ ने जारी किया नोटिस

सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के उस फैसले पर स्वतः संज्ञान लिया जिसमें दुष्कर्म-कोशिश को महज 'गरिमा भंग' माना गया। CJI सूर्यकांत की पीठ ने 'आपत्तिजनक टिप्पणियों' पर नोटिस जारी किए — यह यौन अपराध मामलों में न्यायिक व्याख्या के लिए निर्णायक मोड़ बन सकता है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 23 सितंबर 2026 को पटना उच्च न्यायालय के दुष्कर्म-कोशिश बरी फैसले पर स्वतः संज्ञान लिया।
CJI सूर्यकांत , जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी.
मोहना की पीठ ने नोटिस जारी किया; मामला सुओ मोटो रिट पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 5/2026 दर्ज।
पटना हाई कोर्ट ने 9 जुलाई के फैसले में कपड़े उतारने और शारीरिक छेड़छाड़ को आईपीसी धारा 354 (गरिमा भंग) माना, धारा 376/511 (दुष्कर्म-प्रयास) नहीं।
मूल घटना 19 जनवरी 2008 को बिहार के बांका जिले में हुई; निचली अदालत ने आरोपी हिमांशु कुमार पाठक को 3 वर्ष कठोर कारावास सुनाया था।
इससे पहले 14 जुलाई को शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के रेप-प्रयास फैसले को रद्द कर 'तैयारी' और 'कोशिश' का अंतर स्पष्ट किया था।
राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को यौन अपराध मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर दिशानिर्देश बनाने का निर्देश पहले ही दिया जा चुका है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 23 सितंबर 2026 को पटना उच्च न्यायालय के उस विवादास्पद फैसले का स्वतः संज्ञान लिया, जिसमें दुष्कर्म की कोशिश के दोषी व्यक्ति को बरी करते हुए कहा गया था कि पीड़िता के कपड़े उतारना और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ करना बलात्कार के प्रयास की बजाय आईपीसी धारा 354 के अंतर्गत महिला की गरिमा भंग करने का अपराध है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में नोटिस जारी किया और स्पष्ट किया कि वह उच्च न्यायालय की विवादित टिप्पणियों की जाँच करेगी।

मूल मामला और पटना हाई कोर्ट का फैसला

यह मामला बिहार के बांका जिले के अमरपुर पुलिस थाने में 19 जनवरी 2008 को दर्ज हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता अपने पिता के साथ आरोपी हिमांशु कुमार पाठक उर्फ मिथिया पाठक के फोटोग्राफी स्टूडियो में गई थी। तस्वीर लेने के बाद आरोपी ने कथित तौर पर पीड़िता के पिता को कंप्यूटर पर तस्वीर दिखाने के बहाने हटाया, स्टूडियो का दरवाजा अंदर से बंद किया और दुष्कर्म के इरादे से पीड़िता के कपड़े उतारने की कोशिश की, स्वयं के कपड़े उतारे और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ की। पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता दरवाजे के पास पहुँचे, जिसके बाद आरोपी ने दरवाजा खोला और स्टूडियो से भाग गया।

निचली अदालत ने आरोपी को आईपीसी धारा 376/511 के तहत तीन वर्ष के कठोर कारावास और धारा 342 के तहत छह माह की जेल की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएँ एक साथ चलनी निर्धारित थीं।

हालाँकि, जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने 9 जुलाई को दिए अपने फैसले में सबूतों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए कहा कि पेनिट्रेशन का कोई प्रमाण नहीं था और अभियोजन पक्ष ने दुष्कर्म-कोशिश के समर्थन में कोई चिकित्सीय साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि चार्जशीट दाखिल करने वाले जाँच अधिकारी से मुकदमे के दौरान पूछताछ नहीं की गई थी। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के दोषसिद्धि एवं सजा के आदेश को रद्द करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया और जमा जुर्माना वापस करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति और नोटिस

CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान बिहार के महाधिवक्ता एस.डी. संजय से स्पष्ट कहा, 'इसमें कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ हैं।' पीठ ने यह भी संकेत दिया कि आरोपी को सुनने के बाद ही उच्च न्यायालय की उन टिप्पणियों को अभिलेख से हटाने पर विचार किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार सरकार को निर्देश दिया कि स्थानीय पुलिस के माध्यम से आरोपी को नोटिस तामील कराई जाए। इस मामले को सुओ मोटो रिट पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 5 ऑफ 2026 के रूप में दर्ज किया गया है।

पूर्व में इलाहाबाद हाई कोर्ट प्रकरण में दिया गया फैसला

गौरतलब है कि इससे पहले 14 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने दुष्कर्म-प्रयास से जुड़े एक अन्य स्वतः संज्ञान मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द किया था, जिसमें एक नाबालिग के विरुद्ध आरोपों को प्रथम दृष्टया दुष्कर्म-प्रयास नहीं माना गया था। उस मामले में शीर्ष अदालत ने 'तैयारी' और 'कोशिश' के बीच विधिक अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था कि तैयारी पूर्ण होते ही कोशिश का चरण शुरू हो जाता है।

यह ऐसे समय में आया है जब सर्वोच्च न्यायालय यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर लगातार सक्रिय रहा है। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को एक विशेषज्ञ समिति बनाने का भी निर्देश दिया था, जो यौन अपराधों और कमजोर स्थिति वाले पीड़ितों, शिकायतकर्ताओं तथा गवाहों से संबंधित मामलों में न्यायाधीशों के दृष्टिकोण एवं संवेदनशीलता पर दिशानिर्देश तैयार करे।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्वतः संज्ञान यौन अपराध मामलों में उच्च न्यायालयों द्वारा दी जाने वाली टिप्पणियों की न्यायिक निगरानी को और सशक्त करता है। आलोचकों का कहना है कि पटना उच्च न्यायालय की टिप्पणी, जिसमें आरोपी के कृत्य को 'रेप-प्रयास' की बजाय 'गरिमा भंग' तक सीमित माना गया, पीड़िताओं के न्याय-अधिकार पर प्रतिकूल संदेश देती है। सर्वोच्च न्यायालय अब इस पूरे विधिक प्रश्न की विस्तृत समीक्षा करेगा।

आगे की कार्यवाही

सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार सरकार और आरोपी दोनों को नोटिस जारी किए हैं। अगली सुनवाई में पीठ पटना उच्च न्यायालय की विवादित टिप्पणियों को अभिलेख से हटाने और व्यापक न्यायिक दिशानिर्देशों पर विचार करेगी। यह मामला देश भर की अदालतों में यौन अपराधों की व्याख्या के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि महज 'गरिमा भंग' है — विधिक तर्क की कसौटी पर ही नहीं, न्यायिक संवेदनशीलता की कसौटी पर भी गंभीर प्रश्न उठाती है। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ऐसे ही एक फैसले को रद्द करके 'तैयारी' और 'कोशिश' के बीच की विधिक रेखा खींच चुका है — फिर भी अधीनस्थ न्यायालयों में इस पर एकरूपता नहीं आई। असली सवाल यह है कि राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को दी गई दिशानिर्देश बनाने की जिम्मेदारी कितनी तेजी से जमीन पर उतरती है — क्योंकि बिना प्रशिक्षण और जवाबदेही के, ऐसे फैसले न्यायपालिका की विश्वसनीयता और पीड़िताओं के न्याय-विश्वास दोनों को क्षति पहुँचाते रहेंगे।
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के फैसले पर स्वतः संज्ञान क्यों लिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने पटना उच्च न्यायालय की उन टिप्पणियों को 'आपत्तिजनक' पाया जिनमें दुष्कर्म-कोशिश के आरोपी को बरी करते हुए पीड़िता के साथ हुए कृत्य को आईपीसी धारा 376/511 की बजाय धारा 354 के दायरे में रखा गया। CJI सूर्यकांत की पीठ इन टिप्पणियों की विधिक समीक्षा करेगी और आवश्यकता पड़ने पर इन्हें अभिलेख से हटाने पर विचार करेगी।
पटना हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी करते हुए क्या तर्क दिया था?
पटना उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने 9 जुलाई के फैसले में कहा था कि पेनिट्रेशन का कोई साक्ष्य नहीं था और अभियोजन पक्ष ने दुष्कर्म-प्रयास के समर्थन में कोई चिकित्सीय सबूत नहीं दिया। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि जाँच अधिकारी से मुकदमे के दौरान पूछताछ नहीं की गई, और निष्कर्ष निकाला कि आरोपी का कृत्य आईपीसी धारा 354 के अंतर्गत आता है।
यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के पिछले फैसले से कैसे जुड़ा है?
14 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक ऐसे ही फैसले को रद्द करते हुए 'तैयारी' और 'कोशिश' के बीच का कानूनी अंतर स्पष्ट किया था। उस मामले में भी एक नाबालिग के विरुद्ध आरोपों को दुष्कर्म-प्रयास नहीं माना गया था, जिसे शीर्ष अदालत ने गलत ठहराया था। पटना प्रकरण उसी विधिक प्रश्न का विस्तार है।
आईपीसी धारा 354 और धारा 376/511 में क्या फर्क है?
आईपीसी की धारा 354 महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल के इस्तेमाल से संबंधित है, जबकि धारा 376/511 बलात्कार की कोशिश का अपराध है जिसमें सजा कहीं अधिक कठोर है। सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में परिभाषित करेगा कि किन परिस्थितियों में कोई कृत्य 'कोशिश' की श्रेणी में आता है।
इस मामले में आगे क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार सरकार और आरोपी को नोटिस जारी किए हैं। बिहार सरकार को स्थानीय पुलिस के माध्यम से आरोपी को नोटिस तामील कराने का निर्देश दिया गया है। अगली सुनवाई में पीठ पटना उच्च न्यायालय की विवादित टिप्पणियों को हटाने और व्यापक न्यायिक दिशानिर्देशों पर विचार करेगी।
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