सिद्ध पीठ मां सुरकंडा देवी: गढ़वाल हिमालय का पवित्र शक्तिपीठ, ₹5 करोड़ रोपवे से दर्शन हुए आसान
सारांश
मुख्य बातें
गढ़वाल हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य, समुद्र तल से लगभग 2,757 मीटर (9,000 फीट) की ऊँचाई पर विराजमान सिद्ध पीठ मां सुरकंडा देवी मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक अत्यंत पूजनीय धाम है। उत्तराखंड के टिहरी जिले में स्थित यह मंदिर आस्था, प्रकृति और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम है, जो वर्ष भर लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। हाल ही में यहाँ ₹5 करोड़ की लागत से रोपवे सेवा आरंभ की गई है, जिससे बुज़ुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए माँ के दर्शन करना पहले से कहीं अधिक सुगम हो गया है।
पौराणिक महत्व और नामकरण की कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर विरागी होकर आकाश मार्ग से भ्रमण कर रहे थे, तब इसी पावन स्थल पर माता सती का सिर (मस्तक) गिरा था। इसी कारण इस स्थान का नाम पहले 'सिरकंडा' और कालांतर में 'सुरकंडा' पड़ा। यह धाम 51 शक्तिपीठों की श्रृंखला में विशेष स्थान रखता है क्योंकि यहाँ देवी के मस्तक का प्रतीकात्मक स्वरूप प्रतिष्ठित है। गौरतलब है कि शक्तिपीठों में माता के विभिन्न अंगों के गिरने की मान्यता है, और प्रत्येक पीठ अपने आप में एक विशिष्ट धार्मिक पहचान रखती है।
मुख्यमंत्री धामी का संदेश और रोपवे सेवा
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार, 24 सितंबर 2026 को एक वीडियो पोस्ट कर मंदिर के प्रति अपने भाव व्यक्त किए। उन्होंने लिखा, 'टिहरी जिले में सिद्ध पीठ मां सुरकंडा देवी मंदिर ने भक्तों की सुविधा के लिए ₹5 करोड़ रुपए की लागत से रोपवे सर्विस शुरू की है। इससे बुज़ुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए माँ के दर्शन करना और भी आसान हो गया है। रोपवे सर्विस शुरू होने से मंदिर आने वाले भक्तों की संख्या में भी काफी बढ़ोतरी हुई है।' कद्दूखाल से मंदिर तक संचालित यह रोपवे सेवा श्रद्धालुओं की सुगमता के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
गंगा दशहरा उत्सव की विशेषता
प्रत्येक वर्ष मई और जून के मध्य इस धाम में गंगा दशहरा का पर्व अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मंदिर के समीप एक विशेष जलधारा प्रवाहित होती है, जिसे गंगा के समान पवित्र माना जाता है। इसी पावन जल से माता का अभिषेक किया जाता है और यह उत्सव हजारों तीर्थयात्रियों की उपस्थिति में भव्यता से सम्पन्न होता है। यह उत्सव न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का जीवंत प्रतीक भी है।
प्राकृतिक सौंदर्य और जैव विविधता
नव-निर्मित सुरकंडा माता मंदिर रोंसली के वृक्षों के घने आवरण के बीच स्थित है, जो कोहरे की चादर में लिपटा होने पर अत्यंत मनोरम प्रतीत होता है। इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार और रंगों के पुष्प तथा दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त पश्चिमी हिमालय के कुछ दुर्लभ पक्षी भी यहाँ देखे जाते हैं, जो इस स्थान को प्रकृति प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनाते हैं। यह धाम आध्यात्मिक यात्रा के साथ-साथ प्रकृति-पर्यटन का भी एक उत्कृष्ट गंतव्य बनता जा रहा है।
आगामी संभावनाएँ
रोपवे सेवा आरंभ होने के बाद से मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जा रही है। यह सुविधा उत्तराखंड सरकार की धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की नीति का हिस्सा मानी जा रही है। आने वाले समय में इस धाम के और अधिक विकसित होने और तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलने की उम्मीद है।