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पीएमओ पोस्टिंग ठुकराई: 'मुस्लिम अधिकारी के रूप में नहीं, सक्षम IAS के रूप में पहचाना जाना चाहता था' — पूर्व सीईसी एस.वाई. कुरैशी

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पीएमओ पोस्टिंग ठुकराई: 'मुस्लिम अधिकारी के रूप में नहीं, सक्षम IAS के रूप में पहचाना जाना चाहता था' — पूर्व सीईसी एस.वाई. कुरैशी

सारांश

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी का खुलासा — उन्होंने पीएमओ पोस्टिंग इसलिए नहीं ठुकराई कि वह पद छोटा था, बल्कि इसलिए कि वह 'मुस्लिम कोटे' की नियुक्ति नहीं चाहते थे। यह एक वरिष्ठ नौकरशाह की धार्मिक पहचान और पेशेवर स्वाभिमान के बीच की अनकही जद्दोजहद है।

मुख्य बातें

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई.
कुरैशी ने पीएमओ में संयुक्त सचिव की नियुक्ति का प्रस्ताव ठुकरा दिया था।
कुरैशी की आशंका थी कि पीएमओ, गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय जैसे संवेदनशील विभागों में मुस्लिम होने के कारण उन पर अतिरिक्त निगरानी रखी जाएगी।
उन्होंने पीएमओ में अतिरिक्त सचिव एन.के.
सिन्हा को स्पष्ट कहा कि वह धार्मिक आधार पर नियुक्त नहीं होना चाहते।
तत्कालीन प्रधानमंत्री के सचिव के.आर.
वेणुगोपाल ने बताया कि छह महीने पहले कुरैशी का नाम सुझाया गया था, लेकिन 'एक मुस्लिम पहले से है' कहकर मना कर दिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम का विवरण कुरैशी की नई पुस्तक 'इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज, नॉट ए मेमॉयर' में है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने मंगलवार, 14 जुलाई को खुलासा किया कि उन्होंने एक समय प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में संयुक्त सचिव के पद पर नियुक्ति का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था। उनका कहना था कि वह एक सक्षम और प्रतिभाशाली आईएएस अधिकारी के रूप में पहचाने जाना चाहते थे — न कि केवल एक मुस्लिम अधिकारी के रूप में। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनके मन में यह आशंका थी कि पीएमओ, गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय जैसे संवेदनशील विभागों में मुस्लिम होने के कारण उन पर अतिरिक्त निगरानी रखी जा सकती है।

किताब में किया खुलासा

कुरैशी ने इस पूरे घटनाक्रम का उल्लेख अपनी नई पुस्तक 'इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज, नॉट ए मेमॉयर' में किया है। उन्होंने बताया कि उस समय वह युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे और साथ ही नेहरू युवा केंद्र संगठन (एनवाईकेएस) के महानिदेशक तथा राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के प्रमुख भी थे।

कुरैशी के अनुसार, एनवाईकेएस के अंतर्गत देशभर में तीन लाख युवा क्लब और एनएसएस के तहत 300 विश्वविद्यालय संचालित होते थे। उन्होंने कहा, 'मेरे पास सचिवालय और फील्ड, दोनों तरह की जिम्मेदारियाँ थीं। यह अपने आप में अनोखी नौकरी थी और मैं इसका पूरा आनंद ले रहा था। इसलिए मैं पीएमओ नहीं जाना चाहता था, जहाँ व्यक्ति गुमनाम होकर पर्दे के पीछे काम करता है।'

नियुक्ति की जानकारी अनौपचारिक रूप से मिली

कुरैशी ने बताया कि उन्हें पीएमओ में नियुक्ति की सूचना आधिकारिक तौर पर नहीं, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से मिली। उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उनकी सुरक्षा मंजूरी (सिक्योरिटी क्लियरेंस) पहले ही हो चुकी थी और नियुक्ति आदेश जारी होने वाला था। उन्होंने कहा, 'जब किसी ने मुझे बताया कि मेरी पीएमओ में नियुक्ति होने जा रही है, तो वह सोच रहा था कि मैं खुश हो जाऊँगा, लेकिन मैं हैरान रह गया।'

धार्मिक आधार पर नियुक्ति से इनकार

कुरैशी ने उस समय पीएमओ में अतिरिक्त सचिव एन.के. सिन्हा से स्पष्ट कह दिया था कि वह किसी धार्मिक आधार या 'कोटे' के तहत नियुक्त नहीं होना चाहते। उन्होंने कहा, 'मैंने उनसे कहा कि मैं मुस्लिम अधिकारी के रूप में पीएमओ नहीं आना चाहता। मैं एक प्रतिभाशाली और सक्षम अधिकारी के रूप में वहाँ आना चाहता हूँ।'

जब सिन्हा ने कहा कि वक्फ जैसे विषयों पर सलाह के लिए मुस्लिम अधिकारी की आवश्यकता होती है, तो कुरैशी ने सुझाव दिया कि उसके लिए किसी निदेशक स्तर के अधिकारी को नियुक्त किया जा सकता है।

वेणुगोपाल ने किया रुख का समर्थन

कुरैशी के अनुसार, बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री के सचिव के.आर. वेणुगोपाल ने उनके इस रुख का समर्थन किया। वेणुगोपाल ने उन्हें बताया कि उन्होंने छह महीने पहले ही कुरैशी का नाम पीएमओ के लिए सुझाया था, परंतु यह कहकर मना कर दिया गया कि वहाँ पहले से एक मुस्लिम अधिकारी कार्यरत है, इसलिए दूसरा नहीं रखा जा सकता। कुरैशी ने बताया, 'वेणुगोपाल ने मुझसे कहा कि तुम्हारा रुख बिल्कुल सही था।' उस पद पर कार्यरत अधिकारी का कार्यकाल दो वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया।

आगे का संदर्भ

यह खुलासा ऐसे समय में आया है जब सरकारी नौकरशाही में धार्मिक प्रतिनिधित्व और पेशेवर पहचान को लेकर बहस जारी है। कुरैशी की यह स्वीकारोक्ति — कि संवेदनशील मंत्रालयों में मुस्लिम अधिकारी होने पर अतिरिक्त संदेह की आशंका रहती है — नौकरशाही के भीतर धार्मिक पहचान की जटिलताओं को सामने रखती है। गौरतलब है कि कुरैशी आगे चलकर भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त बने, जो देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसी पर पीएमओ ने 'एक मुस्लिम पहले से है' का तर्क लगाया — यानी दोनों तरफ से धर्म ही मापदंड बना रहा, योग्यता नहीं। यह प्रकरण नौकरशाही में विविधता की बहस को एक नया और असहज आयाम देता है। मुख्यधारा की कवरेज इसे केवल एक 'व्यक्तिगत संस्मरण' मान रही है, जबकि असल सवाल यह है कि क्या संवेदनशील पदों पर नियुक्ति में धर्म आज भी अनौपचारिक मानदंड बना हुआ है।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एस.वाई. कुरैशी ने पीएमओ पोस्टिंग क्यों ठुकराई?
कुरैशी ने पीएमओ में संयुक्त सचिव की नियुक्ति इसलिए अस्वीकार की क्योंकि वह एक सक्षम IAS अधिकारी के रूप में पहचाने जाना चाहते थे, न कि 'मुस्लिम अधिकारी' के रूप में। उन्हें आशंका थी कि संवेदनशील मंत्रालयों में धार्मिक पहचान के कारण उन पर अतिरिक्त निगरानी रखी जाएगी।
कुरैशी को पीएमओ नियुक्ति की जानकारी कैसे मिली?
उन्हें यह जानकारी आधिकारिक तौर पर नहीं, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से मिली। तब तक उनकी सुरक्षा मंजूरी (सिक्योरिटी क्लियरेंस) भी हो चुकी थी और नियुक्ति आदेश जारी होने वाला था।
के.आर. वेणुगोपाल ने कुरैशी को क्या बताया?
तत्कालीन प्रधानमंत्री के सचिव के.आर. वेणुगोपाल ने कुरैशी को बताया कि उन्होंने छह महीने पहले उनका नाम पीएमओ के लिए सुझाया था, लेकिन यह कहकर मना कर दिया गया कि वहाँ पहले से एक मुस्लिम अधिकारी कार्यरत है। उस पद पर कार्यरत अधिकारी का कार्यकाल दो वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया।
कुरैशी की नई किताब किस बारे में है?
कुरैशी की पुस्तक 'इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज, नॉट ए मेमॉयर' उनके नौकरशाही जीवन के अनुभवों पर आधारित है। इसी पुस्तक में उन्होंने पीएमओ नियुक्ति ठुकराने के इस प्रकरण का विस्तृत विवरण दिया है।
उस समय कुरैशी किस पद पर कार्यरत थे?
उस समय कुरैशी युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे। साथ ही वह नेहरू युवा केंद्र संगठन (एनवाईकेएस) के महानिदेशक और राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के प्रमुख भी थे — जो देशभर में तीन लाख युवा क्लब और 300 विश्वविद्यालयों को कवर करती थी।
राष्ट्र प्रेस
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