तमिलनाडु में खरीफ धान का रकबा 28% गिरा, रबी मौसम से 125 लाख मीट्रिक टन लक्ष्य की उम्मीद
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु में खरीफ धान की खेती के रकबे में 28 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज होने के बाद राज्य का कृषि विभाग अब रबी मौसम (अक्टूबर–मार्च) पर टकटकी लगाए बैठा है, ताकि 2026-27 का 125 लाख मीट्रिक टन का वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्य हासिल किया जा सके। मेदूर बांध के खुलने में हुई देरी और कावेरी नदी में जल प्रवाह की कमी को इस संकट की जड़ बताया जा रहा है।
खरीफ रकबे में कितनी गिरावट
अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच राज्य में धान की खेती का रकबा 12.52 लाख हेक्टेयर रहा, जबकि 2025-26 में यह 17.5 लाख हेक्टेयर था। इस तरह 4.98 लाख हेक्टेयर की कमी आई — जो 28 प्रतिशत की गिरावट है और पानी की किल्लत के कृषि पर पड़ते प्रत्यक्ष असर को उजागर करती है।
कुरुवाई फसल में भी स्थिति बेहतर नहीं रही। राज्यभर में कुरुवाई खेती का रकबा पिछले वर्ष के 5.05 लाख हेक्टेयर से घटकर 3.91 लाख हेक्टेयर रह गया — यानी 1.14 लाख हेक्टेयर की कमी। डेल्टा जिलों में यह रकबा 2.55 लाख हेक्टेयर से सिकुड़कर 1.85 लाख हेक्टेयर तक आ गया।
रबी मौसम पर टिकी हैं उम्मीदें
कृषि विभाग के अनुसार रबी ऋतु के लिए खेती का लक्ष्य 30.26 लाख हेक्टेयर निर्धारित है। मौसम विभाग के सामान्य वर्षा पूर्वानुमान ने इस उम्मीद को और बल दिया है। विभाग का अनुमान है कि धान का योगदान 79 लाख मीट्रिक टन रहेगा।
गौरतलब है कि 2025-26 में तमिलनाडु ने 130.23 लाख मीट्रिक टन के लक्ष्य के मुकाबले केवल 122.43 लाख मीट्रिक टन का उत्पादन किया था — यानी लक्ष्य से 7.8 लाख मीट्रिक टन कम। इस पृष्ठभूमि में मौजूदा वर्ष का दबाव और अधिक है।
किसानों को सीधी बुवाई अपनाने की सलाह
जिलों को फसल संबंधी आकस्मिक योजनाएँ पहले ही उपलब्ध करा दी गई हैं, जिनमें किसानों को परंपरागत रोपाई के बजाय सीधी बुवाई (Direct Seeded Rice) अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। इस विधि में जल की आवश्यकता कम होती है और उत्तर-पूर्वी मानसून के दौरान फसल क्षति का जोखिम भी घटता है।
अधिकारियों का कहना है कि सांबा की खेती में तेजी आनी शुरू हो गई है और अगले 45 दिन इस मौसम की दिशा तय करने में निर्णायक साबित होंगे। साथ ही अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि खरीफ रकबे में आई कमी से अनाज की कमी का कोई तात्कालिक खतरा नहीं है।
सहकारी ऋण और उर्वरक पर असर
खेती में मंदी ने कृषि आपूर्ति श्रृंखला को भी प्रभावित किया है। मांग कमजोर होने के कारण राज्य की 4,400 प्राथमिक कृषि सहकारी ऋण समितियों में ₹300 करोड़ मूल्य के उर्वरक और बीज अनबिके पड़े हैं।
इस स्थिति से निपटने के लिए सहकारी विपणन संघ ने उर्वरकों की उपलब्धता का दायरा बढ़ा दिया है। अब सहकारी समिति के सदस्य न होने वाले किसान भी रियायती उर्वरक खरीद सकेंगे — पहले यह सुविधा केवल उन्हीं सदस्यों को मिलती थी जिन्होंने फसल ऋण लिया हो।
इसके अतिरिक्त, सहकारिता विभाग ने सहकारी बैंकों द्वारा ऋण वितरण में आई गिरावट के मद्देनजर फिलहाल फसल ऋण वसूली पर रोक लगा दी है — ताकि किसानों पर आर्थिक बोझ न बढ़े और कृषि गतिविधियाँ पुनः पटरी पर आ सकें।
आगे क्या होगा
यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण भारत के कई राज्य जल-संसाधन प्रबंधन और मानसून की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं। तमिलनाडु के लिए अगले डेढ़ माह की वर्षा और सांबा फसल की प्रगति ही तय करेगी कि राज्य वार्षिक खाद्यान्न लक्ष्य को कितना करीब छू पाएगा।