कावेरी डेल्टा में कुरुवई धान संकट: घटता भूजल, बढ़ता खारापन और मेट्टूर बांध से पानी का इंतज़ार
सारांश
मुख्य बातें
तंजावुर जिले सहित कावेरी डेल्टा के विभिन्न हिस्सों में कुरुवई धान की खेती इस सीजन तिहरे संकट की चपेट में है — तेज़ी से गिरता भूजल स्तर, भूजल में बढ़ती लवणता (खारापन), और मेट्टूर बांध से अब तक पानी न छोड़े जाने की स्थिति ने मिलकर किसानों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। 25 जुलाई तक की स्थिति के अनुसार, तंजावुर के पापनासम, तिरुवैयारु और आसपास के क्षेत्रों के किसान लगभग पूरी तरह भूजल के भरोसे अपनी खड़ी फसल बचाने की जद्दोजहद में हैं।
मुख्य घटनाक्रम
सामान्य वर्षों में 12 जून को मेट्टूर बांध से कावेरी का पानी छोड़ा जाता है, जिससे किसान शुरुआती भूजल सिंचाई के बाद नहरी पानी पर निर्भर हो जाते हैं। लेकिन इस वर्ष जलाशय में पर्याप्त जल भंडारण न होने के कारण यह वार्षिक प्रवाह संभव नहीं हो सका। कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, तंजावुर जिले में लगभग एक लाख एकड़ क्षेत्र में इस सीजन भूजल के सहारे कुरुवई की खेती की गई है।
स्थिति को और जटिल बनाते हुए, बुधवार को टैन्जेडको ने किसानों को सूचित किया कि कृषि पंप सेटों के लिए प्रतिदिन मिलने वाली मुफ्त बिजली आपूर्ति 18 घंटे से घटाकर 14 घंटे कर दी जाएगी। इससे किसानों की भूजल निकासी क्षमता और सीमित हो जाएगी।
पापनासम में सबसे गंभीर स्थिति
पापनासम ब्लॉक में लगभग 8,400 एकड़ में कुरुवई की खेती हुई है। इनमें से करीब 2,000 एकड़ में कटाई पूरी हो चुकी है, लेकिन शेष खेतों में सिंचाई संकट गहराने की आशंका बनी हुई है। पापनासम के गणपति अग्रहारम के किसान आर. अरुलसामी ने बताया कि भीषण गर्मी के कारण खेतों से पानी तेज़ी से वाष्पित हो रहा है और पिछले छह महीने से अधिक समय से कावेरी में पानी का प्रवाह नहीं हुआ है, जिससे भूजल स्तर प्रतिदिन नीचे जा रहा है।
भूजल में बढ़ती लवणता — एक अलग खतरा
वेल्लम पेरम्बुर, थेन पेरम्बुर, अल्लूर अजीसिकुडी और पनावेली जैसे गाँवों में भूजल की बढ़ती लवणता एक अलग चिंता बन गई है। किसानों के अनुसार, पूर्व के वर्षों में मेट्टूर बांध से समय पर छोड़ा गया पानी नहरों के ज़रिये भूजल का पुनर्भरण करता था और इससे खारापन भी नियंत्रित रहता था। इस वर्ष यह प्रक्रिया न होने से खारा भूजल सिंचाई को प्रभावित कर रहा है और फसल स्वास्थ्य के लिए सीधा खतरा बन गया है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
सीनियर एग्रो टेक्नोलॉजिस्ट फोरम के पी. कलैवानन के अनुसार, मेट्टूर जलाशय में इस समय केवल लगभग 35 टीएमसी फीट पानी है, जबकि इसकी कुल क्षमता 93.47 टीएमसी फीट है। उन्होंने कहा कि पहले अगस्त में बांध खोले जाने की उम्मीद थी, लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए अब सितंबर से पहले पानी छोड़े जाने की संभावना नहीं है।
कलैवानन ने यह भी सुझाव दिया कि यदि पूर्वोत्तर मानसून से पर्याप्त वर्षा होती है, तो किसान सितंबर में मध्यम अवधि वाली सांबा धान की सीधी बुवाई (डायरेक्ट सोइंग) अपनाकर आगामी सीजन को बचा सकते हैं।
किसानों की माँग और आगे की राह
कई किसानों ने तमिलनाडु सरकार से अपील की है कि 3 अगस्त को पड़ने वाले आदि पेरुक्कु पर्व से पहले मेट्टूर बांध से कम से कम सीमित मात्रा में पानी छोड़ा जाए। हालाँकि, कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान जल भंडारण की स्थिति को देखते हुए ऐसा होना मुश्किल है। यह संकट कावेरी डेल्टा की कृषि-निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी है — और पूर्वोत्तर मानसून की दस्तक ही अब किसानों की एकमात्र उम्मीद बची है।