10 अगस्त 2026
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टेलीग्राम बैन: दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, धारा 69A और इमरजेंसी पावर के इस्तेमाल की होगी समीक्षा

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टेलीग्राम बैन: दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, धारा 69A और इमरजेंसी पावर के इस्तेमाल की होगी समीक्षा

सारांश

नीट परीक्षा से पहले टेलीग्राम पर लगे बैन को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने 15 करोड़ यूज़र्स के अधिकारों और परीक्षा की विश्वसनीयता के बीच आनुपातिकता का सवाल उठाया — यह फैसला धारा 69A की सीमाएँ तय करने वाला अहम मिसाल बन सकता है।

मुख्य बातें

दिल्ली हाई कोर्ट ने 18 जून 2026 को टेलीग्राम बैन की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया।
जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने कहा — धारा 69A के तहत इमरजेंसी पावर के इस्तेमाल की सीमाओं की समीक्षा होगी।
अदालत ने सरकार से पूछा — 15 करोड़ यूज़र्स के अधिकार केवल परीक्षा की वजह से कैसे रोके जा सकते हैं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2024 के पेपर लीक में टेलीग्राम के डेट-एडिटिंग फीचर के दुरुपयोग का हवाला दिया।
टेलीग्राम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने तर्क दिया कि नीट परीक्षा भारत की संप्रभुता को प्रभावित नहीं करती।
यह फैसला भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत प्लेटफॉर्म ब्लॉक करने की शक्तियों की सीमाएँ तय करने वाला मिसाल बन सकता है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने 18 जून 2026 को नीट परीक्षा से पहले मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अदालत प्रतिबंध लागू करने की प्रक्रिया और धारा 69A के तहत इमरजेंसी पावर के इस्तेमाल की सीमाओं की समीक्षा करेगी।

मुख्य घटनाक्रम

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली रिव्यू कमेटी ने टेलीग्राम के अधिकारियों की दलीलें सुनी हैं और उन्हें रिकॉर्ड पर लिया गया है। टेलीग्राम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने दलील दी कि केंद्र सरकार का आदेश कानूनी खामियों से ग्रस्त है और समिति ने सर्वसम्मति से अंतरिम निर्देश की पुष्टि की सिफारिश की थी।

टेलीग्राम की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि नीट जैसी परीक्षा भारत की संप्रभुता और अखंडता पर असर नहीं डालती, इसलिए पूरे प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करना आनुपातिक कदम नहीं है। ध्रुव मेहता ने कहा, 'सैकड़ों व्यावसायिक गतिविधियाँ चल रही हैं — क्या यह आदेश भारत की अखंडता और संप्रभुता के हित में है?'

अदालत की टिप्पणियाँ

कोर्ट ने सरकार से सीधा सवाल पूछा कि '15 करोड़ लोगों के अधिकारों को सिर्फ इसलिए कैसे रोका जा सकता है, क्योंकि कुछ नागरिक परीक्षा दे रहे हैं।' अदालत ने यह भी कहा कि धारा 69A के तहत पावर का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन उसकी सीमा क्या होगी — यह केंद्रीय प्रश्न है। बेंच ने आनुपातिकता परीक्षण (proportionality test) का हवाला देते हुए कहा कि यह मामला उसी कसौटी पर परखा जाएगा।

सरकार का पक्ष

तुषार मेहता ने टेलीग्राम की प्राइवेसी पॉलिसी का हवाला देते हुए कहा कि अकाउंट डिलीट होने पर सारा डेटा, मैसेज और मीडिया भी मिट जाता है, जिससे जाँच में बाधा आती है। उन्होंने यह भी बताया कि टेलीग्राम के डेट और टाइम एडिटिंग फीचर का दुरुपयोग कर 2024 में पेपर लीक की घटना को अंजाम दिया गया था — परीक्षा के बाद पोस्ट किए गए पेपर की तारीख बदलकर पहले की दिखाई गई थी। सरकार ने यह भी कहा कि रिपोर्ट में टेलीग्राम को आतंकवादी गतिविधियों के लिए सबसे पसंदीदा प्लेटफॉर्म बताया गया है और इसकी आर्किटेक्चरल डिज़ाइन अन्य क्षेत्रों में भी चुनौतियाँ पैदा करती है।

मेहता ने अनुराधा भसीन केस का हवाला देते हुए तर्क दिया कि संभावित नुकसान और सार्वजनिक नुकसान के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है। उन्होंने कहा, 'राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा की पूरी विश्वसनीयता दाँव पर है — करोड़ों छात्रों को गुमराह नहीं होने देना ही इस कदम का एकमात्र उद्देश्य है।'

कानूनी बिंदु और आगे की राह

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह दो पहलुओं पर विचार करेगी — पहला, प्रतिबंध लागू करने की प्रक्रिया; दूसरा, इमरजेंसी पावर के इस्तेमाल की आवश्यकता। कोर्ट ने कहा, 'यदि आधार ही समाप्त हो जाता है, तो उस पर आधारित आदेश भी नहीं टिक सकता।' यह टिप्पणी टेलीग्राम के उस मुख्य तर्क की ओर इशारा करती है कि जब नीट परीक्षा समाप्त हो गई, तो प्रतिबंध का कोई औचित्य नहीं बचा।

गौरतलब है कि यह मामला भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत किसी प्लेटफॉर्म को पूरी तरह ब्लॉक करने के सरकार के अधिकार की सीमाओं को परिभाषित करने का एक अहम अवसर है। इस फैसले का असर भविष्य में इसी तरह के प्रतिबंध आदेशों पर भी पड़ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका उपयोग अब तक बिना पर्याप्त आनुपातिकता-परीक्षण के होता रहा है। अदालत की टिप्पणी — कि 'आधार समाप्त होने पर आदेश नहीं टिकता' — यह संकेत देती है कि न्यायपालिका इमरजेंसी पावर के मनमाने इस्तेमाल पर अंकुश लगाने के मूड में है। यदि फैसला टेलीग्राम के पक्ष में आता है, तो यह भविष्य के इंटरनेट शटडाउन और प्लेटफॉर्म ब्लॉक आदेशों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी बाधा बन जाएगा।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिल्ली हाई कोर्ट ने टेलीग्राम बैन पर क्या फैसला किया?
दिल्ली हाई कोर्ट ने 18 जून 2026 को टेलीग्राम बैन को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने कहा कि वह प्रतिबंध की प्रक्रिया और धारा 69A के तहत इमरजेंसी पावर के इस्तेमाल की सीमाओं की समीक्षा करेगी।
नीट परीक्षा से पहले टेलीग्राम पर बैन क्यों लगाया गया था?
केंद्र सरकार ने नीट परीक्षा से पहले टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया था। सरकार का तर्क था कि 2024 में टेलीग्राम के डेट-एडिटिंग फीचर का दुरुपयोग कर पेपर लीक की घटना को अंजाम दिया गया था और यह प्लेटफॉर्म अपनी आर्किटेक्चरल डिज़ाइन के कारण जाँच में बाधा डालता है।
धारा 69A क्या है और इस मामले में इसकी भूमिका क्या है?
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता या सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने का अधिकार देती है। इस मामले में अदालत यह तय करेगी कि नीट परीक्षा जैसे कारण के लिए इस आपातकालीन शक्ति का इस्तेमाल कितना उचित और आनुपातिक था।
टेलीग्राम ने अदालत में क्या दलीलें दीं?
टेलीग्राम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने तर्क दिया कि नीट परीक्षा भारत की संप्रभुता और अखंडता को प्रभावित नहीं करती, इसलिए पूरे प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करना आनुपातिक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जब परीक्षा समाप्त हो गई, तो प्रतिबंध का आधार ही खत्म हो जाता है और उस पर आधारित आदेश भी नहीं टिक सकता।
इस फैसले का भविष्य में क्या असर हो सकता है?
यह फैसला भारत में धारा 69A के तहत प्लेटफॉर्म ब्लॉक करने की सरकारी शक्तियों की सीमाएँ तय करने वाला एक अहम कानूनी मिसाल बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अदालत आनुपातिकता परीक्षण को अनिवार्य ठहराती है, तो भविष्य के इंटरनेट शटडाउन और प्लेटफॉर्म बैन आदेशों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा।
राष्ट्र प्रेस
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