टेलीग्राम बैन: दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, धारा 69A और इमरजेंसी पावर के इस्तेमाल की होगी समीक्षा
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाई कोर्ट ने 18 जून 2026 को नीट परीक्षा से पहले मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अदालत प्रतिबंध लागू करने की प्रक्रिया और धारा 69A के तहत इमरजेंसी पावर के इस्तेमाल की सीमाओं की समीक्षा करेगी।
मुख्य घटनाक्रम
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली रिव्यू कमेटी ने टेलीग्राम के अधिकारियों की दलीलें सुनी हैं और उन्हें रिकॉर्ड पर लिया गया है। टेलीग्राम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने दलील दी कि केंद्र सरकार का आदेश कानूनी खामियों से ग्रस्त है और समिति ने सर्वसम्मति से अंतरिम निर्देश की पुष्टि की सिफारिश की थी।
टेलीग्राम की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि नीट जैसी परीक्षा भारत की संप्रभुता और अखंडता पर असर नहीं डालती, इसलिए पूरे प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करना आनुपातिक कदम नहीं है। ध्रुव मेहता ने कहा, 'सैकड़ों व्यावसायिक गतिविधियाँ चल रही हैं — क्या यह आदेश भारत की अखंडता और संप्रभुता के हित में है?'
अदालत की टिप्पणियाँ
कोर्ट ने सरकार से सीधा सवाल पूछा कि '15 करोड़ लोगों के अधिकारों को सिर्फ इसलिए कैसे रोका जा सकता है, क्योंकि कुछ नागरिक परीक्षा दे रहे हैं।' अदालत ने यह भी कहा कि धारा 69A के तहत पावर का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन उसकी सीमा क्या होगी — यह केंद्रीय प्रश्न है। बेंच ने आनुपातिकता परीक्षण (proportionality test) का हवाला देते हुए कहा कि यह मामला उसी कसौटी पर परखा जाएगा।
सरकार का पक्ष
तुषार मेहता ने टेलीग्राम की प्राइवेसी पॉलिसी का हवाला देते हुए कहा कि अकाउंट डिलीट होने पर सारा डेटा, मैसेज और मीडिया भी मिट जाता है, जिससे जाँच में बाधा आती है। उन्होंने यह भी बताया कि टेलीग्राम के डेट और टाइम एडिटिंग फीचर का दुरुपयोग कर 2024 में पेपर लीक की घटना को अंजाम दिया गया था — परीक्षा के बाद पोस्ट किए गए पेपर की तारीख बदलकर पहले की दिखाई गई थी। सरकार ने यह भी कहा कि रिपोर्ट में टेलीग्राम को आतंकवादी गतिविधियों के लिए सबसे पसंदीदा प्लेटफॉर्म बताया गया है और इसकी आर्किटेक्चरल डिज़ाइन अन्य क्षेत्रों में भी चुनौतियाँ पैदा करती है।
मेहता ने अनुराधा भसीन केस का हवाला देते हुए तर्क दिया कि संभावित नुकसान और सार्वजनिक नुकसान के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है। उन्होंने कहा, 'राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा की पूरी विश्वसनीयता दाँव पर है — करोड़ों छात्रों को गुमराह नहीं होने देना ही इस कदम का एकमात्र उद्देश्य है।'
कानूनी बिंदु और आगे की राह
अदालत ने स्पष्ट किया कि वह दो पहलुओं पर विचार करेगी — पहला, प्रतिबंध लागू करने की प्रक्रिया; दूसरा, इमरजेंसी पावर के इस्तेमाल की आवश्यकता। कोर्ट ने कहा, 'यदि आधार ही समाप्त हो जाता है, तो उस पर आधारित आदेश भी नहीं टिक सकता।' यह टिप्पणी टेलीग्राम के उस मुख्य तर्क की ओर इशारा करती है कि जब नीट परीक्षा समाप्त हो गई, तो प्रतिबंध का कोई औचित्य नहीं बचा।
गौरतलब है कि यह मामला भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत किसी प्लेटफॉर्म को पूरी तरह ब्लॉक करने के सरकार के अधिकार की सीमाओं को परिभाषित करने का एक अहम अवसर है। इस फैसले का असर भविष्य में इसी तरह के प्रतिबंध आदेशों पर भी पड़ सकता है।