महिला आरक्षण संशोधन रोककर विपक्ष ने महिलाओं का अपमान किया — त्रिपुरा CM माणिक साहा का बड़ा हमला

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महिला आरक्षण संशोधन रोककर विपक्ष ने महिलाओं का अपमान किया — त्रिपुरा CM माणिक साहा का बड़ा हमला

सारांश

त्रिपुरा CM माणिक साहा ने 'इंडिया' गठबंधन पर महिला आरक्षण संशोधन रोकने का आरोप लगाया। 17 अप्रैल को संसद में यह संशोधन विपक्ष के विरोध से पास नहीं हो सका। 2023 में पारित महिला आरक्षण बिल लोकसभा व विधानसभाओं में 33%25 सीटें महिलाओं को देता है, लेकिन जनगणना व परिसीमन के बिना लागू नहीं हो सकता।

Key Takeaways

  • 17 अप्रैल 2025 को संसद में महिला आरक्षण बिल संशोधन 'इंडिया' गठबंधन के विरोध के कारण पास नहीं हो सका।
  • त्रिपुरा CM डॉ. माणिक साहा ने 23 अप्रैल को अगरतला में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विपक्ष पर महिला अपमान का आरोप लगाया।
  • महिला आरक्षण अधिनियम 2023 में लोकसभाराज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें देने का प्रावधान है।
  • यह बिल सितंबर 2023 में नई संसद के विशेष सत्र में दोनों सदनों से भारी बहुमत के साथ पारित हुआ था।
  • कानून के क्रियान्वयन के लिए जनगणना और परिसीमन अनिवार्य है — 2021 की जनगणना अभी तक लंबित है।
  • महिला आरक्षण की मांग 1996 से चली आ रही थी — 2023 में PM मोदी के नेतृत्व में यह ऐतिहासिक कानून बना।

अगरतला, 23 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री डॉ. माणिक साहा ने गुरुवार, 23 अप्रैल को विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि 17 अप्रैल को संसद में महिला आरक्षण बिल संशोधन को विपक्ष के विरोध की वजह से पास नहीं होने दिया गया, जो महिलाओं के प्रति सीधा अपमान है। उन्होंने यह बात अगरतला स्थित राज्य भाजपा कार्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही।

विपक्ष पर साहा का सीधा आरोप

मुख्यमंत्री माणिक साहा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 'इंडिया' गठबंधन महिला सशक्तीकरण की बात तो करता है, लेकिन जब संसद में महिलाओं को वास्तविक अधिकार देने का अवसर आया, तो उसने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए इसे रोक दिया। उनके अनुसार विपक्ष ने एक बार फिर पूरे देश की महिलाओं को उनके हक से वंचित किया।

साहा ने कहा, "विपक्ष सिर्फ स्वार्थी राजनीति में विश्वास रखता है। उन्हें महिलाओं की नहीं, अपनी सीटों की चिंता है।" उन्होंने इस संशोधन को भारत में महिला नेतृत्व के भविष्य और राष्ट्रीय विकास के लिए अत्यंत आवश्यक बताया।

महिला आरक्षण बिल 2023 — एक ऐतिहासिक कदम

महिला आरक्षण अधिनियम 2023 को सितंबर 2023 में नई संसद के विशेष सत्र में दोनों सदनों में भारी बहुमत से पास किया गया था। इसका मुख्य प्रावधान लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत यानी एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना है।

मुख्यमंत्री साहा ने इस कानून को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक क्रांतिकारी मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा कि यह कानून न केवल महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों को सुनिश्चित करता है, बल्कि महिला-नेतृत्व वाले विकास का मार्ग भी प्रशस्त करता है। इसमें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों के भीतर भी महिलाओं को आरक्षण का प्रावधान है।

यह कानून 15 वर्षों तक लागू रहेगा और प्रत्येक चुनाव के बाद परिसीमन प्रक्रिया के जरिए सीटों को रोटेट किया जाएगा, जिससे अधिकतम सीटों पर महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिल सके। जरूरत पड़ने पर संसद इस अवधि को आगे भी बढ़ा सकती है।

तीन दशकों की लड़ाई — इतिहास के आईने में

महिला आरक्षण की मांग भारत में लगभग तीन दशकों से चली आ रही है। यह बिल सबसे पहले 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा के कार्यकाल में पेश किया गया था, लेकिन पास नहीं हो सका।

1998 से 2003 के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कई बार प्रयास हुए, फिर भी बिल को लगातार बाधाओं का सामना करना पड़ा। 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यह राज्यसभा में पास हुआ, परंतु लोकसभा में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियों के विरोध के कारण यह अटक गया।

आखिरकार 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह ऐतिहासिक बिल दोनों सदनों में पारित हुआ — जो दशकों की प्रतीक्षा का अंत था।

गहरा विश्लेषण — राजनीति की असली परीक्षा

यह विवाद केवल एक संशोधन तक सीमित नहीं है। गौरतलब है कि 'इंडिया' गठबंधन के कई घटक दल — विशेषकर सपा और राजद — दशकों से महिला आरक्षण के विरोध में रहे हैं। उनका तर्क रहा है कि आरक्षण में OBC महिलाओं के लिए अलग कोटा होना चाहिए। आलोचकों का कहना है कि यह तर्क वास्तव में अपने जातिगत वोटबैंक को सुरक्षित रखने की रणनीति है।

दूसरी ओर, भाजपा के लिए यह मुद्दा राजनीतिक रूप से लाभकारी है — खासकर तब जब 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद से महिला मतदाताओं की भागीदारी और प्राथमिकताएं निर्णायक बनती जा रही हैं। CM साहा का यह बयान उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।

आगे क्या होगा

महिला आरक्षण कानून के क्रियान्वयन के लिए परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया पूरी होना अनिवार्य है। 2021 की जनगणना अभी तक लंबित है, जिसके बिना यह कानून व्यावहारिक रूप से लागू नहीं हो सकता। अब देखना होगा कि सरकार जनगणना और परिसीमन की समयसीमा कब तय करती है — यही इस ऐतिहासिक कानून की असली कसौटी होगी।

Point of View

लेकिन जनगणना और परिसीमन को लटकाए रखकर इसके क्रियान्वयन को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया — यह विरोधाभास किसी की नजर में नहीं आता। दूसरी ओर, विपक्ष का 'OBC कोटे' वाला तर्क दशकों से वही रहा है — जो असल में जातिगत वोटबैंक की रक्षा का औजार बन चुका है। CM साहा का यह बयान तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन जब तक सरकार जनगणना की तारीख घोषित नहीं करती, यह महिला सशक्तीकरण की बात महज चुनावी बयानबाजी ही लगेगी।
NationPress
23/04/2026

Frequently Asked Questions

महिला आरक्षण बिल संशोधन 17 अप्रैल को क्यों पास नहीं हुआ?
त्रिपुरा CM माणिक साहा के अनुसार, 17 अप्रैल को संसद में महिला आरक्षण बिल का संशोधन 'इंडिया' गठबंधन के विरोध के कारण पास नहीं हो सका। उन्होंने विपक्ष पर स्वार्थी राजनीति को महिला सशक्तीकरण से ऊपर रखने का आरोप लगाया।
महिला आरक्षण बिल 2023 में क्या प्रावधान हैं?
महिला आरक्षण अधिनियम 2023 के तहत लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित होंगी। इसमें SC और ST आरक्षित सीटों के भीतर भी महिलाओं को कोटा मिलेगा और यह कानून 15 वर्षों तक लागू रहेगा।
महिला आरक्षण बिल कब से लागू होगा?
यह कानून तभी लागू होगा जब जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होगी। 2021 की जनगणना अभी तक लंबित है, जिसके कारण इस कानून का व्यावहारिक क्रियान्वयन अनिश्चित बना हुआ है।
महिला आरक्षण बिल का इतिहास क्या है?
यह बिल पहली बार 1996 में PM एच. डी. देवेगौड़ा के कार्यकाल में पेश हुआ था। 2010 में राज्यसभा में पास हुआ पर लोकसभा में अटक गया। अंततः 2023 में PM मोदी के नेतृत्व में दोनों सदनों में पारित हुआ।
'इंडिया' गठबंधन ने महिला आरक्षण का विरोध क्यों किया?
विपक्ष के कुछ दलों का तर्क रहा है कि आरक्षण में OBC महिलाओं के लिए अलग कोटा होना चाहिए। हालांकि भाजपा और CM साहा जैसे नेताओं का कहना है कि यह महज वोटबैंक की राजनीति है और इससे महिलाओं का अहित होता है।
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