ट्रंप की भारतीय वोटर आईडी तारीफ पर जमात-ए-इस्लामी हिंद बोली — अमेरिकी सर्टिफिकेट की दरकार नहीं
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत की फोटो पहचान पत्र प्रणाली की सराहना किए जाने के बाद जमात-ए-इस्लामी हिंद के राष्ट्रीय मीडिया सचिव सलमान अहमद ने 22 अगस्त को स्पष्ट प्रतिक्रिया दी — भारत को अपनी चुनावी व्यवस्था के लिए किसी विदेशी मान्यता की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने साथ ही विशेष सारांश पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से बाहर होना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।
ट्रंप ने क्या कहा था
ट्रंप ने अपने बयान में भारत का उदाहरण देते हुए कहा था कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में फोटो पहचान पत्र अनिवार्य है, इसलिए अमेरिका में भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। उनके इस बयान को कई हलकों में भारतीय चुनाव आयोग की प्रशंसा के रूप में पेश किया गया।
हालाँकि सलमान अहमद ने इस व्याख्या को सुधारते हुए कहा, 'ट्रंप ने चुनाव आयोग की सराहना नहीं की। उन्होंने केवल यह कहा कि भारत में फोटो पहचान अनिवार्य है और अमेरिका में भी यही होना चाहिए।'
आत्मनिर्भरता पर जोर
अहमद ने कहा कि यदि ट्रंप की बात सही भी है, तो यह अपने आप में पर्याप्त नहीं है कि कोई विदेशी नेता हमारी व्यवस्था की तारीफ करे। उन्होंने कहा, 'हमें खुद पर इतना भरोसा होना चाहिए कि अमेरिकी वैलिडेशन की जरूरत न पड़े। ऐसा नहीं है कि अमेरिका हमारी सराहना करे तो हम अच्छे हैं और न करे तो बुरे।'
यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत-अमेरिका संबंधों पर राजनीतिक बहस तेज है और ट्रंप के बयानों को लेकर देश में अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।
एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल
जमात-ए-इस्लामी हिंद के राष्ट्रीय मीडिया सचिव ने विशेष सारांश पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया की आलोचना करते हुए कहा कि जिन राज्यों में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहाँ के आँकड़े चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा, 'बंगाल और दूसरे राज्यों के नंबर देखिए — सालों से वोट देने वाले कई असली नागरिकों के नाम एसआईआर रोल में नहीं आ पाए। बाद में पता चला कि कई लोग तकनीकी वजहों से बाहर हो गए।'
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, 'इसमें कोई शक नहीं कि एसआईआर की यह प्रक्रिया खास सफल नहीं रही है।'
मतदान अधिकार और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी
अहमद ने लोकतंत्र में मतदान के अधिकार को 'बुनियादी अधिकार' बताते हुए कहा कि नाम की वर्तनी में गलती या किसी तकनीकी कारण से किसी को मताधिकार से वंचित करना 'नाइंसाफी और अधिकारों का उल्लंघन' है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह जिम्मेदारी मतदाता की नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की है कि वह सुनिश्चित करे कि हर योग्य नागरिक अपने मत का उपयोग कर सके। गौरतलब है कि एसआईआर को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों और नागरिक समाज संगठनों की ओर से भी इसी तरह की आपत्तियाँ उठाई जाती रही हैं।
आगे की राह
जमात-ए-इस्लामी हिंद की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब एसआईआर प्रक्रिया को लेकर न्यायिक और संसदीय स्तर पर भी सवाल उठ रहे हैं। चुनाव आयोग की जवाबदेही और मतदाता सूची की सटीकता आने वाले चुनावों के मद्देनजर एक केंद्रीय मुद्दा बनती जा रही है।