उज्जैन: विज्ञान और धर्म का अद्वितीय संगम - सीएम मोहन यादव
सारांश
Key Takeaways
- उज्जैन का धर्म और विज्ञान का अद्वितीय संगम है।
- महाकाल को काल का अधिष्ठाता माना जाता है।
- सिंहस्थ महापर्व 2028 में होगा।
- उज्जैन की ऐतिहासिकता और वैज्ञानिक महत्व को मान्यता मिलेगी।
- अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों की भागीदारी।
उज्जैन, 3 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि उज्जैन न केवल धर्म की नगरी है, बल्कि यह विज्ञान का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र है। महाकाल की इस पावन भूमि में विज्ञान, गणित, खगोल और ब्रह्मांड का गहन चिंतन सदियों से विद्यमान रहा है।
उज्जैन के तारामंडल परिसर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 'महाकाल-द मास्टर ऑफ टाइम' का उद्घाटन करते हुए सीएम मोहन यादव ने कहा कि उज्जैन का इतिहास काल गणना के क्षेत्र में अद्वितीय है। यहाँ प्राचीन काल में सूर्य की छाया से समय मापने की कला विकसित की गई थी। प्राचीन भारतीय भूगोल के अनुसार, उज्जैन कर्क रेखा पर स्थित है और इसे पृथ्वी का मध्य बिंदु माना जाता था। ग्रीनविच के वैश्विक मानक के अस्तित्व में आने से सदियों पहले, शून्य देशांतर रेखा उज्जैन से होकर गुजरती थी। जब पश्चिम में खगोल शास्त्र का ज्ञान भी नहीं था, तब उज्जैन के ज्योतिषी और विद्वान नक्षत्र की स्थिति का ज्ञान देते थे। जब दुनिया समय को परिभाषित करना सीख रही थी, तब यहाँ महर्षियों ने खगोलीय गणनाओं का वैश्विक मानक स्थापित किया।
उन्होंने कहा कि विज्ञान के अनुसार, ब्रह्मांड की हर वस्तु समय के अधीन है, लेकिन शिव उस अनंत का प्रतीक हैं, जहाँ से समय का जन्म होता है और जहाँ समय का अंत होता है। इसीलिए, वे काल के अधिष्ठाता हैं। विज्ञान यह मानता है कि समय और अंतरिक्ष एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। हमारे शास्त्रों में युगों पहले, शिव को विश्व स्वरूप और महाकाल कहकर इसी वैज्ञानिक सत्य को प्रतिपादित किया गया था।
उन्होंने आगे कहा कि आने वाला सिंहस्थ 2028 उज्जैन की गरिमा को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का एक अनूठा अवसर है। इस सिंहस्थ में लगभग 40 करोड़ श्रद्धालु आएंगे, जो महाकाल के दर्शन के साथ-साथ इस काल गणना के केंद्र के वैज्ञानिक महत्व को भी जानेंगे। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि यदि हमारे धार्मिक स्थलों का अध्ययन किया जाए, तो उज्जैन, काशी, कांची और पुरी धाम भारतीय ज्ञान परंपरा के विज्ञान-कला-संस्कृति-साहित्य-आध्यात्मिक प्रयोगशालाएं हैं। विज्ञान अध्यात्म के बिना अधूरा है। महाकाल की नगरी उज्जैन हमारी संस्कृति का पवित्र स्थान है, जिसका विशेष सांस्कृतिक महत्व है। दुनिया के किसी भी अनुसंधान को देखा जाए तो उज्जैन के बिना काल की गणना अधूरी है।
कार्यक्रम में लेखक और विचारक सुरेश सोनी ने कहा कि एक समय था, जब काल की गणना उज्जैन से होती थी। यहाँ काल के प्रतीक महाकाल परिसर में कर्कराजेश्वर मंदिर है। प्रसिद्ध पुरातत्वविद सर वीएस वाकणकर ने बताया कि कर्क रेखा कालांतर में स्थान बदल रही है।
उन्होंने कहा कि अब आधुनिक तकनीक जीपीएस से भी यह सिद्ध हो गया है कि कर्क रेखा का केंद्र बिंदू उज्जैन के पास डोंगला में शिफ्ट हो गया है। इस सम्मेलन का उद्देश्य उज्जैन को वैश्विक काल गणना का केंद्र बनाना है। एमपीसीएसटी के महानिदेशक अनिल कोठारी ने कहा कि यहाँ तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाकाल- द मास्टर ऑफ टाइम’ में देशभर के 1000 से अधिक विद्यार्थी भी शामिल हुए हैं। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य उज्जैन को काल गणना का प्रमुख केंद्र बनाना है। कार्यक्रम में अनेक वरिष्ठ वैज्ञानिक, खगोलशास्त्री, ज्योतिषी, शिक्षाविद एवं बड़ी संख्या में शोधार्थी-विद्यार्थी उपस्थित थे।