यूपी चकबंदी: 8 वर्षों में 21.12 लाख वादों का निस्तारण, 3,192 गांवों में प्रक्रिया पूरी
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश में चकबंदी व्यवस्था को पिछले आठ वर्षों में उल्लेखनीय गति मिली है। चकबंदी निदेशालय के आंकड़ों के अनुसार, 2017 से 2025 के बीच चकबंदी प्रक्रिया पूर्ण करने वाले गांवों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है और न्यायालयों में 21 लाख 12 हजार 784 वादों का निस्तारण किया गया है। किसानों की भूमि से जुड़े दीर्घकालिक विवादों के समाधान की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक उपलब्धि मानी जा रही है।
गांवों में चकबंदी की प्रगति
निदेशालय के अनुसार, वर्ष 2017 में जहाँ 1,925 गांवों में चकबंदी प्रक्रिया पूरी हुई थी, वहीं वर्ष 2025 तक यह संख्या बढ़कर 3,192 गांव हो गई। इन गांवों में प्रक्रिया पूरी करने के बाद भूमि अभिलेख संबंधित तहसीलों को वापस कर दिए गए। इससे किसानों के राजस्व संबंधी कार्यों को व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाने में सहायता मिली है।
वादों के निस्तारण में बड़ी छलांग
चकबंदी न्यायालयों में लंबित मामलों के निपटारे के मामले में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज हुआ है। 2017 में 12.55 लाख से अधिक वादों के निस्तारण की स्थिति थी, जो 2025 तक बढ़कर 21.12 लाख से अधिक हो गई। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, इन आठ वर्षों में कुल 21,12,784 वादों का निस्तारण किया गया। गौरतलब है कि भूमि विवाद ग्रामीण उत्तर प्रदेश में कृषि उत्पादकता और सामाजिक शांति — दोनों को प्रभावित करते हैं, इसलिए यह प्रगति व्यापक महत्व रखती है।
न्यायालयों का कंप्यूटरीकरण
चकबंदी व्यवस्था को तकनीक से जोड़ने के लिए न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण पर विशेष बल दिया गया। 2017 में इस मद में स्थिति शून्य थी, जबकि 2025 तक कुल 531 न्यायालयों का कंप्यूटरीकरण पूरा किया जा चुका है। इनमें उप संचालक चकबंदी, बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी, चकबंदी अधिकारी के न्यायालय तथा 180 सहायक चकबंदी अधिकारी न्यायालय शामिल हैं। यह डिजिटलीकरण न्यायालयी कामकाज में पारदर्शिता और समयबद्धता लाने का प्रयास है।
नवप्रसार में शामिल गांव
चकबंदी प्रक्रिया के नवप्रसार के अंतर्गत पिछले आठ वर्षों में कुल 1,302 गांवों को शामिल किया गया। यह ऐसे समय में आया है जब 2017 में इस श्रेणी में 2,468 गांव दर्ज थे। विभागीय आंकड़ों में इसे आठ वर्षों के दौरान चकबंदी क्रियाओं में समाहित किए गए गांवों के रूप में दर्शाया गया है। इसका उद्देश्य भूमि के बिखरे टुकड़ों को एकीकृत कर किसानों को सुसंगत खेती योग्य भूखंड उपलब्ध कराना है।
आम जनता पर असर
चकबंदी प्रक्रिया सीधे तौर पर किसानों की भूमि-स्वामित्व सुरक्षा से जुड़ी है। न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण और वादों के त्वरित निस्तारण से किसानों को लंबे कानूनी उलझनों से राहत मिलने की उम्मीद है। भूमि अभिलेखों के समय पर तहसीलों तक पहुँचने से बैंक ऋण, फसल बीमा और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में भी सुविधा होगी। राज्य सरकार का लक्ष्य इस व्यवस्था को और अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाना है।