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वैजयंतीमाला की 92वीं जयंती: डल झील में डूबते-डूबते बचीं, पैर में घुसी कील — सुपरस्टार की अनकही दास्तान

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वैजयंतीमाला की 92वीं जयंती: डल झील में डूबते-डूबते बचीं, पैर में घुसी कील — सुपरस्टार की अनकही दास्तान

सारांश

डल झील में डूबते-डूबते बचना, पैर में कील घुसना — वैजयंतीमाला की आत्मकथा 'बॉन्डिंग… ए मेमॉयर' बताती है कि पुराने हिंदी सिनेमा की चमक के पीछे कितना दर्द था। 92वीं जयंती पर उनका यह सफर आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

मुख्य बातें

वैजयंतीमाला का जन्म 13 अगस्त 1933 को मद्रास (चेन्नई) में हुआ; 2025 में वह 92 वर्ष की हो रही हैं।
तमिल फिल्म 'थेन्निलावु' की शूटिंग के दौरान डल झील में डूबने से कैमरामैन ने बचाया; अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।
फिल्म 'सूरज' (1966) की शूटिंग में लकड़ी के मंच पर नृत्य के दौरान कील पैर में घुस गई।
1969 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार दिवस समारोह में प्रस्तुति देने वाली पहली भारतीय नृत्यांगना बनीं।
1984 और 1989 में लोकसभा सदस्य; 1993 में राज्यसभा के लिए नामित।
9 मई 2024 को राष्ट्रपति भवन में पद्म विभूषण से सम्मानित।

हिंदी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री और भरतनाट्यम की साधिका वैजयंतीमाला का जन्म 13 अगस्त 1933 को मद्रास (अब चेन्नई) में हुआ था। उनकी 92वीं जयंती के अवसर पर उनकी आत्मकथा 'बॉन्डिंग… ए मेमॉयर' में दर्ज वे किस्से फिर चर्चा में हैं, जो पर्दे की चमक के पीछे छिपी कठिनाइयों को उजागर करते हैं — जिनमें डल झील में लगभग डूब जाने और शूटिंग के दौरान पैर में कील घुसने की घटनाएँ शामिल हैं।

शुरुआत: कला और संस्कृति की विरासत

वैजयंतीमाला का परिवार दक्षिण भारत की कला और संस्कृति से गहराई से जुड़ा था। बचपन से ही उन्हें भरतनाट्यम की विधिवत शिक्षा मिली, जो आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी। उन्होंने 1949 में तमिल फिल्म 'वाझकाई' से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। इसके बाद हिंदी सिनेमा में 'बहार' ने उनके लिए नया दरवाज़ा खोला।

कुछ ही वर्षों में 'नागिन', 'देवदास', 'नया दौर', 'मधुमती', 'गंगा जमना', 'संगम', 'ज्वेल थीफ' और 'आम्रपाली' जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों की पहली पंक्ति में खड़ा कर दिया। उन्होंने भरतनाट्यम को व्यावसायिक सिनेमा के परदे पर इस तरह उतारा कि उस दौर की नायिका की छवि ही बदल गई।

डल झील में जानलेवा हादसा

उनकी आत्मकथा में सबसे चौंकाने वाला प्रसंग कश्मीर की डल झील पर फिल्माए गए एक दृश्य से जुड़ा है। तमिल फिल्म 'थेन्निलावु' की शूटिंग के दौरान एक जलीय दृश्य के लिए वह झील में उतरी थीं। इसी दौरान वह पानी में गिर गईं और लगभग डूबने की कगार पर पहुँच गईं। तभी मौजूद कैमरामैन ने पानी में छलांग लगाकर उन्हें बाहर निकाला। इस हादसे के बाद उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा।

यह ऐसे समय में आया है जब हिंदी सिनेमा के पुराने दौर में न बड़े स्टूडियो थे, न सुरक्षा के पर्याप्त इंतज़ाम, और न ही बॉडी डबल या ग्राफिक्स जैसी आधुनिक तकनीक। कलाकारों को खतरनाक दृश्य भी खुद ही करने पड़ते थे।

फिल्म 'सूरज' की शूटिंग में कील का हादसा

1966 में प्रदर्शित फिल्म 'सूरज' की शूटिंग के दौरान एक और दर्दनाक घटना हुई। वैजयंतीमाला लकड़ी से बने एक मंच पर नृत्य कर रही थीं, तभी लकड़ी से निकली एक कील उनके पैर में घुस गई। उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता दी गई। इस हादसे का उल्लेख उन्होंने अपनी आत्मकथा में विस्तार से किया है।

सिनेमा से संसद तक का सफर

वैजयंतीमाला का करियर केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अपने अभिनय के साथ-साथ भरतनाट्यम को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी प्रतिष्ठित किया। 1969 में वह संयुक्त राष्ट्र की 20वीं वर्षगांठ के मानवाधिकार दिवस समारोह में प्रस्तुति देने वाली पहली भारतीय नृत्यांगना बनीं — यह उपलब्धि अपने आप में ऐतिहासिक थी।

बाद में वह राजनीति में भी सक्रिय हुईं। 1984 और 1989 में वह लोकसभा की सदस्य रहीं, और 1993 में उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया।

सम्मान और विरासत

वैजयंतीमाला को 1968 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। कई फिल्मफेयर पुरस्कार और नृत्य से जुड़े प्रतिष्ठित सम्मान भी उन्हें मिले। 9 मई 2024 को राष्ट्रपति भवन में भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाज़ा।

उनकी जयंती पर उनका यह सफर याद दिलाता है कि भारतीय सिनेमा की नींव केवल ग्लैमर पर नहीं, बल्कि कलाकारों के अदम्य साहस और समर्पण पर टिकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तब यह सोचना ज़रूरी है कि उस दौर के कलाकारों की शारीरिक और मानसिक कीमत का कभी सही आकलन हुआ या नहीं। उनका संसदीय करियर और पद्म विभूषण सम्मान महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मुख्यधारा की कवरेज अक्सर उन खतरों को नज़रअंदाज़ कर देती है जो उस युग के हर बड़े नाम ने झेले। यह जयंती उन्हें महज़ 'लीजेंड' के खाने में रखने का नहीं, बल्कि उनके संघर्ष को ईमानदारी से दर्ज करने का अवसर है।
RashtraPress
12 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वैजयंतीमाला डल झील में कैसे डूबते-डूबते बचीं?
तमिल फिल्म 'थेन्निलावु' की कश्मीर में शूटिंग के दौरान डल झील में एक जलीय दृश्य फिल्माते समय वैजयंतीमाला पानी में गिर गईं और लगभग डूब गईं। मौके पर मौजूद कैमरामैन ने पानी में छलांग लगाकर उन्हें बाहर निकाला और इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया।
वैजयंतीमाला की आत्मकथा 'बॉन्डिंग… ए मेमॉयर' में क्या है?
'बॉन्डिंग… ए मेमॉयर' में वैजयंतीमाला ने अपने फिल्मी करियर के पर्दे के पीछे के किस्से साझा किए हैं, जिनमें डल झील का डूबने वाला हादसा और फिल्म 'सूरज' की शूटिंग में पैर में कील घुसने की घटना शामिल हैं। यह किताब उनके जीवन के व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों पहलुओं को उजागर करती है।
वैजयंतीमाला को पद्म विभूषण कब मिला?
भारत सरकार ने वैजयंतीमाला को 9 मई 2024 को राष्ट्रपति भवन में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। यह देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। इससे पहले उन्हें 1968 में पद्म श्री मिल चुका था।
वैजयंतीमाला का राजनीतिक करियर कैसा रहा?
वैजयंतीमाला फिल्मी करियर के बाद राजनीति में भी सक्रिय हुईं। वह 1984 और 1989 में लोकसभा की सदस्य रहीं और 1993 में उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया।
वैजयंतीमाला ने भरतनाट्यम को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कैसे पहुँचाया?
वैजयंतीमाला 1969 में संयुक्त राष्ट्र की 20वीं वर्षगांठ के मानवाधिकार दिवस समारोह में भरतनाट्यम प्रस्तुति देने वाली पहली भारतीय नृत्यांगना बनीं। उन्होंने विदेशों में भी भारतीय शास्त्रीय नृत्य का प्रदर्शन किया और इसे वैश्विक पहचान दिलाई।
राष्ट्र प्रेस
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