17 अगस्त 2026
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केरल: पिनाराई विजयन ने गवर्नर अर्लेकर पर साधा निशाना, कहा — संविधान का हो रहा खुला उल्लंघन

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केरल: पिनाराई विजयन ने गवर्नर अर्लेकर पर साधा निशाना, कहा — संविधान का हो रहा खुला उल्लंघन

सारांश

केरल में विपक्ष नेता पिनाराई विजयन ने गवर्नर अर्लेकर पर संविधान के अनुच्छेद 163 के उल्लंघन का आरोप लगाया है — मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना पुलिस प्रमुख को सीधे बुलाना लोकतांत्रिक ढाँचे पर सीधा प्रहार है। साथ ही UDF सरकार पर 'समर्पण' का आरोप लगाकर उन्होंने संवैधानिक टकराव को नई धार दे दी है।

मुख्य बातें

पिनाराई विजयन ने 17 अगस्त को सोशल मीडिया पर गवर्नर राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर पर मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना राज्य पुलिस प्रमुख को बुलाने का आरोप लगाया।
विजयन ने नबाम रेबिया मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 2016 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 163 गवर्नर को असीमित विवेकाधीन शक्तियाँ नहीं देता।
उन्होंने चेतावनी दी कि गवर्नर के कथित दखल से राज्य का पुलिस प्रशासन आरएसएस के प्रभाव में जा सकता है।
UDF सरकार पर 'समझौतावादी रवैये' और 'चुप्पी के ज़रिए समर्पण' का आरोप लगाया।
पिछली LDF सरकार के दौरान मुख्यमंत्री द्वारा अधिकारियों को गवर्नर की बैठकों में न जाने के निर्देश का उदाहरण दिया।
विजयन ने इस मुद्दे को चुनी हुई सरकार के संवैधानिक और संघीय अधिकारों का प्रश्न बताया।

केरल में विपक्ष के नेता पिनाराई विजयन ने सोमवार, 17 अगस्त को राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर पर तीखा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने मुख्यमंत्री या संबंधित मंत्री की सलाह लिए बिना सीधे राज्य पुलिस प्रमुख को बुलाकर संवैधानिक सिद्धांतों का खुला उल्लंघन किया है। विजयन ने इस कदम को न केवल अलोकतांत्रिक बताया, बल्कि चेतावनी दी कि इसके दूरगामी संवैधानिक और संघीय परिणाम हो सकते हैं।

मुख्य आरोप और संवैधानिक आधार

विजयन ने सोशल मीडिया पर एक कड़े शब्दों वाले पोस्ट में कहा कि गवर्नर चुनी हुई सरकार को दरकिनार कर राज्य प्रशासन में समानांतर सत्ता चलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत गवर्नर मंत्रिपरिषद की सलाह और निर्देशों के अनुसार काम करने के लिए बाध्य हैं — न कि स्वतंत्र रूप से।

नबाम रेबिया बनाम डिप्टी स्पीकर मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 2016 के फैसले का हवाला देते हुए विजयन ने कहा कि न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना था कि संविधान का अनुच्छेद 163 राज्यपाल को असीमित विवेकाधीन शक्तियाँ नहीं देता। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राज्य पुलिस प्रमुख संबंधित मंत्री की अनुमति से गवर्नर से मिले थे।

आरएसएस और पुलिस प्रशासन पर चिंता

विजयन ने आरोप लगाया कि गवर्नर के राज्य पुलिस के कामकाज में कथित सीधे दखल से अंततः राज्य का पुलिस प्रशासन आरएसएस के प्रभाव में जा सकता है। यह बयान राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, क्योंकि केरल में सत्तारूढ़ यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच पहले से ही तीखी प्रतिस्पर्धा है।

यूडीएफ सरकार पर 'समर्पण' का आरोप

पूर्व मुख्यमंत्री ने UDF सरकार की भी आलोचना की और कहा कि गवर्नर के प्रति उसका रवैया समझौतावादी रहा है। उनके अनुसार, सरकार की चुप्पी को गवर्नर ने समर्पण के रूप में लिया, जिससे उन्हें अन्य विभागों में भी दखल देने का मौका मिला।

विजयन ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर लोक भवन में गवर्नर द्वारा अधिकारियों के साथ कथित बैठक का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष द्वारा यह मुद्दा उठाए जाने के बावजूद मुख्यमंत्री ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, जबकि मुख्य सचिव ने कथित तौर पर उस बैठक पर नाराजगी जताई थी।

पिछली एलडीएफ सरकार से तुलना

विजयन ने याद दिलाया कि पिछली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार के कार्यकाल में जब लोक भवन की ओर से इसी तरह का दखल दिया गया था, तब मुख्यमंत्री ने लोक भवन को पत्र लिखकर अधिकारियों को ऐसी बैठकों में शामिल न होने का स्पष्ट निर्देश दिया था। उन्होंने इसे संवैधानिक बचाव का उदाहरण बताया और वर्तमान सरकार से भी ऐसी ही दृढ़ता की अपेक्षा जताई।

आगे क्या होगा

विजयन ने चेतावनी दी कि इस विवाद को केवल राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच की आपसी राजनीति तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, इसमें चुनी हुई सरकार के संवैधानिक और संघीय अधिकार दाँव पर हैं और यदि इसे अनदेखा किया गया तो यह एक खतरनाक मिसाल बन सकती है। केरल में राज्यपाल बनाम सरकार का यह टकराव अब विधानसभा और न्यायिक मंचों तक पहुँचने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन पिनाराई विजयन का यह बयान तब आया है जब वे स्वयं विपक्ष में हैं — वही विजयन जिनकी LDF सरकार ने राज्यपाल के दखल के खिलाफ सबसे मुखर लड़ाई लड़ी थी। विडंबना यह है कि वे अब UDF सरकार की 'चुप्पी' की आलोचना कर रहे हैं, जबकि संवैधानिक संकट की जड़ें — केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपालों का राज्य सरकारों से टकराव — एक दीर्घकालिक संरचनात्मक समस्या है जिसे किसी भी दल ने व्यवस्थागत रूप से हल नहीं किया। अनुच्छेद 163 की सीमाओं पर सर्वोच्च न्यायालय की स्पष्ट व्याख्या के बावजूद राज्यपाल पद का राजनीतिक उपयोग जारी है — यह प्रश्न केरल से बड़ा है और संघीय ढाँचे की मज़बूती से जुड़ा है।
RashtraPress
17 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पिनाराई विजयन ने गवर्नर अर्लेकर पर क्या आरोप लगाए हैं?
विजयन ने आरोप लगाया है कि गवर्नर अर्लेकर ने मुख्यमंत्री या संबंधित मंत्री की सलाह लिए बिना सीधे राज्य पुलिस प्रमुख को बुलाया, जो संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन है। उन्होंने इसे चुनी हुई सरकार को दरकिनार कर समानांतर प्रशासन चलाने की कोशिश बताया।
अनुच्छेद 163 और नबाम रेबिया मामला इस विवाद से कैसे जुड़ा है?
संविधान का अनुच्छेद 163 राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने का निर्देश देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2016 के नबाम रेबिया मामले में स्पष्ट किया था कि यह अनुच्छेद राज्यपाल को असीमित विवेकाधीन शक्तियाँ नहीं देता — विजयन ने इसी फैसले का हवाला देकर गवर्नर के कदम को असंवैधानिक बताया।
विजयन ने UDF सरकार की आलोचना क्यों की?
विजयन का कहना है कि UDF सरकार ने गवर्नर के दखल के प्रति समझौतावादी रवैया अपनाया और चुप्पी साधे रखी। उनके अनुसार इस चुप्पी को गवर्नर ने समर्पण मान लिया, जिससे उन्हें अन्य विभागों में भी हस्तक्षेप का अवसर मिला।
पिछली LDF सरकार ने ऐसे मामलों में क्या किया था?
विजयन के अनुसार, पिछली LDF सरकार के कार्यकाल में जब गवर्नर ने लोक भवन में अधिकारियों की बैठक बुलाई थी, तब मुख्यमंत्री ने लोक भवन को पत्र लिखकर अधिकारियों को ऐसी बैठकों में न जाने का निर्देश दिया था — जिसे विजयन संवैधानिक बचाव का उदाहरण बताते हैं।
इस विवाद के क्या दूरगामी परिणाम हो सकते हैं?
विजयन ने चेतावनी दी है कि यह मामला केवल राजनीतिक टकराव नहीं, बल्कि चुनी हुई सरकार के संवैधानिक और संघीय अधिकारों का प्रश्न है। यदि इसे अनदेखा किया गया तो यह राज्य के पुलिस और प्रशासनिक तंत्र पर राज्यपाल के बढ़ते प्रभाव की मिसाल बन सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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