केरल: पिनाराई विजयन ने गवर्नर अर्लेकर पर साधा निशाना, कहा — संविधान का हो रहा खुला उल्लंघन
सारांश
मुख्य बातें
केरल में विपक्ष के नेता पिनाराई विजयन ने सोमवार, 17 अगस्त को राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर पर तीखा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने मुख्यमंत्री या संबंधित मंत्री की सलाह लिए बिना सीधे राज्य पुलिस प्रमुख को बुलाकर संवैधानिक सिद्धांतों का खुला उल्लंघन किया है। विजयन ने इस कदम को न केवल अलोकतांत्रिक बताया, बल्कि चेतावनी दी कि इसके दूरगामी संवैधानिक और संघीय परिणाम हो सकते हैं।
मुख्य आरोप और संवैधानिक आधार
विजयन ने सोशल मीडिया पर एक कड़े शब्दों वाले पोस्ट में कहा कि गवर्नर चुनी हुई सरकार को दरकिनार कर राज्य प्रशासन में समानांतर सत्ता चलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत गवर्नर मंत्रिपरिषद की सलाह और निर्देशों के अनुसार काम करने के लिए बाध्य हैं — न कि स्वतंत्र रूप से।
नबाम रेबिया बनाम डिप्टी स्पीकर मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 2016 के फैसले का हवाला देते हुए विजयन ने कहा कि न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना था कि संविधान का अनुच्छेद 163 राज्यपाल को असीमित विवेकाधीन शक्तियाँ नहीं देता। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राज्य पुलिस प्रमुख संबंधित मंत्री की अनुमति से गवर्नर से मिले थे।
आरएसएस और पुलिस प्रशासन पर चिंता
विजयन ने आरोप लगाया कि गवर्नर के राज्य पुलिस के कामकाज में कथित सीधे दखल से अंततः राज्य का पुलिस प्रशासन आरएसएस के प्रभाव में जा सकता है। यह बयान राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, क्योंकि केरल में सत्तारूढ़ यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच पहले से ही तीखी प्रतिस्पर्धा है।
यूडीएफ सरकार पर 'समर्पण' का आरोप
पूर्व मुख्यमंत्री ने UDF सरकार की भी आलोचना की और कहा कि गवर्नर के प्रति उसका रवैया समझौतावादी रहा है। उनके अनुसार, सरकार की चुप्पी को गवर्नर ने समर्पण के रूप में लिया, जिससे उन्हें अन्य विभागों में भी दखल देने का मौका मिला।
विजयन ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर लोक भवन में गवर्नर द्वारा अधिकारियों के साथ कथित बैठक का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष द्वारा यह मुद्दा उठाए जाने के बावजूद मुख्यमंत्री ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, जबकि मुख्य सचिव ने कथित तौर पर उस बैठक पर नाराजगी जताई थी।
पिछली एलडीएफ सरकार से तुलना
विजयन ने याद दिलाया कि पिछली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार के कार्यकाल में जब लोक भवन की ओर से इसी तरह का दखल दिया गया था, तब मुख्यमंत्री ने लोक भवन को पत्र लिखकर अधिकारियों को ऐसी बैठकों में शामिल न होने का स्पष्ट निर्देश दिया था। उन्होंने इसे संवैधानिक बचाव का उदाहरण बताया और वर्तमान सरकार से भी ऐसी ही दृढ़ता की अपेक्षा जताई।
आगे क्या होगा
विजयन ने चेतावनी दी कि इस विवाद को केवल राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच की आपसी राजनीति तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, इसमें चुनी हुई सरकार के संवैधानिक और संघीय अधिकार दाँव पर हैं और यदि इसे अनदेखा किया गया तो यह एक खतरनाक मिसाल बन सकती है। केरल में राज्यपाल बनाम सरकार का यह टकराव अब विधानसभा और न्यायिक मंचों तक पहुँचने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।