विवेक तिवारी हत्याकांड: पुलिसकर्मी प्रशांत चौधरी गैर इरादतन हत्या का दोषी, 21 सितंबर को सज़ा का ऐलान
सारांश
मुख्य बातें
लखनऊ के जिला एवं सत्र न्यायालय ने 17 सितंबर 2026 को बहुचर्चित विवेक तिवारी हत्याकांड में ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी पुलिसकर्मी प्रशांत चौधरी को गैर इरादतन हत्या का दोषी ठहराया। दूसरे आरोपी सिपाही संदीप कुमार को अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। अब 21 सितंबर 2026 को जिला एवं सत्र न्यायाधीश मलखान सिंह की अदालत दोषी पुलिसकर्मी की सज़ा का ऐलान करेगी।
मामले का पूरा घटनाक्रम
यह मामला 30 सितंबर 2018 की देर रात का है। 38 वर्षीय विवेक तिवारी, जो एक निजी कंपनी में कार्यरत थे, एक पार्टी से अपने एसयूवी वाहन से घर लौट रहे थे। उनके साथ उनकी पूर्व सहकर्मी सना सिद्दीकी भी मौजूद थीं, जो बाद में इस मामले की अहम गवाह बनीं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, उस वक्त पुलिसकर्मी प्रशांत चौधरी और संदीप कुमार गोमती नगर एक्सटेंशन क्षेत्र में गश्त पर थे। पुलिस ने विवेक तिवारी के वाहन को रोकने का संकेत दिया, लेकिन वाहन तत्काल न रुकने पर दोनों सिपाहियों ने पीछा शुरू कर दिया। आरोप है कि पीछा करने के दौरान प्रशांत चौधरी ने गोली चला दी, जो विवेक तिवारी को लगी। गोली लगते ही वाहन अनियंत्रित होकर डिवाइडर से टकराया। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
अदालत का फ़ैसला और सज़ा की तारीख़
जिला एवं सत्र न्यायाधीश मलखान सिंह की अदालत ने सुनवाई पूरी होने के बाद प्रशांत चौधरी को गैर इरादतन हत्या का दोषी करार दिया। अदालत ने सज़ा पर फ़ैसला 21 सितंबर 2026 के लिए सुरक्षित रखा है। दूसरे आरोपी सिपाही संदीप कुमार को अदालत ने बरी कर दिया।
गौरतलब है कि यह फ़ैसला घटना के लगभग 8 वर्ष बाद आया है। घटना के बाद व्यापक जनआक्रोश के बीच दोनों पुलिसकर्मियों को गिरफ़्तार किया गया था और मामले की जाँच के लिए विशेष जाँच दल (SIT) गठित किया गया था।
परिवार की प्रतिक्रिया: 'यह न्याय नहीं, अन्याय है'
फ़ैसले के बाद मृतक विवेक तिवारी की पत्नी कल्पना तिवारी ने गहरी नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा, 'प्रशांत चौधरी एक प्रशिक्षित सिपाही था। ऐसे में गोली चलाने में गलती कैसे हो सकती है? मैं अपने बच्चों को क्या जवाब दूँगी?'
कल्पना तिवारी ने संदीप कुमार को बरी किए जाने पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि घटना के समय दोनों पुलिसकर्मी साथ मौजूद थे, इसलिए दोनों की जिम्मेदारी समान थी और दोनों के खिलाफ समान कार्रवाई होनी चाहिए थी। परिवार ने इस फ़ैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करने का ऐलान किया है।
आम जनता और पुलिस जवाबदेही पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब पुलिस मुठभेड़ों और हिरासत में हिंसा के मामले में जवाबदेही की माँग पूरे देश में ज़ोर पकड़ रही है। गैर इरादतन हत्या के तहत दोषसिद्धि — जो इरादतन हत्या से कमतर धारा है — को परिवार और आलोचकों ने न्याय का अधूरा रूप बताया है। आलोचकों का कहना है कि एक प्रशिक्षित पुलिसकर्मी द्वारा सेवा में गोली चलाना इरादतन कृत्य की श्रेणी में आना चाहिए था।
यह मामला भारत में उन चुनिंदा मामलों में से है जहाँ ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी को अदालत ने दोषी ठहराया। 21 सितंबर को सुनाई जाने वाली सज़ा यह तय करेगी कि न्यायिक प्रक्रिया परिवार और जनता की उम्मीदों पर कितना खरी उतरती है।