सोनम वांगचुक का अनशन तोड़ना: इमरान मसूद ने पूछा — मंत्रियों के आने पर ही क्यों माने?
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने 25 जुलाई को जलवायु कार्यकर्ता और लद्दाख के प्रतिनिधि सोनम वांगचुक के अनशन समाप्त करने के फैसले पर तीखे सवाल उठाए। मसूद ने पूछा कि जब विपक्ष के 45 सांसद वांगचुक से अनुरोध करने गए थे तब उन्होंने उपवास नहीं तोड़ा, लेकिन केंद्र सरकार के दो मंत्रियों के पहुँचते ही वे तुरंत मान गए — ऐसे में यह जानना ज़रूरी है कि आखिर किस आधार पर यह समझौता हुआ।
मुख्य आरोप और सवाल
मसूद ने कहा, 'हमने कहा था कि जब आप आंदोलन कर रहे थे, तो विपक्ष के 45 सांसद आपसे अनुरोध करने गए थे, लेकिन आप नहीं माने। हम लंबे समय से लगातार कह रहे थे कि आपकी जान कीमती है और आपको खुद को खतरे में नहीं डालना चाहिए, लेकिन जब बीजेपी सरकार के दो मंत्री आपके पास गए, तो आप तुरंत मान गए? असल में आप किस बात पर सहमत हुए?'
उन्होंने यह भी पूछा कि जब अभिजीत दिपके जैसे नेताओं ने बार-बार अनुरोध किया था, तब भी वांगचुक ने अनशन क्यों नहीं तोड़ा। मसूद के अनुसार, यदि वांगचुक ने किसी छात्र-समूह के हाथों से जूस लिया होता, तो उनकी अपील पर अनशन समाप्त करना समझ में आता — लेकिन मंत्रियों की उपस्थिति में लिया गया यह निर्णय स्पष्टीकरण माँगता है।
वांगचुक की तुलना अन्ना हजारे से
कांग्रेस सांसद ने सोनम वांगचुक की तुलना सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे से करते हुए कहा कि 'अन्ना हजारे 12 साल से चुप हैं और सोनम वांगचुक अन्ना हजारे पार्ट-2 हैं।' मसूद ने इस बयान को उचित ठहराते हुए कहा कि इसमें कोई संवेदनशील बात नहीं है। गौरतलब है कि वांगचुक हाल ही में कह चुके हैं कि अनशन तोड़ने पर उनसे 'सर्टिफिकेट' माँगा जा रहा है।
पेपर लीक और शिक्षा मंत्री पर निशाना
पेपर लीक मामले में केंद्र सरकार द्वारा नया कानून बनाने की घोषणा पर मसूद ने कहा कि मौजूदा कानून पर्याप्त हैं, लेकिन समस्या यह है कि इस सरकार में चार्जशीट ही दाखिल नहीं होती। उन्होंने माँग की कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए, क्योंकि उनके कार्यकाल में पूरी शिक्षा प्रणाली प्रभावित हुई है।
सोशल मीडिया और युवाओं की भूमिका
प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया फॉलोअर्स बढ़ने के मुद्दे पर मसूद ने कहा कि 'जो फर्जी लोग नैरेटिव सेट करते थे, उन्हें युवाओं ने मुहंतोड़ जवाब दिया है।' उन्होंने पिछले 12-13 दिनों में युवाओं की सक्रियता को सराहा और कहा कि 'जेन-जी जिसके खिलाफ हो जाते हैं, उनका इलाज पक्का होता है।'
आगे क्या
कांग्रेस की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने की माँग को लेकर वांगचुक के आंदोलन को व्यापक समर्थन मिल रहा था। अब जब अनशन समाप्त हो गया है, तो यह देखना होगा कि केंद्र सरकार लद्दाख की मूल माँगों पर क्या ठोस कदम उठाती है।