बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम फेज-III लॉन्च: ₹1,500 करोड़ से हेल्थकेयर इनोवेशन को मिलेगी नई उड़ान
सारांश
मुख्य बातें
केंद्र सरकार ने 15 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम के तीसरे चरण (फेज-III) का शुभारंभ किया, जिसके लिए ₹1,500 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य देश में फेलोशिप, रिसर्च ग्रांट और वैज्ञानिक खोजों को व्यावहारिक स्वास्थ्य सेवाओं में रूपांतरित करने की प्रक्रिया को गति देना है। यह पहल भारत के बायोमेडिकल रिसर्च परिदृश्य को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
फंडिंग का ढाँचा और साझेदारी
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, इस कार्यक्रम की कुल ₹1,500 करोड़ की राशि में से ₹1,000 करोड़ जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) की ओर से और ₹500 करोड़ लंदन स्थित वेलकम ट्रस्ट की ओर से प्रदान किए जाएंगे। यह सार्वजनिक-परोपकारी साझेदारी भारत में बायोमेडिकल अनुसंधान को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और वैज्ञानिक समर्थन से जोड़ने का एक नया मॉडल प्रस्तुत करती है। गौरतलब है कि वेलकम ट्रस्ट वैश्विक स्वास्थ्य अनुसंधान के क्षेत्र में सबसे बड़े परोपकारी संगठनों में से एक है।
कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्य
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि इस कार्यक्रम का लक्ष्य भारत में विश्वस्तरीय बायोमेडिकल रिसर्च इकोसिस्टम तैयार करना है। उन्होंने बताया कि इसके अंतर्गत बेसिक साइंटिस्ट, क्लिनिकल रिसर्चर, पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट, साइंस कम्युनिकेटर और रिसर्च मैनेजर जैसे विशेषज्ञों को तैयार किया जाएगा। साथ ही अंतर-विषयक और सहयोगात्मक अनुसंधान को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
भारत की बायोइकोनॉमी: आँकड़े और संभावनाएँ
डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि भारत की बायोइकोनॉमी 2014 में 10 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 195 अरब डॉलर से अधिक हो चुकी है और 2030 तक इसके 300 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। देश में इस समय लगभग 12,000 बायोटेक स्टार्टअप सक्रिय हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले वर्षों में बायोटेक्नोलॉजी भारत की आर्थिक वृद्धि, वैज्ञानिक प्रगति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख आधार बनने जा रही है।
वैज्ञानिकों से संवाद और उपलब्धियाँ
फेज-III के शुभारंभ के अवसर पर उन वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं से संवाद किया गया जिनके करियर को इस पहल के पिछले चरणों से नई दिशा मिली। कार्यक्रम की वैज्ञानिक उपलब्धियों और दीर्घकालिक प्रभावों पर भी विस्तृत प्रस्तुतियाँ दी गईं। डॉ. सिंह ने कहा कि दीर्घकालिक साझेदारियाँ वैज्ञानिक अनुसंधान को गति देने, विश्वस्तरीय मानव संसाधन तैयार करने और राष्ट्रीय व वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान विकसित करने में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
उद्योग और परोपकारी संस्थाओं से आह्वान
डॉ. सिंह ने उद्योग जगत और परोपकारी संस्थाओं से इस क्षेत्र में अधिक निवेश करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि भारत के पास प्रतिभा और नवाचार की कोई कमी नहीं है, लेकिन शोध को तकनीक, डायग्नोस्टिक और किफायती स्वास्थ्य सेवाओं में रूपांतरित करने के लिए सतत वित्तीय सहयोग अनिवार्य है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक बायोटेक हब के रूप में अपनी पहचान तेज़ी से मजबूत कर रहा है और नई अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को आकर्षित करने की स्थिति में है।