31 जुलाई 2026
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'समुद्र मंथन' योजना को कैबिनेट की मंजूरी: ₹84,084 करोड़ से बढ़ेगी ऑफशोर तेल-गैस खोज क्षमता

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'समुद्र मंथन' योजना को कैबिनेट की मंजूरी: ₹84,084 करोड़ से बढ़ेगी ऑफशोर तेल-गैस खोज क्षमता

सारांश

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹84,084 करोड़ की 'समुद्र मंथन' योजना को हरी झंडी दी — यह भारत के ऑफशोर तेल-गैस क्षेत्र में सबसे बड़े सरकारी दांवों में से एक है। 600 एमएमटीओई से अधिक नए भंडार खोजने के लक्ष्य के साथ, यह योजना ऊर्जा आयात निर्भरता घटाने और 'विकसित भारत' के विजन को ज़मीन पर उतारने की कोशिश है।

मुख्य बातें

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 31 जुलाई 2026 को 'समुद्र मंथन' (नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम) को मंजूरी दी।
योजना के लिए ₹84,084 करोड़ का बजट स्वीकृत; क्रियान्वयन वित्त वर्ष 2030-31 तक।
लक्ष्य: 600 एमएमटीओई से अधिक नए तेल एवं गैस भंडारों की खोज।
गहरे और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में ड्रिलिंग, सीस्मिक डेटा संग्रह और एकीकृत मैन्युफैक्चरिंग ज़ोन की स्थापना शामिल।
योजना से बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन और 'मेक इन इंडिया' अभियान को बल मिलने की उम्मीद।
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, यह स्वतंत्रता दिवस 2025 पर PM मोदी के समुद्री ऊर्जा विजन को साकार करने की दिशा में अगला कदम है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 31 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 'समुद्र मंथन' — यानी नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम — को औपचारिक मंजूरी दे दी। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की इस केंद्रीय क्षेत्र की योजना के लिए ₹84,084 करोड़ का बजट स्वीकृत किया गया है, जिसे वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू किया जाएगा। यह भारत के ऑफशोर ऊर्जा क्षेत्र में अब तक के सबसे बड़े सरकारी निवेशों में से एक है।

योजना की पृष्ठभूमि और विजन

मंत्रालय के अनुसार, यह योजना प्रधानमंत्री मोदी के उस विजन को ज़मीन पर उतारने का प्रयास है, जो उन्होंने स्वतंत्रता दिवस 2025 पर लाल किले की प्राचीर से व्यक्त किया था। उस भाषण में उन्होंने भारत की विशाल समुद्री ऊर्जा क्षमता के दोहन के लिए आधुनिक 'समुद्र मंथन' की आवश्यकता पर बल दिया था। यह योजना देश की ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने, घरेलू तेल-गैस उत्पादन बढ़ाने और 'विकसित भारत' के लक्ष्य को गति देने की दिशा में एक रणनीतिक कदम के रूप में प्रस्तुत की गई है।

गौरतलब है कि पिछले एक दशक में सरकार ने अपस्ट्रीम सेक्टर में कई सुधार किए हैं — लगभग पूरे ऑफशोर क्षेत्र को अन्वेषण के लिए खोलना, कानूनी एवं अनुबंध ढाँचे का आधुनिकीकरण और राष्ट्रीय डेटा रिपॉजिटरी को मजबूत करना। 'समुद्र मंथन' इन्हीं सुधारों की अगली कड़ी के रूप में आई है।

मुख्य घटकों में क्या शामिल है

योजना के तहत ऑफशोर ऊर्जा खोज के पूरे वैल्यू चेन को सुदृढ़ किया जाएगा। इसमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

— बड़े पैमाने पर उच्च गुणवत्ता वाले सीस्मिक डेटा का संग्रह, प्रोसेसिंग और विश्लेषण।
— गहरे और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेज़ खोजी ड्रिलिंग
— फ्रंटियर बेसिन में वैज्ञानिक ड्रिलिंग
— साझा ऑफशोर उत्पादन और परिवहन अवसंरचना का विकास।
एकीकृत ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग एंड सर्विसेज़ ज़ोन की स्थापना।

इसके अतिरिक्त, डिजिटल प्रोग्राम मैनेजमेंट, क्षमता निर्माण, नई तकनीकों को अपनाने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी योजना में प्रमुखता दी गई है, ताकि ऑफशोर तेल-गैस क्षेत्र के लिए एक आधुनिक इकोसिस्टम तैयार हो सके।

अनुमानित भंडार और आर्थिक प्रभाव

सरकार का अनुमान है कि इस योजना के ज़रिए 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट (एमएमटीओई) से अधिक नए तेल एवं गैस भंडार खोजे जा सकेंगे। इससे घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि और आयात निर्भरता में कमी आने की उम्मीद है। तेल-गैस खोज एवं उत्पादन से जुड़े वैल्यू चेन में बड़े निजी एवं विदेशी निवेश आकर्षित होने की भी संभावना जताई गई है।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती रही है।

रोज़गार और 'मेक इन इंडिया' पर असर

सरकार के अनुसार, 'समुद्र मंथन' से बड़े पैमाने पर रोज़गार के अवसर सृजित होंगे। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को भी इस योजना से बल मिलने की उम्मीद है, क्योंकि इसमें स्वदेशी विनिर्माण, आधुनिक तकनीक और सेवाओं के विकास पर विशेष ज़ोर दिया गया है। इससे भारत वैश्विक ऑफशोर ऊर्जा बाज़ार में एक प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी के रूप में उभर सकता है।

आगे की राह

योजना के क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की होगी और इसे वित्त वर्ष 2030-31 तक पूरा किया जाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना की सफलता काफी हद तक निजी क्षेत्र की भागीदारी, तकनीकी क्षमता और पारदर्शी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। सरकार के अनुसार, रणनीतिक निवेश, अत्याधुनिक तकनीक और विश्वस्तरीय बुनियादी ढाँचे के संयोजन से भारत में ऑफशोर तेल-गैस खोज का एक नया अध्याय शुरू होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

084 करोड़ की यह योजना महत्वाकांक्षी है, लेकिन असली कसौटी क्रियान्वयन की होगी — भारत का ऑफशोर अन्वेषण इतिहास बड़े ऐलानों और धीमी प्रगति के बीच की खाई का गवाह रहा है। 600 एमएमटीओई के भंडार अनुमान सरकारी प्रक्षेपण हैं, स्वतंत्र सत्यापित आँकड़े नहीं — और गहरे समुद्री ड्रिलिंग में तकनीकी जोखिम एवं लागत वृद्धि आम बात है। यह भी देखना होगा कि निजी और विदेशी निवेशक इस इकोसिस्टम में किस हद तक भरोसा दिखाते हैं, क्योंकि बिना मज़बूत निजी भागीदारी के केवल सरकारी पूँजी से इतने बड़े लक्ष्य हासिल करना चुनौतीपूर्ण होगा।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'समुद्र मंथन' योजना क्या है?
'समुद्र मंथन' यानी नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम, केंद्र सरकार की एक योजना है जिसे 31 जुलाई 2026 को कैबिनेट की मंजूरी मिली। इसका उद्देश्य ₹84,084 करोड़ के निवेश से भारत के समुद्री क्षेत्र में तेल एवं गैस की खोज और उत्पादन को नई गति देना है।
इस योजना के लिए कितना बजट है और इसे कब तक लागू किया जाएगा?
योजना के लिए ₹84,084 करोड़ का बजट स्वीकृत किया गया है और इसे वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू करने का लक्ष्य है। यह पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की केंद्रीय क्षेत्र की योजना है।
'समुद्र मंथन' से कितने नए तेल-गैस भंडार खोजे जाने की उम्मीद है?
सरकार के अनुमान के अनुसार, इस योजना के ज़रिए 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट (एमएमटीओई) से अधिक नए तेल एवं गैस भंडार खोजे जा सकेंगे। इससे घरेलू उत्पादन बढ़ेगा और आयात पर निर्भरता कम होगी।
इस योजना में कौन-कौन से प्रमुख घटक शामिल हैं?
योजना में सीस्मिक डेटा संग्रह और विश्लेषण, गहरे एवं अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में खोजी ड्रिलिंग, फ्रंटियर बेसिन में वैज्ञानिक ड्रिलिंग, साझा ऑफशोर अवसंरचना विकास और एकीकृत ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग ज़ोन की स्थापना शामिल है। डिजिटल प्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी इसके अंग हैं।
'समुद्र मंथन' योजना से आम जनता और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
सरकार के अनुसार, इस योजना से बड़े पैमाने पर रोज़गार के अवसर पैदा होंगे और 'मेक इन इंडिया' तथा 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को बल मिलेगा। घरेलू तेल-गैस उत्पादन बढ़ने से आयात बिल घटेगा, जिसका दीर्घकालिक लाभ ऊर्जा कीमतों और व्यापार घाटे पर पड़ सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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