'समुद्र मंथन' योजना: ₹84,084 करोड़ से भारत घटाएगा तेल-गैस आयात निर्भरता, 2031 तक लागू होगी
सारांश
मुख्य बातें
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 1 अगस्त 2026 को स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार की नई 'समुद्र मंथन' राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना भारत को दीर्घकालिक रूप से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर निर्भरता घटाने में निर्णायक भूमिका निभाएगी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को इस योजना को औपचारिक मंजूरी दी, जिसके लिए ₹84,084 करोड़ का प्रावधान किया गया है और इसे वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू किया जाएगा।
योजना की मुख्य विशेषताएँ
मंत्रालय के अनुसार, 'समुद्र मंथन' योजना बेहतर भू-वैज्ञानिक डेटा, जोखिम साझा करने की व्यवस्था, साझा बुनियादी ढाँचे और घरेलू विनिर्माण क्षमताओं के माध्यम से देश में डीपवॉटर (गहरे समुद्री) तेल और गैस की खोज तथा उत्पादन के लिए एक सुदृढ़ इकोसिस्टम तैयार करेगी। सरकार ने इसे अब तक का भारत का सबसे महत्वाकांक्षी ऑफशोर तेल एवं गैस अन्वेषण मिशन बताया है।
यह योजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले कुछ वर्षों में हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में किए गए व्यापक नीतिगत सुधारों की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत की गई है, जिसका उद्देश्य आत्मनिर्भर भारत और ऊर्जा सुरक्षा के लक्ष्य को नई गति देना है।
भारत की ऊर्जा निर्भरता: संदर्भ
मंत्रालय ने रेखांकित किया कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता है और देश का सालाना तेल आयात बिल करीब $144 अरब डॉलर (लगभग ₹13 लाख करोड़) है। हाल के वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा संसाधनों की सुरक्षित और निर्बाध उपलब्धता रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
गौरतलब है कि आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा माँग लगातार बढ़ने का अनुमान है। ऐसे में घरेलू स्तर पर तेल और गैस उत्पादन बढ़ाना न केवल आयात निर्भरता घटाने के लिए, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए भी आवश्यक माना जा रहा है।
क्षेत्र में पिछले सुधार
2014 के बाद से हाइड्रोकार्बन अन्वेषण एवं उत्पादन क्षेत्र में कई संरचनात्मक बदलाव किए गए हैं। पहले प्रतिबंधित माने जाने वाले 99 प्रतिशत से अधिक 'नो-गो' क्षेत्रों को खोल दिया गया है, जिससे पहली बार भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के 10 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में तेल और गैस की खोज संभव हो सकी है।
इसके अतिरिक्त, प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) व्यवस्था की जगह रेवेन्यू शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (RSC) लागू किया गया है, जिससे कर एवं राजस्व ढाँचा अधिक सरल, पारदर्शी और प्रशासनिक हस्तक्षेप से मुक्त हुआ है। ऑयलफील्ड्स (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) संशोधन अधिनियम, 2025 और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियम, 2025 के ज़रिए कानूनी एवं नियामकीय ढाँचे को भी आधुनिक बनाया गया है।
सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों पर असर
मंत्रालय ने बताया कि ओएनजीसी (ONGC) और ऑयल इंडिया के प्रदर्शन मानकों में संशोधन किया गया है। अब इन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के मूल्यांकन में तेल और गैस की खोज गतिविधियों को अधिक महत्व दिया जाएगा, जिससे घरेलू हाइड्रोकार्बन संसाधनों के विकास को नई गति मिलने की उम्मीद है।
सरकार ने सभी प्रकार के अनुबंधों के लिए सशक्त सचिव समिति की संरचना और अधिकारों को एकसमान किया है, ताकि सभी कंपनियों को समान अवसर सुनिश्चित हो सके।
आगे की राह
यह योजना ऐसे समय में आई है जब भारत अपनी ऊर्जा टोकरी में विविधता लाने और आयात पर विदेशी मुद्रा का बोझ कम करने की दिशा में ठोस कदम उठा रहा है। 'समुद्र मंथन' के क्रियान्वयन की सफलता काफी हद तक निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बीच समन्वय तथा भू-वैज्ञानिक डेटा की गुणवत्ता पर निर्भर करेगी।