केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹37,500 करोड़ की कोयला गैसीकरण योजना को मंजूरी दी, 50,000 रोजगार का लक्ष्य

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹37,500 करोड़ की कोयला गैसीकरण योजना को मंजूरी दी, 50,000 रोजगार का लक्ष्य

सारांश

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹37,500 करोड़ की कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण योजना को हरी झंडी दी है। इसका लक्ष्य 2030 तक 10 करोड़ टन गैसीकरण, 50,000 रोजगार और एलएनजी, अमोनिया, यूरिया जैसे उत्पादों के आयात पर निर्भरता घटाना है — जो ₹2.77 लाख करोड़ के सालाना आयात बिल को कम करने की दिशा में एक बड़ा दांव है।

मुख्य बातें

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 13 मई 2026 को ₹37,500 करोड़ की कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण योजना को मंजूरी दी।
25 परियोजनाओं के जरिए लगभग 50,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का अनुमान।
कोयला लिंकेज की अवधि 30 वर्ष तक बढ़ाई गई; वित्तीय प्रोत्साहन संयंत्र लागत के अधिकतम 20 प्रतिशत तक।
एकल परियोजना के लिए प्रोत्साहन सीमा ₹5,000 करोड़ ; एकल इकाई समूह के लिए ₹12,000 करोड़ ।
योजना का लक्ष्य 2030 तक 10 करोड़ टन कोयला गैसीकरण; सालाना ₹6,300 करोड़ राजस्व का अनुमान।
वित्त वर्ष 2025 में संबंधित उत्पादों का आयात बिल लगभग ₹2.77 लाख करोड़ था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 13 मई 2026 को कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने की एक महत्वाकांक्षी योजना को मंजूरी दी, जिसका कुल वित्तीय परिव्यय ₹37,500 करोड़ निर्धारित किया गया है। इस योजना के तहत कोयला उत्पादक क्षेत्रों में 25 परियोजनाओं के जरिए लगभग 50,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का अनुमान है।

योजना में क्या शामिल है

इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य सिंथेटिक गैस और उससे जुड़े उत्पादों के उत्पादन के लिए नई कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को बढ़ावा देना है। इसके तहत लगभग 7 करोड़ टन कोयला और लिग्नाइट के गैसीकरण का लक्ष्य रखा गया है। सरकार ने गैर-विनियमित क्षेत्र (एनआरएस) लिंकेज नीलामी ढाँचे के अंतर्गत कोयला गैसीकरण परियोजनाओं के लिए कोयला लिंकेज की अवधि 30 वर्ष तक बढ़ा दी है, जिससे निवेशकों को दीर्घकालिक नीतिगत निश्चितता मिलेगी।

वित्तीय प्रोत्साहन संयंत्र और मशीनरी की लागत के अधिकतम 20 प्रतिशत तक सीमित रहेगा। आधिकारिक बयान के अनुसार, किसी एक परियोजना के लिए वित्तीय प्रोत्साहन की अधिकतम सीमा ₹5,000 करोड़, किसी एक उत्पाद के लिए ₹9,000 करोड़ (सिंथेटिक प्राकृतिक गैस और यूरिया को छोड़कर) और किसी एक इकाई समूह के लिए सभी परियोजनाओं पर अधिकतम सीमा ₹12,000 करोड़ निर्धारित की गई है। प्रोत्साहन राशि का वितरण परियोजना लक्ष्यों से जुड़ी चार समान किस्तों में किया जाएगा।

आयात निर्भरता कम करने का लक्ष्य

यह योजना भारत की ऊर्जा और रासायनिक आयात निर्भरता को घटाने की दिशा में एक सीधा हस्तक्षेप है। वित्त वर्ष 2025 में एलएनजी, यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट, अमोनिया, कोकिंग कोल, मेथनॉल, डीएमई और अन्य प्रमुख प्रतिस्थापन योग्य उत्पादों के लिए भारत का आयात बिल लगभग ₹2.77 लाख करोड़ था। योजना के तहत एलएनजी (50 प्रतिशत से अधिक आयातित), यूरिया (करीब 20 प्रतिशत आयातित), अमोनिया (100 प्रतिशत आयातित) और मेथनॉल (80-90 प्रतिशत आयातित) पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य है।

गौरतलब है कि भारत के पास विश्व के सबसे बड़े कोयला भंडारों में से एक है — 401 अरब टन कोयला और 47 अरब टन लिग्नाइट। देश के ऊर्जा मिश्रण में कोयले की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से अधिक है। ऐसे में घरेलू कोयले को गैसीकृत कर रणनीतिक रूप से उपयोग करना ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एक तार्किक कदम माना जा रहा है।

राष्ट्रीय लक्ष्य और राजस्व संभावनाएँ

यह योजना 2030 तक 10 करोड़ टन कोयले के गैसीकरण के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, इस योजना के तहत परिकल्पित 75 मिलियन टन गैसीकरण से कोयला और लिग्नाइट के उपयोग से सालाना ₹6,300 करोड़ की आय होने की उम्मीद है, इसके अतिरिक्त जीएसटी और अन्य करों से भी राजस्व प्राप्त होगा। परियोजनाओं का चयन एक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से किया जाएगा, जिसमें परियोजना लागत, कोयला इनपुट और सिंथेटिक गैस आउटपुट को बेंचमार्क किया जाएगा।

आम जनता और उद्योग पर असर

यह योजना ऐसे समय में आई है जब भारत अपनी ऊर्जा और उर्वरक आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश में है। कोयला उत्पादक राज्यों जैसे झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश में प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है। उर्वरक उद्योग के लिए घरेलू अमोनिया और यूरिया की उपलब्धता बढ़ने से किसानों को भी दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।

आगे की दिशा यह होगी कि बोली प्रक्रिया और परियोजना चयन के विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए जाएँ, जिसके बाद निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ इस योजना का लाभ उठाने की स्थिति में होंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

500 करोड़ की यह योजना कागज पर आकर्षक दिखती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या भारत के कोयला गैसीकरण प्रयास इस बार क्रियान्वयन की दीवार पार कर पाएँगे — जो पिछले कई वर्षों में नहीं हो सका। 2030 तक 10 करोड़ टन गैसीकरण का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, जबकि अभी तक इस क्षेत्र में व्यावसायिक पैमाने पर कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है। 30 साल की कोयला लिंकेज और प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया जैसे प्रावधान निवेशकों का भरोसा जीतने की कोशिश करते हैं, लेकिन ₹2.77 लाख करोड़ के आयात बिल को वास्तव में कम करने के लिए तकनीकी व्यवहार्यता और परियोजना क्रियान्वयन की गति दोनों पर नजर रखनी होगी।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण योजना क्या है?
यह केंद्र सरकार की ₹37,500 करोड़ की योजना है जिसे 13 मई 2026 को मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी। इसका उद्देश्य सिंथेटिक गैस उत्पादन के लिए नई कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को प्रोत्साहित करना और 2030 तक 10 करोड़ टन गैसीकरण का राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करना है।
इस योजना से कितने रोजगार मिलेंगे?
आधिकारिक अनुमान के अनुसार 25 परियोजनाओं के जरिए लगभग 50,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने की उम्मीद है। ये रोजगार मुख्यतः कोयला उत्पादक क्षेत्रों में होंगे।
इस योजना से आयात निर्भरता कैसे कम होगी?
यह योजना एलएनजी, यूरिया, अमोनिया और मेथनॉल जैसे उत्पादों का घरेलू उत्पादन बढ़ाएगी, जो अभी बड़े पैमाने पर आयात किए जाते हैं। वित्त वर्ष 2025 में इन उत्पादों का कुल आयात बिल लगभग ₹2.77 लाख करोड़ था।
एक परियोजना को अधिकतम कितना वित्तीय प्रोत्साहन मिलेगा?
किसी एक परियोजना के लिए वित्तीय प्रोत्साहन की अधिकतम सीमा ₹5,000 करोड़ है। यह संयंत्र और मशीनरी की लागत के 20 प्रतिशत तक सीमित होगा और चार समान किस्तों में परियोजना लक्ष्यों से जोड़कर दिया जाएगा।
कोयला लिंकेज की अवधि बढ़ाने का क्या महत्व है?
सरकार ने कोयला गैसीकरण परियोजनाओं के लिए कोयला लिंकेज की अवधि 30 वर्ष तक बढ़ा दी है। इससे निवेशकों को दीर्घकालिक नीतिगत निश्चितता मिलेगी, जो इस पूँजी-गहन क्षेत्र में बड़े निवेश को आकर्षित करने के लिए जरूरी है।
राष्ट्र प्रेस
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