एलएनजी से चलेंगे भारत के ट्रक: ग्रीनलाइन का 10,000 वाहनों तक विस्तार का लक्ष्य, डीजल आयात में $3 अरब की बचत संभव
सारांश
मुख्य बातें
भारत का भारी मालवाहक लॉजिस्टिक्स क्षेत्र तेज़ी से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) की ओर रुख कर रहा है, क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल के आयात को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच परिवहन संचालक और नीति निर्माता डीजल के व्यावहारिक विकल्प तलाश रहे हैं। मुंबई स्थित ग्रीनलाइन मोबिलिटी इस बदलाव की अगुवाई कर रही है और अगले कुछ वर्षों में अपना बेड़ा 10,000 वाहनों तक पहुँचाने की योजना बना चुकी है।
भारत का भारी परिवहन क्षेत्र और डीजल पर निर्भरता
भारत में वर्तमान में लगभग 40 लाख डीजल-चालित ट्रक हैं, जो घरेलू माल ढुलाई का करीब 70 प्रतिशत परिवहन करते हैं। यह क्षेत्र देश के सबसे बड़े आयातित जीवाश्म ईंधन उपभोक्ताओं में शामिल है। माल ढुलाई में लगातार वृद्धि के साथ, आयात पर निर्भरता और उत्सर्जन दोनों मोर्चों पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
उद्योग के अनुमानों के अनुसार, यदि डीजल ट्रकों के बेड़े के 10 प्रतिशत को एलएनजी वाहनों से बदला जाए, तो डीजल आयात में कमी के कारण वार्षिक विदेशी मुद्रा बहिर्वाह में लगभग $3 अरब की बचत संभव है।
ग्रीनलाइन मोबिलिटी का विस्तार
ग्रीनलाइन मोबिलिटी देश के सबसे बड़े एलएनजी ट्रक परिवहन ऑपरेटरों में से एक है। कंपनी वर्तमान में प्रमुख लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर पर 1,000 से अधिक एलएनजी-चालित भारी ट्रकों का संचालन करती है। इसके साथ ही, छोटी दूरी के परिचालन के लिए इलेक्ट्रिक ट्रकों की तैनाती भी शुरू कर दी गई है।
कंपनी की सहायक इकाई अल्ट्रा गैस एंड एनर्जी फ़िलहाल 7 एलएनजी रिफ्यूलिंग स्टेशन संचालित करती है और इस नेटवर्क को देश भर के प्रमुख माल गलियारों के साथ 100 स्टेशनों तक विस्तारित करने की योजना है। प्रत्येक हब को एलएनजी ईंधन भरने, इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग और बैटरी स्वैपिंग की सुविधाओं से लैस एकीकृत स्वच्छ परिवहन केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा।
एलएनजी की परिचालन क्षमता और उत्सर्जन लाभ
एलएनजी-चालित ट्रक एक टैंक में 1,200 किमी तक की यात्रा कर सकते हैं और डीजल वाहनों की तुलना में कार्बन उत्सर्जन में 40 प्रतिशत तक की कमी ला सकते हैं। यही कारण है कि लंबी दूरी के माल परिवहन के लिए एलएनजी को डीजल का सबसे व्यावहारिक निकट-भविष्य का विकल्प माना जा रहा है।
इसके विपरीत, भारी माल परिवहन के बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, सीमित रेंज और वाहनों की ऊँची शुरुआती लागत जैसी चुनौतियाँ अभी भी बड़ी बाधाएँ बनी हुई हैं।
सरकार की नीतिगत पहल
सरकार स्वच्छ वाणिज्यिक वाहनों को अपनाने में तेज़ी लाने के लिए $1 अरब से अधिक के प्रोत्साहन कार्यक्रम का मूल्यांकन कर रही है। यह कदम आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूत करने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।
क्षेत्र के हितधारकों का मानना है कि टोल में छूट, एलएनजी वितरण स्टेशनों के लिए त्वरित अनुमोदन, जीएसटी प्रोत्साहन और कार्बन क्रेडिट ढाँचे जैसे नीतिगत हस्तक्षेप वाणिज्यिक परिवहन में वैकल्पिक ईंधनों को अपनाने की गति को निर्णायक रूप से बढ़ा सकते हैं।
आगे की राह
गौरतलब है कि यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब भारत की माल ढुलाई माँग तेज़ी से बढ़ रही है और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में अनिश्चितता बनी हुई है। ग्रीनलाइन जैसे ऑपरेटरों का विस्तार और सरकार का नीतिगत समर्थन मिलकर भारत के लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को डीकार्बोनाइज़ेशन की दिशा में एक निर्णायक मोड़ दे सकते हैं।