जीएसटी 2.0: दूसरे दशक में कर व्यवस्था को बदल सकते हैं ये 6 अहम सुधार
सारांश
मुख्य बातें
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के लागू होने के करीब एक दशक बाद, भारत की अप्रत्यक्ष कर प्रणाली एक नए और निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। 29 अगस्त 2026 को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक इस व्यवस्था के विकास में एक ऐतिहासिक पड़ाव साबित हो सकती है। अनुमान है कि यह बैठक महज दर-तर्कसंगतीकरण से आगे बढ़कर कर विवाद निपटान, इनपुट टैक्स क्रेडिट सुदृढ़ीकरण और प्रौद्योगिकी-आधारित अनुपालन पर केंद्रित होगी।
विशेषज्ञ की राय: विश्वास और सरलता सबसे बड़ी ज़रूरत
ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर और कर विवाद प्रबंधन प्रमुख मनोज मिश्रा के अनुसार, जीएसटी के दूसरे दशक में प्रवेश के इस अवसर पर परिषद की बैठक का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि सुधारों के अगले चरण में करदाताओं के बीच विश्वास, स्पष्टता और सरलता बढ़ाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी दिशा में छह प्रमुख क्षेत्रों में बदलाव जीएसटी 2.0 की नींव रख सकते हैं।
मुकदमेबाज़ी में कमी: ऑनलाइन गेमिंग विवाद एक बड़ा उदाहरण
जीएसटी लागू होने के बाद से विभिन्न क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कर विवाद सामने आए हैं। ऑनलाइन गेमिंग उद्योग में गेम्सक्राफ्ट मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद ₹2.5 लाख करोड़ की संभावित कर मांग का मुद्दा चर्चा में है।
उद्योग का तर्क है कि वह वर्षों से प्रचलित कानूनी व्याख्या के आधार पर प्लेटफॉर्म शुल्क पर 18% जीएसटी का भुगतान करता रहा है। जीएसटी परिषद यदि भविष्य के ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट तंत्र तैयार करे, तो लंबे कानूनी विवादों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।
इनपुट टैक्स क्रेडिट: ईमानदार करदाताओं को राहत की दरकार
वर्तमान व्यवस्था में खरीदार का इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) अक्सर इस बात से जुड़ जाता है कि विक्रेता ने सरकार को कर जमा किया है या नहीं। इससे ईमानदार करदाताओं को भी परेशानी उठानी पड़ती है, क्योंकि वे आपूर्तिकर्ता के अनुपालन पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रख सकते।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि खरीदार के पास वैध कर चालान हो, भुगतान बैंकिंग माध्यम से किया गया हो और वह किसी मिलीभगत में शामिल न हो, तो उसे कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए। इससे विवाद कम होंगे और जीएसटी की मूल अवधारणा को बल मिलेगा।
मुआवजा उपकर और ईंधन: दो अनसुलझे मोर्चे
कई उद्योग अभी भी मुआवजा उपकर (कंपनसेशन सेस) से जुड़े पुराने क्रेडिट और समायोजन के मुद्दों पर स्पष्टता चाहते हैं। फरवरी 2026 से कुछ वस्तुओं पर यह उपकर समाप्त करने की सिफारिश के बाद कंपनियाँ पुराने क्रेडिट के उपयोग और निपटान को लेकर निश्चितता की माँग कर रही हैं।
इसके साथ ही, पेट्रोल, डीजल, विमानन ईंधन और प्राकृतिक गैस अभी भी जीएसटी के दायरे से बाहर हैं। इन उत्पादों को चरणबद्ध रूप से जीएसटी में शामिल करने से विनिर्माण, परिवहन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र की लागत में कमी आ सकती है और एकीकृत कर व्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
डिजिटल अर्थव्यवस्था और एआई: जीएसटी 2.0 की रीढ़
तेज़ी से बदलती डिजिटल अर्थव्यवस्था में व्यवसाय अधिक स्पष्टता की तलाश में हैं। ऐप-आधारित यात्री परिवहन पर जीएसटी अधिनियम की धारा 9(5) के लागू होने से अनिश्चितता उत्पन्न हुई है, क्योंकि प्लेटफॉर्म-आधारित व्यापार मॉडल लगातार विकसित हो रहे हैं। जीएसटी परिषद डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका, नियंत्रण और जिम्मेदारी के आधार पर स्पष्ट ढाँचा तैयार कर सकती है।
इन सबके साथ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा विश्लेषण और उन्नत डिजिटल प्लेटफॉर्म के ज़रिए करदाताओं को पहले से अधिक पारदर्शी और पूर्वानुमेय अनुपालन व्यवस्था उपलब्ध कराई जा सकती है। इससे नोटिस, जाँच और विवादों की संख्या में कमी आएगी तथा व्यवसायों के लिए कर अनुपालन सरल होगा।
जीएसटी 2.0 का लक्ष्य: संग्रह से आगे, विकास का इंजन
विशेषज्ञों के अनुसार, जीएसटी के पहले दशक का मुख्य उद्देश्य देशभर में एकसमान कर प्रणाली स्थापित करना था। दूसरे दशक में प्राथमिकता सरलीकरण, अनुपालन में सुगमता, करदाताओं का विश्वास बढ़ाना और विवाद कम करना होनी चाहिए। यदि ये सुधार लागू होते हैं, तो जीएसटी 2.0 केवल राजस्व संग्रह का माध्यम नहीं रहेगा — बल्कि निवेश, विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और कारोबार सुगमता को बढ़ावा देने वाला एक परिपक्व कर ढाँचा बन सकता है।