आईसीएआर-एफसीआई का MOU: गेहूं-चावल भंडारण में कीट नियंत्रण के लिए सुरक्षित फ्यूमिगेशन तकनीकों पर शोध
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने 1 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य गेहूं और चावल के भंडारण में कीट प्रबंधन के लिए वैकल्पिक और पर्यावरण-अनुकूल फ्यूमिगेशन तकनीकों पर शोध करना है। आधिकारिक बयान के अनुसार, यह पहल देश के खाद्यान्न भंडारण तंत्र को अधिक सुरक्षित, प्रभावी और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
पारंपरिक रसायनों की सीमाएँ और चुनौतियाँ
आधिकारिक बयान के अनुसार, भारत में लंबे समय से गेहूं और चावल के भंडारण के दौरान कीट नियंत्रण के लिए मुख्यतः एल्युमिनियम फॉस्फाइड (ALP) और मैलाथियॉन जैसे रसायनों का उपयोग किया जाता रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन रसायनों के लगातार और व्यापक उपयोग से कई गंभीर समस्याएँ उभर कर सामने आई हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि कई प्रमुख राज्यों में भंडारण कीटों में इन रसायनों के प्रति 72 से 100 प्रतिशत तक प्रतिरोध विकसित हो चुका है। इसके परिणामस्वरूप बार-बार फ्यूमिगेशन की आवश्यकता पड़ती है, जिससे परिचालन लागत में वृद्धि हो रही है। इसके अतिरिक्त, ये रसायन श्रमिकों के स्वास्थ्य के लिए जोखिम उत्पन्न करते हैं और पर्यावरण पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
वैकल्पिक तकनीकों पर होगा शोध
नई पहल के तहत नाइट्रोजन गैस, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) और CO2 तथा फॉस्फीन के संयुक्त उपयोग जैसी तकनीकों को व्यावसायिक स्तर पर मानकीकृत करने का कार्य किया जाएगा। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर खाद्यान्न भंडारण में रासायनिक अवशेषों और कीटनाशक प्रतिरोध की समस्या गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है।
गौरतलब है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादकों और भंडारणकर्ताओं में से एक है, और एफसीआई के गोदामों में करोड़ों टन अनाज का भंडारण होता है। कीट प्रतिरोध की बढ़ती समस्या से खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है।
परियोजना के चरण और परीक्षण स्थल
परियोजना के पहले चरण (फेज-I) में तीन प्रमुख परीक्षण किए जाएंगे। इनमें धातु के साइलो में संग्रहित गेहूं के लिए 99 प्रतिशत से अधिक शुद्ध नाइट्रोजन गैस फ्यूमिगेशन, एफसीआई और केंद्रीय भंडारण निगम (CWC) के गोदामों में बोरीबंद गेहूं एवं चावल के लिए CO2 और फॉस्फीन गैस का संयुक्त उपयोग, तथा हर्मेटिक कवर में संग्रहित अनाज के लिए CO2-आधारित फ्यूमिगेशन का परीक्षण शामिल है।
दो वर्षों के पायलट चरण के पश्चात दूसरे चरण (फेज-II) में देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में एक वर्ष तक बहु-स्थान परीक्षण किए जाएंगे। इसी आधार पर क्षेत्रवार स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर्स (SOP) तैयार किए जाएंगे।
क्रियान्वयन की जिम्मेदारी
यह अनुसंधान परियोजना खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (DFPD), उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के सहयोग से संचालित होगी। परियोजना के पहले चरण को आईसीएआर-केंद्रीय फसलोत्तर अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (CIPHET), लुधियाना द्वारा लागू किया जाएगा।
बयान में कहा गया है कि इस पहल का लक्ष्य पारंपरिक रासायनिक फ्यूमिगेशन के ऐसे वैज्ञानिक, व्यावहारिक और टिकाऊ विकल्प विकसित करना है जो कीट प्रतिरोध, स्वास्थ्य जोखिम, पर्यावरणीय प्रभाव और रासायनिक अवशेषों जैसी समस्याओं को प्रभावी रूप से कम कर सकें।
आगे की राह
इस शोध के सफल होने पर देश भर में एफसीआई और सीडब्ल्यूसी के गोदामों में क्षेत्रवार SOP लागू की जा सकेंगी, जिससे खाद्यान्न भंडारण में कीट नियंत्रण की प्रक्रिया अधिक सुरक्षित और लागत-प्रभावी बन सकेगी। यह कदम भारत की खाद्य सुरक्षा नीति को दीर्घकालिक और पर्यावरण-अनुकूल आधार देने की दिशा में एक उल्लेखनीय प्रयास है।