आईआईटी रुड़की का 'इंड्रा-सीएमआईपी6' डेटासेट: भारत की आपदा तैयारी और जलवायु जोखिम आकलन को मिलेगा नया वैज्ञानिक आधार
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की के जल विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने 15 मई 2026 को भारत के लिए एक ओपन-एक्सेस हाई-रिजॉल्यूशन जलवायु प्रोजेक्शन डेटासेट विकसित कर जारी किया है। 'इंड्रा-सीएमआईपी6' नामक यह डेटासेट क्षेत्रीय जलवायु अनुकूलन, आपदा तैयारी और जलवायु जोखिम आकलन को वैज्ञानिक आधार देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इस शोध को नेचर पोर्टफोलियो की प्रतिष्ठित पत्रिका 'साइंटिफिक डेटा' में प्रकाशित किया गया है।
डेटासेट क्या है और कैसे काम करता है
इंड्रा-सीएमआईपी6 डेटासेट 14 सीएमआईपी6 वैश्विक जलवायु मॉडलों के आउटपुट पर आधारित है। इसे तैयार करने के लिए 'डबल बायस-करेक्टेड कंस्ट्रक्टेड एनालॉग (DBCCA)' नामक सांख्यिकीय डाउनस्केलिंग तकनीक का उपयोग किया गया है। यह तकनीक भारतीय उपमहाद्वीप में दैनिक मौसम बदलाव, क्षेत्रीय वर्षा वितरण और तापमान की चरम स्थितियों को अधिक सटीकता से दर्शाने में सक्षम है।
डेटासेट 0.1° x 0.1° के स्थानिक रिजॉल्यूशन पर — यानी लगभग 10 किलोमीटर की सटीकता पर — दैनिक वर्षा, न्यूनतम तापमान और अधिकतम तापमान के अनुमान उपलब्ध कराता है। शोध टीम ने अलग-अलग जलवायु मॉडलों के आउटपुट के साथ मल्टी-मॉडल एंसेंबल भी उपलब्ध कराया है, जिससे उपयोगकर्ता विभिन्न अनुमानों की तुलना कर सकते हैं और अनिश्चितताओं का वस्तुनिष्ठ आकलन भी कर सकते हैं।
वैश्विक मॉडलों की सीमाएँ और इस पहल की ज़रूरत
यह पहल उस बड़ी वैज्ञानिक समस्या का समाधान करने के लिए शुरू की गई है जिसमें वैश्विक जलवायु मॉडल बड़े पैमाने पर औसत अनुमान देते हैं। इससे भारत की जटिल भौगोलिक परिस्थितियों, मानसून प्रणाली और क्षेत्रीय मौसम की चरम स्थितियों का सटीक आकलन संभव नहीं हो पाता। शोधकर्ताओं के अनुसार, शहरी जल निकासी योजना, तटबंध सुदृढ़ीकरण, बाढ़ तैयारी और जलवायु-अनुकूल कृषि जैसे कार्यों के लिए जिला और नदी बेसिन स्तर पर जलवायु अनुमान अनिवार्य हैं।
गौरतलब है कि हाल के वर्षों में भारत में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तेज़ी से बढ़ा है — बढ़ता तापमान, अनियमित मानसून, शहरी बाढ़, लू की तीव्रता और जल संसाधनों पर दबाव इसके प्रमुख संकेत हैं। ऐसे में महाद्वीपीय औसत आँकड़े नीति निर्माण के लिए अपर्याप्त साबित होते हैं।
तकनीकी परीक्षण के नतीजे
शोध टीम द्वारा किए गए तकनीकी परीक्षणों में पाया गया कि इंड्रा-सीएमआईपी6 वैश्विक जलवायु मॉडलों में पाई जाने वाली कई सामान्य त्रुटियों को काफी हद तक कम करता है। यह डेटासेट अत्यधिक वर्षा और तापमान की चरम घटनाओं के आकलन को भी बेहतर बनाता है — विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए जहाँ स्थानीय भूगोल, मानसून पैटर्न और पहाड़ी संरचना जलवायु जोखिमों को प्रभावित करती है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
IIT रुड़की के जल विज्ञान विभाग के अंकित अग्रवाल ने कहा, 'भारत में जलवायु जोखिम काफी हद तक स्थानीय स्तर पर केंद्रित हैं, खासकर मानसून और पहाड़ी क्षेत्रों में। इंड्रा-सीएमआईपी6 जैसे सूक्ष्म स्तर के जलवायु अनुमान वैश्विक जलवायु विज्ञान को योजनाकारों, शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के लिए उपयोगी जानकारी में बदलने में बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे डेटासेट को ओपन-एक्सेस में उपलब्ध कराने से वैज्ञानिक सहयोग मजबूत होता है और बेहतर जलवायु अनुकूलन रणनीतियों को समर्थन मिलता है।'
शोध टीम के कमल किशोर पंत ने कहा, 'जलवायु परिवर्तन हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। ऐसे में वैज्ञानिक संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे समाज के लिए विश्वसनीय और सुलभ ज्ञान संसाधन तैयार करें। इंड्रा-सीएमआईपी6 IIT रुड़की की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसके तहत संस्था जलवायु लचीलापन, सतत विकास और प्रमाण-आधारित नीति निर्माण के लिए प्रभावशाली शोध को आगे बढ़ा रही है।'
आगे की राह
यह डेटासेट ओपन-एक्सेस प्रारूप में उपलब्ध कराया गया है, जिससे सरकारी विभाग, नगर निगम, कृषि नीति निर्माता और स्वतंत्र शोधकर्ता — सभी इसका उपयोग कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह डेटासेट भारत की राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजनाओं और जलवायु अनुकूलन नीतियों को अधिक सटीक वैज्ञानिक आधार प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।