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वैश्विक रक्षा बाज़ार में भारत के लिए बड़े अवसर, एमएसएमई से मज़बूत हो रही स्वदेशी आपूर्ति शृंखला: एसोचैम

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वैश्विक रक्षा बाज़ार में भारत के लिए बड़े अवसर, एमएसएमई से मज़बूत हो रही स्वदेशी आपूर्ति शृंखला: एसोचैम

सारांश

एसोचैम के राजीव गुप्ता ने साफ़ कहा — वैश्विक रक्षा बाज़ार में भारत के लिए अवसर विशाल हैं, लेकिन बिना ठोस प्रतिबद्धता के ये केवल कागज़ी संभावनाएँ रहेंगी। एमएसएमई के ज़रिए घरेलू आपूर्ति शृंखला मज़बूत हो रही है, और आयात पर निर्भरता घटाना अब उद्योग की प्राथमिकता बन चुकी है।

मुख्य बातें

एसोचैम की राष्ट्रीय रक्षा और एयरोस्पेस परिषद के चेयरमैन राजीव गुप्ता ने 25 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में वैश्विक रक्षा बाज़ार में भारत की संभावनाओं पर ज़ोर दिया।
गुप्ता ने चेताया कि स्पष्ट रणनीति और प्रतिबद्धता के बिना अवसर केवल कागज़ों तक सीमित रहेंगे।
एमएसएमई और स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के ज़रिए मज़बूत घरेलू रक्षा आपूर्ति शृंखला विकसित की जा रही है।
सम्मेलन में घरेलू विनिर्माण क्षमता , तकनीकी आत्मनिर्भरता और आपूर्ति शृंखला विस्तार पर विशेष चर्चा हुई।
भारतीय उद्योग सशस्त्र सेनाओं को स्वदेश-विकसित उन्नत उत्पाद उपलब्ध करा रहा है, जिससे आयात निर्भरता घट रही है।

एसोचैम की राष्ट्रीय रक्षा और एयरोस्पेस परिषद के चेयरमैन राजीव गुप्ता ने 25 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में कहा कि वैश्विक रक्षा बाज़ार में भारत की बढ़ती हिस्सेदारी इस बात पर निर्भर करेगी कि देश उपलब्ध अवसरों को भुनाने के लिए कितनी दृढ़ता और रणनीतिक प्रतिबद्धता दिखाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि रक्षा और एयरोस्पेस विनिर्माण में भारत की संभावनाएँ असाधारण हैं, किंतु इन्हें ठोस उपलब्धियों में बदलने के लिए उद्योग, सरकार और सभी हितधारकों को एकजुट होकर काम करना होगा।

सम्मेलन का संदर्भ और उद्देश्य

गुप्ता एयरोस्पेस एवं रक्षा विनिर्माण पर आयोजित एसोचैम के राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यह आयोजन रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र के सभी पक्षों को उद्योग की ज़रूरतों, राष्ट्रीय अपेक्षाओं और विकास को गति देने वाले प्रमुख कारकों की गहरी समझ विकसित करने का अवसर देता है। उनके अनुसार, यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नीति-निर्माताओं और उद्योगपतियों को एक साझा मंच पर लाती है।

अवसर और चुनौतियाँ

गुप्ता ने रेखांकित किया कि वैश्विक रक्षा बाज़ार में भारत के लिए अवसरों की कोई कमी नहीं है, लेकिन उन्होंने आगाह किया कि स्पष्ट रणनीति और प्रतिबद्धता के अभाव में ये अवसर केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएंगे। उन्होंने कहा, "वैश्विक रक्षा बाज़ार में भारत की वृद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि हम भारतीय के रूप में क्या निर्णय लेते हैं। अवसर बहुत बड़े हैं, लेकिन यदि हम उन्हें हासिल करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध नहीं होंगे, तो वे केवल कागज़ों पर अवसर बनकर रह जाएंगे और कभी वास्तविकता में नहीं बदल पाएंगे।"

एमएसएमई की भूमिका और आपूर्ति शृंखला

गुप्ता ने विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि बड़ी रक्षा कंपनियों ने अनेक एमएसएमई और स्थानीय आपूर्तिकर्ता साझेदारों को विकसित किया है, जिससे देश के भीतर ही रक्षा उत्पादन के लिए आवश्यक घटकों और प्रणालियों की उपलब्धता बढ़ी है। उन्होंने कहा, "इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हमने अनेक एमएसएमई और स्थानीय आपूर्तिकर्ता भागीदार विकसित किए हैं।" यह कदम आयात पर निर्भरता घटाने की दिशा में एक ठोस प्रयास माना जा रहा है।

स्वदेशी रक्षा निर्माण की प्रगति

गुप्ता के अनुसार, भारतीय उद्योग लगातार सशस्त्र सेनाओं को ऐसे उन्नत उत्पाद उपलब्ध करा रहा है जो भारत में विकसित हुए हैं और कठिन परिचालन परिस्थितियों में अपनी क्षमता साबित कर चुके हैं। सम्मेलन में घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाने, तकनीकी आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करने और आपूर्ति शृंखला को व्यापक बनाने जैसे मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। गौरतलब है कि यह चर्चा ऐसे समय में हुई है जब भारत रक्षा निर्यात के क्षेत्र में नए लक्ष्य निर्धारित कर रहा है।

आगे की राह

गुप्ता ने भरोसा जताया कि आने वाले समय में स्थानीयकरण को और बढ़ावा देने तथा भारत के रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को और मज़बूत करने के प्रयास जारी रहेंगे। उद्योग जगत की यह एकजुटता भारत को वैश्विक रक्षा आपूर्ति शृंखला में एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में स्थापित करने की दिशा में निर्णायक साबित हो सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन 'अवसर बड़े हैं' जैसी भाषा उद्योग सम्मेलनों में दशकों से सुनाई देती रही है — असली सवाल यह है कि एमएसएमई को रक्षा आपूर्ति शृंखला में शामिल करने की गति कितनी है और गुणवत्ता मानकों पर वे कहाँ खड़े हैं। भारत का रक्षा निर्यात लक्ष्य ₹50,000 करोड़ तक पहुँचाने की महत्वाकांक्षा और वास्तविक निर्यात के बीच अभी भी बड़ा अंतर है। बिना सत्यापन-योग्य आँकड़ों और स्वतंत्र ऑडिट के, एमएसएमई एकीकरण की यह कहानी उत्साहजनक तो है, पर अधूरी भी।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एसोचैम के रक्षा सम्मेलन में मुख्य रूप से किन मुद्दों पर चर्चा हुई?
एसोचैम के राष्ट्रीय रक्षा और एयरोस्पेस सम्मेलन में घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाने, तकनीकी आत्मनिर्भरता और आपूर्ति शृंखला के विस्तार पर विशेष चर्चा हुई। इसका उद्देश्य उद्योग, सरकार और हितधारकों को एक साझा रणनीति पर लाना था।
भारत के वैश्विक रक्षा बाज़ार में बढ़ने की राह में क्या बाधाएँ हैं?
एसोचैम के राजीव गुप्ता के अनुसार, स्पष्ट रणनीति और दृढ़ प्रतिबद्धता का अभाव सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने कहा कि बिना ठोस निर्णयों के अवसर केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएंगे।
रक्षा क्षेत्र में एमएसएमई की क्या भूमिका है?
बड़ी रक्षा कंपनियों ने अनेक एमएसएमई और स्थानीय आपूर्तिकर्ता साझेदार विकसित किए हैं, जिससे देश के भीतर रक्षा उत्पादन के लिए ज़रूरी घटकों और प्रणालियों की उपलब्धता बढ़ी है। इससे आयात पर निर्भरता कम हो रही है और स्वदेशी रक्षा निर्माण को बढ़ावा मिल रहा है।
भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता अभी कहाँ है?
भारतीय उद्योग सशस्त्र सेनाओं को स्वदेश में विकसित उन्नत उत्पाद उपलब्ध करा रहा है, जो कठिन परिचालन परिस्थितियों में अपनी क्षमता साबित कर चुके हैं। हालाँकि विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए तकनीकी आत्मनिर्भरता को और तेज़ी से बढ़ाना होगा।
एसोचैम की राष्ट्रीय रक्षा और एयरोस्पेस परिषद क्या है?
यह एसोचैम (एसोसिएटेड चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया) की एक विशेष परिषद है जो रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में उद्योग, सरकार और नीति-निर्माताओं के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देती है। इसके चेयरमैन राजीव गुप्ता हैं।
राष्ट्र प्रेस
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