भारत का डीपीआई मॉडल डिजिटल कूटनीति का नया स्तंभ, 23 देशों से समझौते; एआई से बढ़ रही वैश्विक साख
सारांश
मुख्य बातें
भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) मॉडल अब केवल घरेलू डिजिटल सेवाओं तक सीमित नहीं रहा — ईस्ट एशिया फोरम की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग और डिजिटल कूटनीति का एक निर्णायक माध्यम बनता जा रहा है। एआई इम्पैक्ट समिट से पूर्व भारत ने 23 देशों के साथ डीपीआई सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जो वैश्विक स्तर पर इस मॉडल की बढ़ती स्वीकार्यता का प्रमाण है।
इंडिया स्टैक: बुनियाद और विस्तार
भारत के डिजिटल ढाँचे की नींव आधार परियोजना से रखी गई थी, जिसका प्रारंभिक उद्देश्य सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सही लाभार्थी तक पहुँचाना था। कालांतर में यह एक व्यापक डिजिटल इकोसिस्टम में रूपांतरित हो गया। आज 'इंडिया स्टैक' के अंतर्गत यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई), डिजिलॉकर और नागरिक-केंद्रित अनेक प्लेटफॉर्म शामिल हैं, जो डिजिटल पहचान, डिजिटल भुगतान, सरकारी सेवाओं की आपूर्ति और डेटा एक्सचेंज को एकीकृत करते हैं।
रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि इस मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्केलेबिलिटी और इंटरऑपरेबिलिटी है — यानी इसे विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं और प्रशासनिक संरचनाओं के अनुरूप ढाला जा सकता है।
जी20 अध्यक्षता से मिली वैश्विक पहचान
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2023 में जी20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को वैश्विक एजेंडे का केंद्रीय विषय बनाकर कूटनीतिक पहल को नई दिशा दी। उस मंच का उपयोग करते हुए भारत ने ग्लोबल साउथ के देशों के सामने अपने डिजिटल मॉडल को एक व्यावहारिक और अनुकरणीय समाधान के रूप में प्रस्तुत किया। तब से कई देशों ने इस मॉडल को अपनाने में रुचि जताई है।
एआई और डीपीआई का बढ़ता तालमेल
नीति निर्माताओं के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित अनुप्रयोग सार्वजनिक सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने, बहुभाषी पहुँच सुनिश्चित करने और नागरिकों के साथ बेहतर संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। भारत की राष्ट्रीय एआई रणनीति भी डीपीआई के साथ एआई के व्यापक एकीकरण पर बल देती है। इस संदर्भ में 'भाषिणी' जैसे भाषा-आधारित प्लेटफॉर्म विशेष महत्व रखते हैं, जिनका लक्ष्य विभिन्न भारतीय भाषाओं में डिजिटल सेवाओं को सुलभ बनाना है।
चुनौतियाँ और आगे की राह
हालाँकि विशेषज्ञ यह भी रेखांकित करते हैं कि डीपीआई मॉडल की वैश्विक सफलता के साथ-साथ डेटा गोपनीयता, डिजिटल गवर्नेंस और नियामकीय निगरानी जैसी चुनौतियों पर निरंतर ध्यान देना अनिवार्य होगा। एआई-आधारित प्रणालियों के विस्तार के साथ ये मुद्दे और अधिक जटिल हो सकते हैं। विश्लेषकों के अनुसार, डेटा सुरक्षा, पारदर्शिता, जवाबदेही और अंतर-प्रणाली समन्वय सुनिश्चित करना ही डीपीआई के दीर्घकालिक विस्तार की असली कसौटी होगी — क्योंकि नागरिकों का भरोसा ही इस पूरे ढाँचे की आधारशिला है।
यह ऐसे समय में आया है जब दुनिया के कई देश डिजिटल संप्रभुता की रक्षा करते हुए आधुनिक सार्वजनिक सेवाएँ विकसित करने के रास्ते तलाश रहे हैं — और भारत का डीपीआई मॉडल उनके लिए एक व्यावहारिक संदर्भ बिंदु के रूप में उभर रहा है।