पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत की आर्थिक स्थिरता: सरकार ने उठाए 7 बड़े कदम, संसद में दी जानकारी
सारांश
मुख्य बातें
केंद्र सरकार ने 27 जुलाई 2026 को लोकसभा में बताया कि पश्चिम एशिया संकट से उपजी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधाओं के बावजूद भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए ऊर्जा सुरक्षा, इनपुट लागत नियंत्रण, व्यापार सुगमता और तरलता सहायता सहित कई ठोस उपाय लागू किए गए हैं। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने एक लिखित उत्तर में इन उपायों का विस्तृत ब्यौरा दिया।
सरकार ने क्या-क्या कदम उठाए
सरकार ने चुनिंदा पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक पर अस्थायी रूप से सीमा शुल्क में छूट दी है, ताकि औद्योगिक इनपुट लागत का बोझ कम हो सके। इसके साथ ही कारोबारों को राहत देने के लिए भारत मैरीटाइम इंश्योरेंस पूल रिलीफ योजना शुरू की गई है।
निर्यातकों को सहारा देने के लिए निर्यातित उत्पादों पर शुल्क एवं कर वापसी योजना (आरओडीटीईपी) के लाभ बहाल किए गए हैं — इसका उद्देश्य बढ़ी हुई माल ढुलाई, बीमा और युद्ध जोखिम लागत की भरपाई करना है। इसके अलावा, इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ईसीएलजीएस) 5.0 के ज़रिये व्यवसायों को तरलता सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है।
ऊर्जा सुरक्षा पर विशेष ज़ोर
मंत्री चौधरी ने बताया कि ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कच्चे तेल के आयात स्रोतों में विविधता लाई गई है और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में वृद्धि की गई है। वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा देने के साथ-साथ कोयला एवं लिग्नाइट गैसीकरण योजना को भी आगे बढ़ाया जा रहा है।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारतीय कच्चे तेल की औसत बास्केट कीमत अप्रैल 2026 में 114.5 डॉलर प्रति बैरल के शिखर से घटकर 22 जुलाई 2026 तक 77.6 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई है। एलपीजी उपभोक्ताओं को पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर ऊर्जा उपयोग को अधिक कुशल बनाने के प्रयास भी जारी हैं।
कृषि और उर्वरक आपूर्ति
सरकार ने गैस की सुनिश्चित आपूर्ति, आयात स्रोतों में विविधता, अग्रिम खरीद और बफर स्टॉक बनाए रखकर उर्वरकों तथा अन्य आवश्यक कृषि इनपुट की पर्याप्त उपलब्धता भी सुनिश्चित की है। गौरतलब है कि पश्चिम एशिया संघर्ष का सबसे अधिक असर कच्चे तेल पर निर्भर उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा है, और भारत उनमें प्रमुख है।
व्यापार लचीलापन और पूंजी प्रवाह
वित्त राज्य मंत्री ने बताया कि सरकार मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) और व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौतों (सीईपीए) के नेटवर्क का विस्तार कर व्यापारिक लचीलापन मजबूत कर रही है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और सरकार द्वारा हाल में घोषित उपायों से पूंजी प्रवाह बढ़ने की उम्मीद है, जिससे भारत की बाहरी वित्तपोषण आवश्यकताएँ पूरी होंगी।
कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट, सेवा निर्यात में निरंतर वृद्धि और प्रवासी भारतीयों से मिलने वाले रेमिटेंस के संयुक्त प्रभाव से भारत के बाह्य क्षेत्र को समर्थन मिलेगा और चालू खाते पर दबाव कम होगा।
आर्थिक संकेतक सकारात्मक
चौधरी ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के हाई-फ्रीक्वेंसी संकेतक घरेलू मांग और आर्थिक गतिविधियों में निरंतर मजबूती का संकेत दे रहे हैं। इन समन्वित उपायों से महंगाई के दबाव को नियंत्रित रखने और वैश्विक ऊर्जा व्यवधानों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव न्यूनतम रखने की उम्मीद है।