3 अक्टूबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड से भारत सुरक्षित, केवल 3% सरकारी बॉन्ड विदेशियों के पास: विशेषज्ञ

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड से भारत सुरक्षित, केवल 3% सरकारी बॉन्ड विदेशियों के पास: विशेषज्ञ

सारांश

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड की बढ़ोतरी से भारत इसलिए सुरक्षित है क्योंकि मात्र 3% सरकारी बॉन्ड विदेशियों के पास हैं — यह RBI के पूर्व डिप्टी गवर्नर पात्रा का दावा है। असली सवाल यह है कि वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत अपनी विकास गति कैसे बनाए रखेगा।

मुख्य बातें

RBI के पूर्व डिप्टी गवर्नर माइकल देबब्रत पात्रा के अनुसार भारत के कुल सरकारी बॉन्ड में से केवल 3% विदेशी निवेशकों के पास हैं, जिससे अमेरिकी यील्ड बढ़ोतरी का सीधा असर सीमित है।
भारतीय बॉन्ड यील्ड को मुख्यतः घरेलू कारक नियंत्रित करते हैं, न कि वैश्विक रुझान।
पात्रा ने कहा कि यूक्रेन और पश्चिम एशिया संघर्षों से उर्वरक आपूर्ति बाधित हो रही है, लेकिन भारत स्रोतों में विविधता लाकर स्थिति संभाल लेगा।
नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद विरमानी ने उत्पाद-विशिष्ट सब्सिडी खत्म कर प्रत्यक्ष सहायता देने की वकालत की।
विरमानी के अनुसार भारत की असली चुनौती विकास दर बढ़ाना नहीं, बल्कि मौजूदा विकास गति को बनाए रखना है।
सम्मेलन नई दिल्ली में 3 अक्टूबर 2026 को आयोजित 5वें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन के अंतर्गत हुआ।

नई दिल्ली में आयोजित 5वें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन के मौके पर अर्थशास्त्रियों ने 3 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में जारी बढ़ोतरी का भारत के घरेलू ऋण बाज़ार पर सीधा प्रभाव सीमित है, क्योंकि देश के कुल सरकारी बॉन्ड में से मात्र 3 प्रतिशत विदेशी निवेशकों के पास हैं। विशेषज्ञों के अनुसार असली दीर्घकालिक चुनौती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की मौजूदा आर्थिक विकास दर को टिकाए रखना है।

भारत क्यों है अपेक्षाकृत सुरक्षित

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के पूर्व डिप्टी गवर्नर और अर्थशास्त्री माइकल देबब्रत पात्रा ने सम्मेलन के साइडलाइन में कहा, 'वास्तव में ऐसा नहीं है, क्योंकि भारत के कुल सरकारी बॉन्ड में से केवल 3 प्रतिशत विदेशी निवेशकों के पास हैं। ज़्यादातर बॉन्ड घरेलू स्तर पर ही रखे गए हैं।' उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि दुनियाभर में बॉन्ड यील्ड बढ़ने का व्यापक रुझान निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकता है, परंतु भारतीय बॉन्ड यील्ड को मुख्यतः घरेलू कारक ही नियंत्रित करते हैं।

यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब अमेरिकी फेडरल रिज़र्व की सख्त मौद्रिक नीति के कारण वैश्विक स्तर पर बॉन्ड यील्ड ऊँची बनी हुई है और कई उभरते बाज़ारों से पूँजी पलायन की आशंका जताई जा रही है।

वैश्विक खाद्य संकट और उर्वरक आयात पर भारत की रणनीति

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर की उर्वरक की कमी और भू-राजनीतिक संघर्षों से उपजने वाले संभावित वैश्विक खाद्य संकट की चेतावनी के संदर्भ में पात्रा ने कहा कि भारत अपने उर्वरक आयात के स्रोतों में सक्रिय रूप से विविधता ला रहा है।

उन्होंने कहा, 'यूक्रेन और पश्चिम एशिया में युद्ध से आपूर्ति में बाधाएँ पैदा हो रही हैं, लेकिन मेरा मानना है कि जहाँ यह कमी अस्थायी हो सकती है, वहीं लंबे समय में भारत अपने स्रोतों और आयात बाज़ारों में व्यापक विविधता लाएगा और स्थिति को संभाल लेगा।' गौरतलब है कि यूक्रेन संघर्ष के बाद से वैश्विक उर्वरक कीमतों में तीव्र उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है, जो विकासशील देशों की खाद्य सुरक्षा को सीधे प्रभावित करता है।

सब्सिडी सुधार पर विशेषज्ञ की राय

अर्थशास्त्री और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद विरमानी ने उत्पाद-विशिष्ट सब्सिडी को कम कर सीधी सहायता देने की व्यवस्था की ओर बढ़ने की वकालत की। उनके अनुसार, 'सब्सिडी कम करना अच्छी बात है। सब्सिडी सीधे दी जानी चाहिए। सहायता देने के लिए सब्सिडी एक अप्रभावी तरीका है, क्योंकि इससे बाज़ार में विकृतियाँ पैदा होती हैं।'

विरमानी ने इस बदलाव को सब्सिडी-मुक्त आर्थिक व्यवस्था की ओर एक व्यापक नीतिगत बदलाव का हिस्सा बताया। आलोचकों का कहना है कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) ढाँचे के बिना इस बदलाव से कमज़ोर वर्गों पर असर पड़ सकता है।

विकास दर बनाए रखना असली चुनौती

भारत की विकास संभावनाओं पर विरमानी ने कहा कि मुख्य चुनौती विकास की रफ्तार को लगातार बढ़ाना नहीं, बल्कि मौजूदा विकास गति को टिकाए रखना है। उन्होंने कहा, 'विकास का इतिहास बताता है कि आप इसे लगातार बढ़ाते नहीं रह सकते। आप सुधार करते हैं, विकास को ऊँचे स्तर तक ले जाते हैं और फिर चुनौती उस दर को बनाए रखने की होती है।'

उन्होंने यूक्रेन युद्ध जैसी वैश्विक बाधाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि ये नीति-निर्माताओं के सामने बाहरी दबाव का स्पष्ट संकेत हैं। आने वाले समय में घरेलू सुधारों की गति और वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिरता दोनों मिलकर यह तय करेंगे कि भारत अपनी विकास कहानी को कितने समय तक बरकरार रख सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं दिखाता — डॉलर के मज़बूत होने से रुपये पर दबाव और इक्विटी से विदेशी पूँजी पलायन का जोखिम बना रहता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से घरेलू वित्तीय स्थिरता को प्रभावित करता है। विरमानी का सब्सिडी सुधार का सुझाव नीतिगत दृष्टि से सही दिशा में है, पर बिना मज़बूत DBT ढाँचे के यह बदलाव ग्रामीण और निम्न-आय वर्गों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। दोनों विशेषज्ञ वैश्विक बाधाओं को 'अस्थायी' मान रहे हैं — जबकि यूक्रेन और पश्चिम एशिया में संघर्ष की अनिश्चितता इस धारणा को चुनौती देती है। कौटिल्य सम्मेलन जैसे मंचों से आने वाली नीतिगत सलाह तब ही प्रासंगिक रहती है जब उसे जमीनी क्रियान्वयन की कसौटी पर परखा जाए।
RashtraPress
3 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने से भारत पर सीधा असर क्यों सीमित है?
भारत के कुल सरकारी बॉन्ड में से केवल 3% विदेशी निवेशकों के पास हैं, इसलिए अमेरिकी यील्ड बढ़ने से बड़े पैमाने पर विदेशी बिकवाली का जोखिम कम है। भारतीय बॉन्ड यील्ड मुख्यतः घरेलू कारकों — जैसे RBI की नीति और मुद्रास्फीति — से निर्धारित होती है।
5वाँ कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन क्या है और इसमें किसने भाग लिया?
कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित एक प्रमुख नीतिगत विमर्श मंच है। 3 अक्टूबर 2026 को आयोजित इसके 5वें संस्करण में RBI के पूर्व डिप्टी गवर्नर माइकल देबब्रत पात्रा और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद विरमानी समेत कई अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों ने भाग लिया।
अरविंद विरमानी ने सब्सिडी के बारे में क्या कहा?
विरमानी ने उत्पाद-विशिष्ट सब्सिडी को अप्रभावी बताया और कहा कि यह बाज़ार में विकृतियाँ पैदा करती है। उनके अनुसार सहायता सीधे लाभार्थियों को दी जानी चाहिए, न कि उत्पादों पर सब्सिडी के रूप में।
उर्वरक आयात और वैश्विक खाद्य संकट पर भारत की क्या स्थिति है?
पात्रा के अनुसार यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों से उर्वरक आपूर्ति में बाधा आ रही है, लेकिन भारत सक्रिय रूप से अपने आयात स्रोतों में विविधता ला रहा है। उनका मानना है कि यह कमी अस्थायी है और दीर्घकाल में भारत स्थिति को संभाल लेगा।
भारत की आर्थिक विकास दर के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
विरमानी के अनुसार असली चुनौती विकास दर को और बढ़ाना नहीं, बल्कि मौजूदा गति को बनाए रखना है। उन्होंने कहा कि यूक्रेन युद्ध जैसी वैश्विक बाधाएँ नीति-निर्माताओं के नियंत्रण से बाहर हैं और इनसे निपटने के लिए घरेलू सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 4 दिन पहले
  2. 1 सप्ताह पहले
  3. 1 महीना पहले
  4. 3 महीने पहले
  5. 11 महीने पहले
  6. 12 महीने पहले
  7. 12 महीने पहले
  8. 1 साल पहले