आरबीआई की लिक्विडिटी निकासी से भारत का यील्ड कर्व और सपाट होने के संकेत, 5-10 साल का अंतर घटकर 10 बेसिस पॉइंट तक आ सकता है
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा बैंकिंग प्रणाली से अतिरिक्त नकदी की निकासी तेज़ किए जाने के कारण भारतीय सरकारी बॉन्ड का यील्ड कर्व आगे और सपाट होने की संभावना है। विश्लेषकों के अनुसार, इस स्थिति में कुछ निवेशक पाँच साल की अवधि वाले बॉन्ड की जगह 10 साल की अवधि वाले सरकारी बॉन्ड को प्राथमिकता दे सकते हैं। यह आकलन ऐसे समय में आया है जब RBI की तीन दिवसीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक चल रही है और बाज़ार की नज़रें बुधवार को आने वाले नीतिगत फ़ैसले पर टिकी हैं।
यील्ड कर्व में क्या बदलाव आने की उम्मीद है
विश्लेषकों का अनुमान है कि पाँच साल और 10 साल की अवधि वाले सरकारी बॉन्ड की यील्ड के बीच का अंतर घटकर महज़ 10 आधार अंक (बेसिस पॉइंट) तक आ सकता है। ICICI सिक्योरिटीज़ प्राइमरी डीलरशिप के हवाले से कहा गया है कि वर्तमान में करीब 6.94 प्रतिशत पर कारोबार कर रही पाँच साल की बेंचमार्क यील्ड बढ़कर 7 प्रतिशत तक पहुँच सकती है, बशर्ते केंद्रीय बैंक आक्रामक मौद्रिक सख्ती का रुख बनाए रखे।
यदि ओवरनाइट दरें रेपो रेट से काफ़ी ऊपर चली जाती हैं, तो यील्ड कर्व सपाट या हल्का इनवर्टेड भी हो सकता है — जो बॉन्ड बाज़ार में एक असामान्य और महत्त्वपूर्ण संकेत माना जाता है।
आरबीआई की लिक्विडिटी निकासी का असर
RBI अब तक बाज़ार परिचालन के ज़रिए ₹1 लाख करोड़ से अधिक की अतिरिक्त लिक्विडिटी वापस ले चुका है। बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त नकदी की मौजूदगी के कारण ओवरनाइट उधारी की लागत पॉलिसी रेपो रेट से नीचे बनी हुई है, जो प्रभावी मौद्रिक नीति संचरण में बाधा उत्पन्न करती है।
गौरतलब है कि केंद्रीय बैंक का उद्देश्य ओवरनाइट दरों को रेपो रेट के आसपास या उससे ऊपर बनाए रखना है, ताकि नीतिगत दरों का असर अर्थव्यवस्था में सही तरह से पहुँच सके। इस प्रयास के चलते कम अवधि वाले बॉन्ड की यील्ड पर ऊपर की ओर दबाव बन रहा है।
एसबीआई रिसर्च की चेतावनी
SBI रिसर्च ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में 25 आधार अंक की ब्याज दर बढ़ोतरी के पक्ष में जोखिम का संतुलन निर्णायक रूप से झुक गया है। रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ते महंगाई के दबाव, बिगड़ते वैश्विक मैक्रो हालात, लिक्विडिटी की बदलती स्थिति और वैश्विक जोखिमों के नए आकलन ने समय रहते कदम उठाने की ज़रूरत को और मज़बूत किया है।
यह ऐसे समय में आया है जब बाज़ार यह देखना चाहता है कि क्या RBI फरवरी 2023 के बाद पहली बार रेपो रेट में बढ़ोतरी करेगा। हालाँकि, अब तक केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा हुआ है।
निवेशकों पर असर और आगे की राह
विश्लेषकों का कहना है कि यील्ड कर्व के सपाट होने की स्थिति में निवेशकों की रणनीति बदल सकती है। जो निवेशक पहले कम अवधि के बॉन्ड को तरजीह देते थे, वे अब अपेक्षाकृत बेहतर रिटर्न के लिए 10 साल के बॉन्ड की ओर रुख कर सकते हैं। आगे नकदी अवशोषण की गति और किसी भी अतिरिक्त दर-वृद्धि से यह तय होगा कि यील्ड कर्व कितनी और सपाट होती है।
MPC का फ़ैसला बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को आने की उम्मीद है, जो बॉन्ड बाज़ार की दिशा के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।