कच्चे तेल की तेजी से महंगाई 6.5% के पार जाने का खतरा, SBI रिसर्च ने RBI से 50 बेसिस पॉइंट रेपो रेट बढ़ाने की सिफारिश की
सारांश
मुख्य बातें
एसबीआई रिसर्च की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उछाल के चलते भारत में खुदरा महंगाई दर अक्टूबर-नवंबर तक 6.5 प्रतिशत या उससे भी ऊपर पहुँच सकती है। रिपोर्ट में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से अक्टूबर में 25 आधार अंक और दिसंबर में अतिरिक्त 25 आधार अंक — कुल मिलाकर 50 बेसिस पॉइंट — की रेपो रेट बढ़ोतरी की सिफारिश की गई है। 12 सितंबर को जारी यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब भू-राजनीतिक अस्थिरता ने ऊर्जा बाज़ारों में भारी उथल-पुथल मचा रखी है।
कच्चे तेल के दाम और महंगाई का सीधा संबंध
रिपोर्ट में बताया गया है कि भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल का बेंचमार्क पहले ही 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर चुका है। एसबीआई रिसर्च का अनुमान है कि अगले 15 दिनों में यह 123 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकता है। यदि कच्चा तेल इन ऊँचे स्तरों पर बना रहता है, तो अक्टूबर और नवंबर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई 6.5 प्रतिशत के पार जा सकती है — जो RBI के 6 प्रतिशत के सहनशीलता स्तर से ऊपर होगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त में महंगाई दर लगभग 4.8 से 4.9 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है, लेकिन आने वाले महीनों में तेल की कीमतों का दबाव इसे तेज़ी से ऊपर धकेल सकता है।
किन क्षेत्रों पर पड़ रहा असर
खुदरा महंगाई बढ़ने के शुरुआती संकेत कई क्षेत्रों में दिखने लगे हैं। पेट्रोलियम उत्पाद, प्राकृतिक गैस, बेवरेज, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स — इन सभी सेक्टरों में इनपुट लागत का बढ़ता बोझ अब सीधे उपभोक्ताओं पर डाला जा रहा है। गौरतलब है कि भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में कोई भी तेज़ उछाल घरेलू अर्थव्यवस्था पर त्वरित प्रभाव डालता है।
लिक्विडिटी और बॉन्ड यील्ड पर दबाव
लिक्विडिटी के संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया कि हाल ही में जुटाए गए फंड काफ़ी हद तक बैंकिंग सिस्टम की फंडिंग की कमी को पूरा करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 'क्रेडिट की मज़बूत माँग और वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ के मज़बूत आँकड़ों को देखते हुए, अभी जो तेज़ी आई है, उसमें स्वाभाविक रूप से कमी आएगी।' एसबीआई रिसर्च का अनुमान है कि मार्च 2027 तक सिस्टम में लिक्विडिटी ₹6 लाख करोड़ के स्तर पर होनी चाहिए।
बॉन्ड बाज़ार की बात करें तो रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 10 साल के बेंचमार्क भारतीय यील्ड 7.15 प्रतिशत या उससे भी ऊपर जा सकते हैं। वैश्विक स्तर पर भी यील्ड पिछले दस वर्षों के उच्चतम स्तर को पार कर रहे हैं — अमेरिकी 10 साल का यील्ड अब 5 प्रतिशत के करीब है, जबकि 30 साल का यील्ड घटकर 5.40 प्रतिशत के स्तर पर आ गया है।
RBI के लिए क्या हैं विकल्प
एसबीआई रिसर्च की सिफारिश के अनुसार, ये सभी कारक — ऊँचा तेल, बढ़ती महंगाई, घटती लिक्विडिटी और वैश्विक यील्ड में उछाल — मिलकर ब्याज दरों को 50 आधार अंक तक बढ़ाने के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब RBI ने हाल के मौद्रिक नीति चक्र में रेपो रेट में कटौती की दिशा में कदम बढ़ाए थे। यदि तेल की कीमतें ऊँची बनी रहती हैं, तो केंद्रीय बैंक को अपनी नीतिगत दिशा पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।
आम जनता पर असर
रेपो रेट में बढ़ोतरी का सीधा असर होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई पर पड़ेगा। इसके अलावा, कच्चे तेल की ऊँची कीमतें पेट्रोल-डीज़ल, एलपीजी और परिवहन लागत को बढ़ाकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी को और महँगा बना सकती हैं। आने वाले हफ्तों में RBI की अक्टूबर मौद्रिक नीति बैठक और कच्चे तेल की चाल — दोनों पर बाज़ार की नज़र बनी रहेगी।