सौर ऊर्जा से औद्योगीकरण: भारत बन सकता है कोयला छोड़ने वाला पहला देश, 150 GW क्षमता पार
सारांश
मुख्य बातें
भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन सकता है जो कोयले की बजाय सौर ऊर्जा को अपने औद्योगीकरण की नींव बनाए — यह दावा येल ई360 की एक हालिया रिपोर्ट में किया गया है, जिसका हवाला जलवायु-केंद्रित अमेरिकी पोर्टल ग्रिस्ट ने दिया है। देश की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता मार्च 2026 तक 150 गीगावाट को पार कर चुकी है और यह प्रतिवर्ष करीब 40 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।
खावड़ा: दुनिया का सबसे बड़ा सौर पार्क
गुजरात के कच्छ के रेगिस्तान में स्थित खावड़ा सौर पार्क इस ऊर्जा क्रांति का केंद्र बनता जा रहा है। भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट लगभग 280 वर्ग मील में फैला यह पार्क 2029 तक दुनिया की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा परियोजना बन सकता है।
पूरी तरह चालू होने पर इसमें करीब 6 करोड़ सौर पैनल लगेंगे और यह 30 गीगावाट बिजली उत्पन्न करेगा — जो ऑस्ट्रिया जैसे देश की पूरी बिजली ज़रूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है। यह क्षेत्र तेज़ी से विश्व के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा केंद्रों में से एक के रूप में उभर रहा है।
कोयले से सौर ऊर्जा की ओर: नीतिगत बदलाव
यह बदलाव महज एक दशक पहले की स्थिति से बिल्कुल विपरीत है। 2014 में सत्ता संभालने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 तक कोयला उत्पादन दोगुना करने का संकल्प लिया था। उस दौर में सरकार ने औद्योगिक विकास को गति देने के लिए जीवाश्म ईंधन का पुरज़ोर समर्थन किया था।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु शिखर सम्मेलनों में कोयले को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के दबाव का यह कहते हुए विरोध किया था कि विकासशील देशों को गरीबी उन्मूलन और आर्थिक विस्तार के लिए अभी भी जीवाश्म ईंधन की ज़रूरत है। गौरतलब है कि ग्लासगो COP26 जलवायु शिखर सम्मेलन के बाद से सौर संयंत्रों की स्थापना में तीव्र तेज़ी आई है।
आंकड़े क्या कहते हैं
रिपोर्टों के अनुसार, पिछले वर्ष पहली बार भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों का योगदान 50 प्रतिशत से अधिक रहा — यह एक ऐतिहासिक पड़ाव है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, अभी से 2030 के बीच भारत की अतिरिक्त बिजली माँग का लगभग आधा हिस्सा सौर ऊर्जा से पूरा होने की उम्मीद है। शेष एक चौथाई हिस्सा पवन, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा जैसे कम कार्बन उत्सर्जन वाले स्रोतों से पूरा होने की संभावना है। भारत ने 2030 तक अपनी सौर क्षमता को फिर से दोगुना करने का लक्ष्य रखा है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक एम्बर के ऊर्जा रणनीतिकार किंग्समिल बॉन्ड के अनुसार, भारत चीन और पश्चिमी देशों से अलग रास्ते पर चल रहा है, जिन्होंने अपनी अर्थव्यवस्थाओं की बुनियाद जीवाश्म ईंधन पर रखी। बॉन्ड ने कहा, 'चीन ने कोयले पर अपनी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया; भारत सौर ऊर्जा पर निर्माण कर रहा है।'
उनके अनुसार भारत का यह मॉडल उन अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है जो भारी कार्बन उत्सर्जन के बिना तीव्र विकास की राह खोज रही हैं। सौर पैनलों की लगातार गिरती कीमतों और भारत की अनुकूल धूप वाली जलवायु ने इस रणनीतिक बदलाव को संभव बनाया है।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संक्रमण की बहस तेज़ हो रही है और विकासशील देश अपने विकास के अधिकार और जलवायु प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन बना रहे हैं। यदि भारत अपने 2030 के लक्ष्य हासिल करता है, तो यह न केवल वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य को बदलेगा, बल्कि विकासशील विश्व के लिए एक नया खाका भी तैयार करेगा।