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सौर ऊर्जा से औद्योगीकरण: भारत बन सकता है कोयला छोड़ने वाला पहला देश, 150 GW क्षमता पार

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सौर ऊर्जा से औद्योगीकरण: भारत बन सकता है कोयला छोड़ने वाला पहला देश, 150 GW क्षमता पार

सारांश

भारत कोयले की जगह सौर ऊर्जा पर औद्योगीकरण करने वाला पहला देश बन सकता है। 150 GW क्षमता पार कर चुका देश, गुजरात के खावड़ा में 30 GW का विशाल पार्क बना रहा है — और एम्बर के विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यह मॉडल पूरी दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए नई राह दिखा सकता है।

मुख्य बातें

भारत की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता मार्च 2026 तक 150 गीगावाट को पार कर गई, वार्षिक वृद्धि दर करीब 40 प्रतिशत ।
गुजरात के कच्छ में स्थित खावड़ा सौर पार्क 2029 तक 30 गीगावाट बिजली उत्पन्न करेगा — दुनिया की सबसे बड़ी सौर परियोजना बनने की राह पर।
पहली बार भारत की कुल बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों का हिस्सा 50 प्रतिशत से अधिक हुआ।
IEA के अनुसार 2030 तक भारत की अतिरिक्त बिजली माँग का आधा हिस्सा सौर ऊर्जा से पूरा होगा।
थिंक टैंक एम्बर के किंग्समिल बॉन्ड ने कहा — भारत का मॉडल अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए प्रेरणा बन सकता है।

भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन सकता है जो कोयले की बजाय सौर ऊर्जा को अपने औद्योगीकरण की नींव बनाए — यह दावा येल ई360 की एक हालिया रिपोर्ट में किया गया है, जिसका हवाला जलवायु-केंद्रित अमेरिकी पोर्टल ग्रिस्ट ने दिया है। देश की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता मार्च 2026 तक 150 गीगावाट को पार कर चुकी है और यह प्रतिवर्ष करीब 40 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।

खावड़ा: दुनिया का सबसे बड़ा सौर पार्क

गुजरात के कच्छ के रेगिस्तान में स्थित खावड़ा सौर पार्क इस ऊर्जा क्रांति का केंद्र बनता जा रहा है। भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट लगभग 280 वर्ग मील में फैला यह पार्क 2029 तक दुनिया की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा परियोजना बन सकता है।

पूरी तरह चालू होने पर इसमें करीब 6 करोड़ सौर पैनल लगेंगे और यह 30 गीगावाट बिजली उत्पन्न करेगा — जो ऑस्ट्रिया जैसे देश की पूरी बिजली ज़रूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है। यह क्षेत्र तेज़ी से विश्व के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा केंद्रों में से एक के रूप में उभर रहा है।

कोयले से सौर ऊर्जा की ओर: नीतिगत बदलाव

यह बदलाव महज एक दशक पहले की स्थिति से बिल्कुल विपरीत है। 2014 में सत्ता संभालने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 तक कोयला उत्पादन दोगुना करने का संकल्प लिया था। उस दौर में सरकार ने औद्योगिक विकास को गति देने के लिए जीवाश्म ईंधन का पुरज़ोर समर्थन किया था।

भारत ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु शिखर सम्मेलनों में कोयले को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के दबाव का यह कहते हुए विरोध किया था कि विकासशील देशों को गरीबी उन्मूलन और आर्थिक विस्तार के लिए अभी भी जीवाश्म ईंधन की ज़रूरत है। गौरतलब है कि ग्लासगो COP26 जलवायु शिखर सम्मेलन के बाद से सौर संयंत्रों की स्थापना में तीव्र तेज़ी आई है।

आंकड़े क्या कहते हैं

रिपोर्टों के अनुसार, पिछले वर्ष पहली बार भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों का योगदान 50 प्रतिशत से अधिक रहा — यह एक ऐतिहासिक पड़ाव है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, अभी से 2030 के बीच भारत की अतिरिक्त बिजली माँग का लगभग आधा हिस्सा सौर ऊर्जा से पूरा होने की उम्मीद है। शेष एक चौथाई हिस्सा पवन, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा जैसे कम कार्बन उत्सर्जन वाले स्रोतों से पूरा होने की संभावना है। भारत ने 2030 तक अपनी सौर क्षमता को फिर से दोगुना करने का लक्ष्य रखा है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक एम्बर के ऊर्जा रणनीतिकार किंग्समिल बॉन्ड के अनुसार, भारत चीन और पश्चिमी देशों से अलग रास्ते पर चल रहा है, जिन्होंने अपनी अर्थव्यवस्थाओं की बुनियाद जीवाश्म ईंधन पर रखी। बॉन्ड ने कहा, 'चीन ने कोयले पर अपनी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया; भारत सौर ऊर्जा पर निर्माण कर रहा है।'

उनके अनुसार भारत का यह मॉडल उन अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है जो भारी कार्बन उत्सर्जन के बिना तीव्र विकास की राह खोज रही हैं। सौर पैनलों की लगातार गिरती कीमतों और भारत की अनुकूल धूप वाली जलवायु ने इस रणनीतिक बदलाव को संभव बनाया है।

आगे की राह

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संक्रमण की बहस तेज़ हो रही है और विकासशील देश अपने विकास के अधिकार और जलवायु प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन बना रहे हैं। यदि भारत अपने 2030 के लक्ष्य हासिल करता है, तो यह न केवल वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य को बदलेगा, बल्कि विकासशील विश्व के लिए एक नया खाका भी तैयार करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन 'पहला देश' वाला दावा सावधानी से परखा जाना चाहिए — क्योंकि देश में कोयला उत्पादन अभी भी बढ़ रहा है और बिजली क्षेत्र के बाहर उद्योग, इस्पात व सीमेंट जैसे क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बनी हुई है। असली परीक्षा यह है कि क्या सौर ऊर्जा की यह बढ़त कोयले की खपत को वास्तव में प्रतिस्थापित करती है या केवल नई माँग को पूरा करती है। खावड़ा जैसे मेगा प्रोजेक्ट की सफलता ग्रिड स्थिरता, भंडारण क्षमता और राज्यों की वितरण प्रणाली की मज़बूती पर निर्भर करेगी — जो अभी भी कमज़ोर कड़ी है।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत कोयले की जगह सौर ऊर्जा से औद्योगीकरण करने वाला पहला देश कैसे बन सकता है?
येल ई360 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की सौर ऊर्जा क्षमता मार्च 2026 तक 150 गीगावाट पार कर चुकी है और यह 40 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रही है। पहली बार देश की कुल बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों का हिस्सा 50 प्रतिशत से अधिक हो गया है, जो इसे अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से अलग करता है।
खावड़ा सौर पार्क क्या है और यह कहाँ स्थित है?
खावड़ा सौर पार्क गुजरात के कच्छ ज़िले में भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट लगभग 280 वर्ग मील में फैला है। 2029 तक पूरा होने पर इसमें करीब 6 करोड़ सौर पैनल लगेंगे और यह 30 गीगावाट बिजली उत्पन्न करेगा, जो ऑस्ट्रिया जैसे देश की पूरी बिजली ज़रूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है।
भारत का 2030 तक सौर ऊर्जा लक्ष्य क्या है?
भारत ने 2030 तक अपनी सौर ऊर्जा क्षमता को मौजूदा स्तर से दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। IEA के अनुसार, 2030 तक भारत की अतिरिक्त बिजली माँग का लगभग आधा हिस्सा सौर ऊर्जा से और एक चौथाई हिस्सा पवन, जलविद्युत व परमाणु ऊर्जा से पूरा होने की उम्मीद है।
भारत की सौर ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव कब से आया?
2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोयला उत्पादन दोगुना करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन सौर पैनलों की गिरती कीमतों और अनुकूल जलवायु ने धीरे-धीरे रणनीति बदली। ग्लासगो COP26 जलवायु शिखर सम्मेलन के बाद से सौर संयंत्रों की स्थापना में विशेष तेज़ी आई है।
भारत का सौर ऊर्जा मॉडल अन्य देशों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
एम्बर थिंक टैंक के ऊर्जा रणनीतिकार किंग्समिल बॉन्ड के अनुसार, भारत का मॉडल उन उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए प्रेरणा बन सकता है जो भारी कार्बन उत्सर्जन के बिना तीव्र विकास चाहती हैं। यह साबित करता है कि विकासशील देश जीवाश्म ईंधन पर निर्भर हुए बिना भी तेज़ औद्योगिक विकास कर सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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