ऐतिहासिक जलवायु समझौता: भारत-दक्षिण कोरिया ने पेरिस आर्टिकल 6.2 के तहत बनाया सीमा-पार कार्बन बाजार

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ऐतिहासिक जलवायु समझौता: भारत-दक्षिण कोरिया ने पेरिस आर्टिकल 6.2 के तहत बनाया सीमा-पार कार्बन बाजार

सारांश

भारत और दक्षिण कोरिया ने पेरिस समझौते के आर्टिकल 6.2 के तहत कार्बन बाजार समझौते पर हस्ताक्षर किए। भारत को स्वच्छ ऊर्जा फंडिंग मिलेगी, कोरिया को सस्ते कार्बन क्रेडिट। भारत का लक्ष्य 2070 और कोरिया का 2050 तक नेट-जीरो हासिल करना है।

Key Takeaways

  • भारत और दक्षिण कोरिया ने पेरिस समझौते के आर्टिकल 6.2 के तहत ऐतिहासिक कार्बन बाजार समझौते पर हस्ताक्षर किए।
  • यह समझौता दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान संपन्न हुआ और स्वच्छ ऊर्जा व व्यापार समझौतों के बड़े पैकेज का हिस्सा है।
  • आईटीएमओ प्रणाली के तहत एक टन कार्बन डाइऑक्साइड की कटौती को कार्बन क्रेडिट के रूप में व्यापार किया जा सकेगा।
  • भारत का नेट-जीरो लक्ष्य 2070 और दक्षिण कोरिया का 2050 है — इस अंतर से दोनों को परस्पर लाभ मिलेगा।
  • कॉरेस्पोंडिंग एडजस्टमेंट नियम सुनिश्चित करेगा कि एक उत्सर्जन कटौती को दो बार न गिना जाए, जिससे सिस्टम पारदर्शी रहेगा।
  • दक्षिण कोरिया भारत में परियोजनाओं में निवेश कर सस्ते कार्बन क्रेडिट हासिल करेगा, जबकि भारत को हरित ऊर्जा के लिए विदेशी पूंजी मिलेगी।

नई दिल्ली, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत और दक्षिण कोरिया ने वैश्विक जलवायु संकट से निपटने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए पेरिस समझौते के आर्टिकल 6.2 के तहत द्विपक्षीय कार्बन बाजार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान संपन्न हुआ और दोनों एशियाई महाशक्तियों के बीच सीमा-पार कार्बन क्रेडिट व्यापार का रास्ता खोलता है।

समझौते की मुख्य बातें

यह द्विपक्षीय करार केवल जलवायु तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वच्छ ऊर्जा, व्यापार और औद्योगिक साझेदारी से जुड़े कई अन्य समझौतों के व्यापक पैकेज का हिस्सा है। इससे स्पष्ट होता है कि दोनों देश आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ साधने की रणनीति पर चल रहे हैं।

आर्टिकल 6.2 का तंत्र देशों को मिलकर उत्सर्जन कटौती परियोजनाओं पर काम करने और कार्बन क्रेडिट्स का आपसी लेन-देन करने की सुविधा देता है। इससे कम लागत में जलवायु लक्ष्य हासिल करना संभव हो जाता है, जो विशेष रूप से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

आईटीएमओ प्रणाली कैसे काम करती है

इस व्यवस्था के अंतर्गत उत्सर्जन में की गई कमी को आईटीएमओ (Internationally Transferred Mitigation Outcome) कहा जाता है। एक आईटीएमओ का अर्थ है एक टन कार्बन डाइऑक्साइड या उसके समतुल्य ग्रीनहाउस गैस का वातावरण से कम होना।

इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता है 'कॉरेस्पोंडिंग एडजस्टमेंट' का नियम, जो सुनिश्चित करता है कि एक ही उत्सर्जन कटौती को दो अलग-अलग देश अपने लक्ष्य में न जोड़ सकें। इससे पूरा सिस्टम पारदर्शी और विश्वसनीय बना रहता है।

भारत और कोरिया को क्या मिलेगा फायदा

भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है, जबकि दक्षिण कोरिया यही लक्ष्य 2050 तक हासिल करना चाहता है। दोनों देशों की टाइमलाइन में अंतर होने के कारण यह साझेदारी परस्पर लाभकारी बनती है।

दक्षिण कोरिया, जहां घरेलू स्तर पर उत्सर्जन कटौती के विकल्प सीमित और महंगे हैं, वह भारत में स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश कर सस्ते में कार्बन क्रेडिट हासिल कर सकता है। वहीं भारत को ऐसी परियोजनाओं के लिए विदेशी वित्तपोषण मिलेगा, जिससे वह अपनी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता तेजी से बढ़ा सकता है।

वैश्विक कार्बन बाजार में भारत की बढ़ती भूमिका

गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर कार्बन बाजार में रुचि तेजी से बढ़ रही है। कई देश पहले ही आर्टिकल 6.2 के तहत द्विपक्षीय करार कर चुके हैं और अनेक परियोजनाएं क्रियान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। भारत-दक्षिण कोरिया समझौता इस दिशा में एशिया के दो प्रमुख देशों के बीच हुआ एक महत्वपूर्ण कदम है।

विशेषज्ञों के अनुसार, आर्टिकल 6.2 आधारित तंत्र को अब एक अनिवार्य नीतिगत उपकरण के रूप में देखा जा रहा है, जो देशों को कम वित्तीय बोझ के साथ अपने राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों (NDC) को पूरा करने में सक्षम बनाता है।

आगे की राह

इस समझौते के बाद दोनों देशों को अब परियोजनाओं की पहचान, क्रेडिट की निगरानी और रिपोर्टिंग के लिए एक ठोस द्विपक्षीय ढांचा तैयार करना होगा। आने वाले महीनों में भारत और दक्षिण कोरिया के बीच तकनीकी कार्यसमूहों की बैठकें होने की संभावना है, जो इस करार को जमीनी स्तर पर लागू करने की रूपरेखा तय करेंगी।

Point of View

बल्कि एक रणनीतिक आर्थिक चाल भी है। भारत अपनी विशाल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को एक वैश्विक 'कार्बन क्रेडिट हब' में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जो विदेशी पूंजी आकर्षित करने का नया माध्यम बन सकता है। विडंबना यह है कि जो देश ऐतिहासिक रूप से सबसे कम उत्सर्जक रहे हैं, वे अब विकसित देशों की जलवायु विफलताओं की भरपाई के लिए क्रेडिट बेच रहे हैं — यह वैश्विक जलवायु न्याय की एक जटिल परत है जिस पर बहस होनी चाहिए। फिर भी, यदि यह तंत्र पारदर्शिता से लागू हो, तो भारत के लिए यह हरित अर्थव्यवस्था की ओर छलांग का अवसर है।
NationPress
25/04/2026

Frequently Asked Questions

भारत और दक्षिण कोरिया का कार्बन बाजार समझौता क्या है?
भारत और दक्षिण कोरिया ने पेरिस समझौते के आर्टिकल 6.2 के तहत एक द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो दोनों देशों को सीमा-पार कार्बन क्रेडिट का लेन-देन करने की अनुमति देता है। इससे दोनों देश मिलकर उत्सर्जन कटौती परियोजनाओं पर काम कर सकेंगे।
पेरिस समझौते का आर्टिकल 6.2 क्या होता है?
आर्टिकल 6.2 देशों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्बन क्रेडिट (आईटीएमओ) का व्यापार करने की सुविधा देता है। इससे एक देश दूसरे देश में उत्सर्जन कटौती परियोजना में निवेश कर उस कमी को अपने राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्य में शामिल कर सकता है।
इस समझौते से भारत को क्या फायदा होगा?
भारत को स्वच्छ ऊर्जा और हरित परियोजनाओं के लिए दक्षिण कोरिया से विदेशी वित्तपोषण मिलेगा, जिससे वह 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ सकता है। इससे भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विस्तार में मदद मिलेगी।
आईटीएमओ क्या होता है और यह कैसे काम करता है?
आईटीएमओ यानी Internationally Transferred Mitigation Outcome — एक आईटीएमओ एक टन कार्बन डाइऑक्साइड या समतुल्य गैस की कटौती को दर्शाता है। 'कॉरेस्पोंडिंग एडजस्टमेंट' नियम सुनिश्चित करता है कि एक कटौती को दो देश एक साथ अपने लक्ष्य में न जोड़ें।
भारत और दक्षिण कोरिया के नेट-जीरो लक्ष्य क्या हैं?
भारत ने 2070 तक और दक्षिण कोरिया ने 2050 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। दोनों की अलग-अलग समयसीमा इस साझेदारी को परस्पर लाभकारी बनाती है।
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