भारत में ब्याज दरें निकट से मध्यम अवधि में ऊपर रहने का अनुमान: एक्सिस बैंक रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
एक्सिस बैंक की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के मध्यावधि चुनाव के परिणामों और वैश्विक बाज़ारों में नरमी के बाद बॉन्ड यील्ड में कुछ गिरावट आई है, लेकिन भारत में ब्याज दरें निकट से मध्यम अवधि में ऊपर की दिशा में बनी रहने की संभावना है। 6 नवंबर 2026 को जारी इस रिपोर्ट में कहा गया कि तात्कालिक दबाव कम हुए हैं, परंतु दीर्घकालिक संरचनात्मक कारण अभी भी प्रभावी हैं।
निकट अवधि के दबाव क्यों घटे
रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में संभावित गिरावट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े निवेश की फंडिंग माँग में कमी और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में आई नरमी ने उन निकट-अवधि के घटकों को कुछ कमज़ोर किया है जो भारतीय ब्याज दरों पर दबाव बना रहे थे।
रिपोर्ट में कहा गया, 'AI से जुड़ी बिकवाली और अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले अक्टूबर 2026 के पहले तीन हफ्तों में भारतीय बॉन्ड यील्ड अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गई थी। वैश्विक बेंचमार्क और कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ी, महंगाई के व्यापक होने के संकेत और ओपन मार्केट ऑपरेशंस के तहत बॉन्ड की बिक्री ने दरों को ऊपर पहुँचाया।'
दीर्घकालिक संरचनात्मक कारण अब भी मज़बूत
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की ब्याज दरों का वैश्विक बेंचमार्क और MIFOR के साथ बढ़ता तालमेल तथा महंगाई से जुड़े जोखिम जैसे बुनियादी कारक बदस्तूर बने हुए हैं।
इसके अतिरिक्त, FCNR जमा के माध्यम से आए धन का प्रभाव कम होने के बाद जमा वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ना और भारतीय डेट बाज़ार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की सीमित दिलचस्पी भी दरों को ऊँचा बनाए रखने के प्रमुख कारण हैं।
वेतन आयोग का संभावित असर
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई कि अगले साल वेतन आयोग के लागू होने से राजकोषीय समेकन की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है, जो बदले में ब्याज दरों को प्रभावित कर सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति पर बाज़ार की नज़र बनी हुई है।
रेपो दर पर रिपोर्ट का अनुमान
रिपोर्ट में कहा गया, 'भले ही घरेलू अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति कम नॉमिनल न्यूट्रल ब्याज दर की माँग करती हो, रुपए को लेकर तार्किक अपेक्षाएँ और वैश्विक वित्तीय बाज़ारों की सख्ती दरों को ऊँचे स्तर पर बनाए हुए हैं।'
एक्सिस बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, रेपो दर को बढ़ाकर कम से कम 6 प्रतिशत के न्यूट्रल स्तर तक लाए जाने की उम्मीद है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि यह वास्तव में बड़े पैमाने पर दरें बढ़ाने की नहीं, बल्कि उन्हें सामान्य स्तर पर वापस लाने की प्रक्रिया है — जिसका मुख्य कारण महंगाई का अत्यंत निचले स्तर से सामान्य होना है। हालाँकि, रिपोर्ट यह भी स्वीकार करती है कि आगे दरों में बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी रहेगी।