1984 सिख विरोधी दंगे: पूर्व न्यायाधीश ढींगरा बोले — मुकदमे संस्थागत धोखाधड़ी की तरह चलाए गए
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति शिव नारायण ढींगरा ने 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मुकदमों की कार्यवाही पर गंभीर आरोप लगाए हैं — उनका कहना है कि चार दशकों तक आपराधिक न्याय व्यवस्था को व्यवस्थित रूप से कमज़ोर किया गया और प्रभावशाली राजनीतिक संरक्षकों को बचाने के लिए इन मुकदमों को संस्थागत 'धोखाधड़ी' की तरह संचालित किया गया। उन्होंने यह बात 6 नवंबर 2026 को चंडीगढ़ में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के 'जख्म 84 दे' सम्मेलन में 'मर्डर ऑफ जस्टिस' सत्र को संबोधित करते हुए कही।
न्यायमूर्ति ढींगरा की भूमिका और पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति ढींगरा ने 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल (SIT) का नेतृत्व किया था। इससे पहले, कड़कड़डूमा विशेष अदालत में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के रूप में उन्होंने पूर्वी दिल्ली के दंगा मामलों की खुद सुनवाई की थी। यह दोहरी भूमिका उन्हें इस विषय पर सबसे प्रत्यक्ष अनुभव रखने वाले न्यायिक अधिकारियों में से एक बनाती है।
उन्होंने कहा, 'कोई दंगा अपने आप नहीं होता। हर सांप्रदायिक दंगे को प्रबंधित किया जाता है और उसे संरक्षण दिया जाता है।' उनके अनुसार, 1984 में पुनर्वास कॉलोनियों से भीड़ जुटाई गई, उन्हें हथियार दिए गए और सिख परिवारों के घरों को निशाना बनाने के लिए विशेष सूचियां थमाई गईं।
प्रक्रियागत बाधाएं और त्रिलोकपुरी नरसंहार
न्यायमूर्ति ढींगरा ने त्रिलोकपुरी नरसंहार का उदाहरण देते हुए बताया कि पुलिस ने 200 से अधिक अलग-अलग हत्याओं को एकमात्र प्राथमिकी (FIR) में दर्ज कर दिया, जबकि आपराधिक प्रक्रिया कानून के तहत एक साथ तीन से अधिक अपराधों की सुनवाई संभव नहीं थी। इसके बावजूद अभियोजन पक्ष ने मामलों को पृथक करने के लिए दाखिल आवेदन को वर्षों तक लंबित पड़ा रहने दिया।
उन्होंने बताया कि जब उन्होंने स्वयं उस लंबित आवेदन को पुनः सामने लाकर प्रत्येक हत्या के लिए अलग आरोप-पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया, तब एक मामला 200 अलग-अलग मुकदमों में विभाजित हुआ। इस प्रक्रिया में एचकेएल भगत जैसे प्रमुख राजनीतिक नेताओं और स्थानीय पार्षदों को भी मुकदमे का सामना करना पड़ा।
जांच आयोगों से आपराधिक मामले रोकने का आरोप
न्यायमूर्ति ढींगरा के अनुसार, 1984 से 1992 के बीच लगातार अलग-अलग जांच आयोगों का गठन किया गया, ताकि औपचारिक आपराधिक मामले दर्ज होने से रोके जा सकें। उन्होंने सवाल उठाया, 'जब हमारी न्याय वितरण प्रणाली में दोषसिद्धि की दर महज छह प्रतिशत है, तो क्या दो दशक बाद किसी आरोपी का बरी होना न्याय कहलाएगा? अगर अदालत के सामने लाए गए आरोपियों ने हत्या नहीं की, तो फिर हत्या किसने की?'
उन्होंने आरोप लगाया कि जब आयोगों की सिफारिशों के आधार पर आठ साल बाद FIR दर्ज की गईं, तो राज्य के वकीलों ने निचली अदालतों में इसी देरी को आरोपियों को बरी कराने का आधार बना दिया — और इसे 'बिना स्पष्टीकरण के हुई देरी' बताकर बचाव पक्ष की दलीलें मज़बूत कीं।
सज्जन कुमार की गिरफ्तारी का प्रकरण
न्यायमूर्ति ढींगरा ने कांग्रेस नेता सज्जन कुमार की गिरफ्तारी की एक कोशिश का भी ब्यौरा दिया। उनके अनुसार, केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की टीम सुबह सात बजे उनके आवास पर पहुंची, लेकिन महज 15 मिनट में बाहर भीड़ जमा हो गई और आवास को घेर लिया गया। स्थानीय पुलिस ने न तो हस्तक्षेप किया, न केंद्रीय एजेंसी की सहायता की।
इस बीच, सज्जन कुमार के वकीलों ने दोपहर से पहले ही अग्रिम जमानत हासिल कर ली। न्यायमूर्ति ढींगरा ने यह भी बताया कि बाद में CBI ने अदालत के रिकॉर्ड पर एक हलफनामा दाखिल किया, जिसमें खुलासा हुआ कि पुलिस की आधिकारिक केस फाइल सज्जन कुमार के बचाव पक्ष के वकील के भौतिक कब्जे में पहुंच गई थी।
न्याय पर व्यापक सवाल
न्यायमूर्ति ढींगरा की यह टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब 1984 के दंगों को लेकर न्यायिक जवाबदेही का सवाल चार दशक बाद भी अनुत्तरित है। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी पूर्व न्यायाधीश ने इन मुकदमों की प्रक्रियागत खामियों पर सार्वजनिक रूप से उंगली उठाई हो, लेकिन SIT नेतृत्व के प्रत्यक्ष अनुभव के साथ इस स्तर का विस्तृत विवरण असाधारण है। इन आरोपों के मद्देनजर न्यायिक सुधार और जवाबदेही की माँग एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आने की संभावना है।