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आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा बोले — पश्चिम एशिया संकट पर सतर्क, भारतीय अर्थव्यवस्था झटके सहने में सक्षम

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आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा बोले — पश्चिम एशिया संकट पर सतर्क, भारतीय अर्थव्यवस्था झटके सहने में सक्षम

सारांश

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वित्त वर्ष 2027 के पहले बुलेटिन में कहा कि पश्चिम एशिया संकट से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत आधार पर खड़ी है और बाहरी झटके सहने में सक्षम है। केंद्रीय बैंक स्थिति पर सतर्क नजर रखे हुए है।

मुख्य बातें

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वित्त वर्ष 2027 के पहले बुलेटिन में कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक झटके सहने में सक्षम है।
मार्च 2026 में पश्चिम एशिया में संघर्ष तेज होने से वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा, हालांकि अप्रैल में कुछ राहत मिली।
व्यापार घाटा आयात में कमी और निर्यात में वृद्धि के चलते नौ महीने के सबसे निचले स्तर पर आया।
CPI महंगाई में मार्च में मामूली वृद्धि हुई, जिसका कारण ईंधन और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें रहीं।
फरवरी में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) सकारात्मक रहा, जबकि एफपीआई में उतार-चढ़ाव जारी रहा।
आरबीआई ने चेतावनी दी कि सप्लाई चेन की समस्या लंबी खिंची तो मांग पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

नई दिल्ली, 23 अप्रैल: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वित्त वर्ष 2027 के पहले आरबीआई बुलेटिन में स्पष्ट किया कि केंद्रीय बैंक पश्चिम एशिया संकट पर पूरी तरह सतर्क है और ऐसी नीतियां लागू करेगा जो भारतीय अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक हित में हों। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था पहले के वैश्विक संकटों की तुलना में अधिक लचीली है और बाहरी झटकों को सहने में सक्षम है।

पश्चिम एशिया संघर्ष का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

मार्च 2026 में पश्चिम एशिया में संघर्ष के तेज होने से वैश्विक सप्लाई चेन पर भारी दबाव पड़ा। हालांकि अप्रैल के पहले पखवाड़े में कुछ राहत मिली, लेकिन स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।

संघर्ष के चलते ऊर्जा कीमतें बढ़ी हैं और कई उद्योगों के लिए जरूरी कच्चे माल की आपूर्ति बाधित हुई है, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई का दबाव बढ़ा है। इससे तेल बाजार में भी जोखिम बढ़ा है।

मल्होत्रा ने बुलेटिन में लिखा, "मार्च में संघर्ष के तेज होने से परिस्थितियां प्रतिकूल हो गईं। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था पहले के संकटों और कई अन्य देशों की तुलना में ज्यादा मजबूत है, जिससे यह झटकों को सहने में सक्षम है।"

वित्तीय बाजारों में अस्थिरता और निवेशकों का रुख

वैश्विक अनिश्चितता के चलते निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है।

वैश्विक शेयर बाजारों में गिरावट देखी गई है और सरकारी बॉन्ड यील्ड में भी बढ़ोतरी हुई है, जो पहले से ही महंगाई और वित्तीय चिंताओं के कारण ऊंचे स्तर पर थी। धातु और सोने की कीमतों में कुछ नरमी जरूर आई है, लेकिन बाजार की अस्थिरता बरकरार है।

गौरतलब है कि 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी इसी तरह की वैश्विक सप्लाई चेन बाधा उत्पन्न हुई थी, जब कच्चे तेल की कीमतें $130 प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। उस दौर में भी भारत ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया था।

भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति — ताकत और चुनौतियां

संघर्ष शुरू होने से पहले भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत आधार पर खड़ी थी — विकास दर संतोषजनक थी और महंगाई नियंत्रण में थी। इसी मजबूत आधार के कारण भारत वैश्विक उथल-पुथल को बेहतर तरीके से झेलने की स्थिति में है।

मार्च में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई में मामूली वृद्धि दर्ज की गई, जिसका मुख्य कारण ईंधन और खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी रही। हालांकि पश्चिम एशिया में अस्थायी युद्धविराम के बाद मनी मार्केट और बॉन्ड यील्ड में कुछ राहत देखी गई।

देश में कई क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं, हालांकि कुछ सेक्टर में मामूली सुस्ती दर्ज की गई है। आयात में कमी और निर्यात में वृद्धि के चलते व्यापार घाटा नौ महीने के सबसे निचले स्तर पर आ गया है — यह एक सकारात्मक संकेत है।

एफडीआई और एफपीआई का हाल

विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) में उतार-चढ़ाव जारी रहा, जो वैश्विक अनिश्चितता का प्रत्यक्ष परिणाम है। वहीं फरवरी में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) सकारात्मक रहा, जो दीर्घकालिक निवेशकों के भारत पर भरोसे को दर्शाता है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि एफडीआई का सकारात्मक रहना इस बात का संकेत है कि वैश्विक कंपनियां अभी भी भारत को एक स्थिर और आकर्षक निवेश गंतव्य मानती हैं।

आरबीआई की आगे की रणनीति

संजय मल्होत्रा ने आगाह किया कि अगर सप्लाई चेन की समस्या जल्द नहीं सुलझी, तो शुरुआती आपूर्ति झटका आगे चलकर मांग को भी प्रभावित कर सकता है। यह एक महत्वपूर्ण चेतावनी है क्योंकि मांग में गिरावट से आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ सकती है।

आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि वह स्थिति पर निरंतर नजर रखेगा और जरूरत पड़ने पर त्वरित नीतिगत कदम उठाने के लिए तैयार है। केंद्रीय बैंक की प्राथमिकता मूल्य स्थिरता और वित्तीय स्थिरता दोनों को एक साथ बनाए रखना है।

आने वाले हफ्तों में पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक स्थिति, वैश्विक तेल कीमतें और आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति समीक्षा पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

अमेरिकी डॉलर की मजबूती और वैश्विक सप्लाई चेन की बाधाएं — ये सब एक साथ आए हैं। विडंबना यह है कि भारत ने घरेलू मोर्चे पर अच्छा काम किया — व्यापार घाटा कम हुआ, FDI आया — लेकिन बाहरी भू-राजनीतिक अस्थिरता इन उपलब्धियों को चुनौती दे रही है। मुख्यधारा की कवरेज जो चूक जाती है वो यह है: अगर सप्लाई चेन लंबे समय तक बाधित रही, तो RBI के पास ब्याज दर नीति के सीमित विकल्प होंगे — क्योंकि एक तरफ महंगाई का दबाव होगा, दूसरी तरफ विकास को सहारा देने की जरूरत।
RashtraPress
29 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पश्चिम एशिया संकट पर क्या कहा?
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि केंद्रीय बैंक पश्चिम एशिया संकट पर सतर्क है और ऐसी नीतियां लागू करेगा जो अर्थव्यवस्था के सर्वोत्तम हित में हों। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को सहने में सक्षम है।
पश्चिम एशिया संघर्ष का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ा?
पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा, ऊर्जा कीमतें बढ़ीं और CPI महंगाई में मामूली वृद्धि हुई। हालांकि व्यापार घाटा नौ महीने के निचले स्तर पर आया और FDI सकारात्मक रहा।
क्या भारत का व्यापार घाटा कम हुआ है?
हां, आयात में कमी और निर्यात में वृद्धि के कारण भारत का व्यापार घाटा नौ महीने के सबसे निचले स्तर पर आ गया है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
आरबीआई बुलेटिन में सप्लाई चेन को लेकर क्या चेतावनी दी गई?
आरबीआई गवर्नर ने चेतावनी दी कि अगर सप्लाई चेन जल्द ठीक नहीं हुई, तो शुरुआती आपूर्ति झटका आगे चलकर मांग को भी प्रभावित कर सकता है। इससे आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ सकती है।
पश्चिम एशिया संकट से वैश्विक वित्तीय बाजारों पर क्या असर पड़ा?
पश्चिम एशिया संकट के कारण निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर गए, जिससे अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ और शेयर बाजारों में गिरावट आई। सरकारी बॉन्ड यील्ड भी ऊंचे स्तर पर बनी रही।
राष्ट्र प्रेस
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