कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें बाज़ार के लिए सबसे बड़ा खतरा: कोटक सिक्योरिटीज़
सारांश
मुख्य बातें
कोटक सिक्योरिटीज़ के इक्विटी रिसर्च हेड श्रीकांत एस. चौहान ने 18 मई को कहा कि कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतें इस समय वैश्विक वित्तीय बाज़ारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी हैं। उनके अनुसार, महंगाई का बढ़ता दबाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज़ उछाल और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की निरंतर बिकवाली मिलकर भारत समेत उभरते बाज़ारों पर भारी असर डाल रही हैं।
कच्चे तेल की स्थिति
चौहान के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊँचे स्तर पर बनी हुई हैं और निकट भविष्य में राहत के कोई संकेत नहीं दिख रहे। उन्होंने बताया कि बीते सप्ताहांत में भी तेल की कीमतों में करीब 2 से 3 डॉलर प्रति बैरल की अतिरिक्त बढ़ोतरी दर्ज की गई।
उन्होंने कहा, 'जब तक कच्चे तेल की कीमतें ऊँची रहेंगी, तब तक महंगाई की चिंता वैश्विक बाज़ारों पर हावी रहेगी।' यदि कीमतें 105 से 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर टिकी रहती हैं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका असर और गहरा हो सकता है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल
चौहान ने बताया कि पिछले सप्ताह अमेरिका में 10 साल, 20 साल और 30 साल की अवधि वाले बॉन्ड यील्ड में तीखा उछाल देखने को मिला। उनके शब्दों में, 'ये बॉन्ड यील्ड अब असाधारण स्तर की ओर बढ़ रही हैं। जब भी ऐसा रुझान बनता है, बॉन्ड बाज़ार में बड़े निवेश आने लगते हैं।'
गौरतलब है कि विकसित देशों के बॉन्ड में अधिक रिटर्न मिलने से निवेशक अमेरिका और जापान जैसे बाज़ारों के सुरक्षित डेट इंस्ट्रूमेंट्स की ओर रुख करते हैं, जिससे भारत जैसे उभरते बाज़ारों से पूंजी निकासी तेज़ हो जाती है।
भारतीय बाज़ार पर असर
चौहान के अनुसार, FII की लगातार बिकवाली का सीधा संबंध वैश्विक अनिश्चितता और महंगे कच्चे तेल से है। महंगे तेल के कारण कई देशों की मुद्राएँ कमज़ोर हो रही हैं, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए अतिरिक्त चिंता का कारण है।
उन्होंने कहा, 'महंगा कच्चा तेल, बढ़ती बॉन्ड यील्ड और विदेशी निवेश की लगातार निकासी मिलकर भारत समेत वैश्विक शेयर बाज़ारों के लिए चुनौतीपूर्ण माहौल बना रहे हैं।'
निकट भविष्य का अनुमान
इन वैश्विक दबावों के मद्देनज़र चौहान का मानना है कि भारतीय शेयर बाज़ार निकट भविष्य में सीमित दायरे में रह सकते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब घरेलू बाज़ार पहले से ही वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। विश्लेषकों की नज़र अब तेल उत्पादक देशों की नीति और अमेरिकी फेडरल रिज़र्व के अगले कदम पर टिकी है।